सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

ये अदद मोहब्बत है, सलीके से बेचिए इसको

ये अदद मोहब्बत है, सलीके से बेचिए इसको
जिंदगी का फलसफा भी कहां से शुरू होकर कहाँ खत्म हो जाए कोई नहीं जानता। हर कवि ने अपने अपने अनुसार इस प्रेम रूप रस की व्याख्या की है। बाजार ने अपने अनुसार इसे देखा है। खरीददार और बेंचने वालों ने इसकी बोलियां भी लगाई है। कभी कबीर ने लिखा पोथी पढ पढ जग मुआ पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढे तो पंडित होय तब से लेकर अब तक प्रेम,प्यार, मोहब्बत,इश्क और, आशिकी पर हर रचनाकार ने कुछ ना कुछ लिखा ही है। इस पर न जाने कितने लतीफे बनाए गए। वैदिक काल से कृषण-राधा से शुरू होकर कॄष्ण मीरा तक की परंपरा आज हीर रांझा, सोनी महिवाल, लैला मजनूं जैसे प्रेम कथाओं में भी समाप्त नहीं हुई। अमृता प्रीतम से लेकर पंकज सुबीर, और लघु प्रेम कथाओं पर तो न जाने कितनी कलम चलीं। पता है कभी कभी लगता है कि हमने अपने अरमानों के भी मजहब बना लिए हैं। सलीके और तरीके व्यावसायिक हो गए हैं।
हम हाईटेक हो गए हैं। अभिव्यक्ति भी हाईटेक और आभाशी हो गई हैं। हमने पश्चिम से आयात करके सभ्यता के प्रतिमान खुद गढ़ लिया है। प्रणय दिवस को लेकर इतना हो हल्ला होता है कि लगता है जैसे भारत वर्ष में इस सदी का कोई महोत्सव मनाने की तैयारी की जा रही है। यह सब बाजार के हथियार है दोस्तों। जिस प्रेम को छिपाया जाता है, जिस प्रेम को खतों, के माध्यम से अभिव्यक किया जाता था। आज हम उसी प्रेम की मार्क्रेटिंग कर रहे हैं। इस प्रेम के सेल्स मैन तैयार है बाजार में। प्रेम प्रारंभ तो होता है आकर्षण की जुबां लेकर और बाजार में जाकर उपहारों में लुट जाता है। आज का मुद्दा प्रेम कम और इस प्रणय दिवस में मिलने वाले उपहारों की कीमत ज्यादा है। उपहारों ने तो जाने अनजाने जीवन में छद्म प्रेम और छद्म प्रेमी का प्रवेश करा दिया है। बाजार हम सबके प्रेम की ब्रांडिंग और एडवर्टाइजमेंट कर रहा है। प्रेम की परिणित रोमांस भी होगी यह दिवास्वप्न ही था हम सबके लिए। पर धन्य है बाजार और प्रेम के सेल्स मैन जिन्होने पश्चिम से प्रेम की कई कई कोटियां निर्धारित कर दी हैं। हर श्रेणी में बाजार लग जाता है। हर श्रेणी के दिन निर्धारित कर दिए जाते हैं। हर श्रेणी के व्यवसाय में सरकार लाभ कमा रही है। सरकार को कर से उप कर तक मिल रहा है। और सरकार के नुमांइंदे इस प्रेम के मार्केटिंग का दिखावटी विरोध दर्ज कर रहे हैं। इसी बहाने समाज में विचलन पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।
प्रेम तो मां के बेटे के संबंध में भी है, पिता का अपनी संतति से, भाई का बहन से है, पर आजकल  बाजार उस प्रेम को प्रदर्शित कर रहा है जो लिविंग रिलेशन में हैं, जो ब्वायफ्रेंड और गर्लफ्रेंड के बीच है, जो विवाहोत्तर स्त्री का पुरुष के बीच जीवन साथी के परे हैं, जो सोशल साइट से उपजता है और कोर्ट कचेहरी या आत्महत्या पर जाकर खत्म हो रहा है। बाजार के ये सब गुर है साहब, जो अनायास ही नए रूप परिवर्तित हो गए। हमने अपने आस पास दैहिक प्यास को प्रेम के रूप में परिभाषित कर दिया। बाजार ने उसे हमी को बेंचने के लिए एक मार्केट खड़ा कर दिया। पश्चिम ने विश्व स्तर पर भारत को लाने के लिए इन्हीं भावों का बाजारीकरण कर दिया। अब तो सब संकरित हो चुका है। इजहार और इकरार भी आयातित हो चुके हैं। उपहार भी आयातित हो चुके हैं। विचार और आचार भी आयातित हो चुके हैं। इस प्रेम के लिए मदर्स डे, फादर्स डे, सिस्टर्स डे, वाइफडे,हसबैंड डे, और वेलेनटाइन डे बना दिए गए। चलो अच्छा ही है अब आज के इस भागमभाग के युग में किसी केपास किसी के लिए कुछ पल भी खर्च करने के लिए नहीं हैं। हम अकेलेपन के साथ जीवन जीने के लिए बाध्य हैं। हमारा विश्वास वास्तविक रिश्तों के प्रति कम और आभासी रिश्तों में ज्यादा बढ रहा है। तो कम से कम वैधानिक अवैधानिक रिश्तों के लिए इन दिनों के चलते कुछ जेब तो खर्च करते है। हां इस संदर्भ में एक बात तो है यहां पर हम ही बाजार है, हम ही दुकानदार है, हम ही सेल्स मैन हैं, हम  ही इसके दलाल हैं, हम ही खरीददार भी हैं। जब सब कुछ हम ही हैं तो तीसरा भी कोई अप्रत्यक्ष रूप से इस फायदे में शामिल हैं और वह है समाजिक ढांचा और हमारा वैचारिक चिंतन।
प्रशासन से लेकर समाज तक इस इस बाजार वाद में रम गया है। सबके अपने अपने स्वार्थ है। सबके अपने अपने तवे हैं जहां इसकी रोटियां परोसी जा रही हैं। और तो और रखवाले भी इस मृत्युभोज के अदद स्वाद का आनंद अंगुलियां चाट चाट कर ले रहे हैं। इस बाजार में इस मार्केटिंग के पुल बांधें जा रहे हैं। किसी को आर्थिक फायदा है। किसी को मानसिक फायदा है। किसी को जेहनी फायदा है। बस फायदे का ही कायदा है। तो हम क्यों कायदों की सीमाएं बनाएं। क्यों हम विरोध का जरिया बने। क्योंकि विरोध करने वाले जितने ठेकेदार हैं उन्हीं के घर से इसकी जडे प्रारंभ होती हैं। जिनकें यहां साल भर रोमांस चलता है वो विशेष दिनों में विरोध दलों के पेशेवर सदस्य बन जाते हैं। इस लिए जिसे जिसे प्रेम की मार्केटिंग करानी हो वो बाजार में कूद जाए। बाजार खत्म होने तक शामिल रहे और फिर बाद में सोचे कि वो फायदे में रहा कि नुकसान में रहा। अगर आप बाजार में बाजारू नहीं होंगें तो बाजार आपको कूडेदान का सामान मानकर कूडे के भाव में बेंच देगा साहब। आप वो बिका सामान बन जाएगें जिसकी वापसी की गारंटी कोई दुकान वाला नहीं लेता।  
बहरहारइस तरह के दिन पारंपरिक पर्वों की रौनक के परे भी हमारे आसपास गर्माहट बनाए रखते हैं। हम सक्रिय बने रहते हैं, हम इस सक्रियता के चलते भले ही अपना आपा खो दें परन्तु यह तो तय है कि हमारी खुद की स्वीकारोक्ति है कि इस तरह के बाजारवादी आयोजन में आपा खो दें भी तो कोई फिक्र नहीं है। हम खुद हर प्रकार परिस्थितियों को स्वीकार करने के लिए बाध्य हो चुके हैं। क्योंकि हम मार्केट में है साहब,इस मार्केट में जब हमारा शरीर,आत्मा, आस्था, विश्वास,और रिश्ते तक बिक जाते हैं, तो प्रेम किस खेत की मूली है, यहां पर हम चिताओं के जलने के बाद बची हुई लूक तक बेंच लेते हैं। यहां पर अंतरंगता भी करोडों में बिक जाती है। प्रेम तो फिल हाल बहुत सालीन है। अनमोल प्रेम को भी हम मोल लगाकर बेंच लेते हैं। विज्ञापन बनकर प्रदर्शित हो जाता है हमारा प्रेम, एक लंबे समय के तक चिंतन करने के बाद समझ में आता है कि सर्फ एक्सेल का विज्ञापन तो हम सबने देखा है कुछ अच्छा हो तो दाग अच्छे हैं। एकाकीपन को दूर करने के लिए अगर बेदाग से दागदार हो जाओ तो क्या बुरा है साहब। किसी अपने की खुशी के लिए ये मार्केटिंग भी ठीक है। बस शर्त यह है कि सलीका से काम होना चाहिए।
यह प्रेम खड़ा अब हाट में सबकी मागें खैर।
तू बेचें मुझे हाट में पर ना तुझसे कोई बैर।
खरीद बेंच धर्म है सब कुछ यहां बिक जाए।
नहीं सोच अब तू खड़ा क्या खोय क्या पाय।
अनिल अयान।

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

"अभिव्यक्ति के वैचारिक खतरे"

"अभिव्यक्ति के वैचारिक खतरे"
अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे/उठाने ही होंगे/तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब/पहुंचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार/तब कहीं देखने मिलेंगी हमको/नीली झील की लहरीली थाहें/जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता/अरुण कमल एक। (मुक्तिबोध) यह कविता तो हम सबने सुनी ही होगी। मुक्तिबोध जैसा रचनाकार बहुत साल पहले यह रचकर चला गया कि मुक्ति का बोध कैसे प्राप्त होगा हर इंशान को। संघर्ष के समय हमें किस विषय पर किस तरह के विचार व्यक्त करने होगें। हर व्यक्ति के अंदर समाज स्थित होता है। समाज में हर व्यक्ति खुद समाज की एक इकाई होता है।हर व्यक्ति समाज में रहता है। समाज की अभिव्यक्ति को अपनी अभिव्यक्ति बनाने की चेष्टा करता है। या फिर समाज में अपनी अभिव्यक्ति को समाज की अभिव्यक्ति बनाने के लिए प्रयास करता है। वैचारिक अभिव्यक्ति से लेकर, सांस्कृतिक सामाजिक, और शैक्षिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वतंत्रता के नाम अभिव्यक्ति का महिमामंडन कुछ ऐसे बिंदु हैं जिस पर स्वस्थ बातचीत की आवश्यकता है।
समाज सापेक्ष हमारी अभिव्यक्ति क्या है यह भी हमें समझने की आवश्यकता है। वर्तमान समय में हमने अभिव्यक्ति को अपना अधिकार तो माना है किंतु अभिव्यक्ति को अपने कर्तव्य के रूप में नहीं देखते हैं।भारतीय संविधान के निर्माण के दौरान संविधान सभा में हुई बहसों में ‘विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नागरिक स्वतंत्रताओं की आधार रेखा' कहा गया है. संविधान की धारा 19(1) जिन छह मौलिक अधिकारों का प्रावधान करती है उनमें विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पहला स्थान है. अन्य मौलिक अधिकारों की ही तरह विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी आत्यांतिक और अनियंत्रित नहीं है. विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त सीमाएं इन बातों के आधार पर लगायी जा सकती हैं- 1)मानहानि, 2)न्यायालय की अवमानना, 3)शिष्टाचार या सदाचार, 4)राज्य की सुरक्षा, 5)दूसरे देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, 6)अपराध के लिये उकसावा, 7)सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और 8) भारत की संप्रभुता और अखंडता.  आदि कुछ ऐसे बिंदु हैं जो यह स्पष्त करते हैं कि हमारी अभिव्यक्ति की नाक कितनी बड़ी होनी चाहिए और नाक की लंबाई को कितना बढाना चाहिए कि वो कटने से बची रहे।
कभी कभी हमारी स्वतंत्रता हमारे लिखे और बोले गए विचारों को वाद विशेष से जोडने का माध्यम बन जाता है। अगर हम स्वतंत्र अभिव्यक्ति करते हैं तो हमारे ऊपर कोई वाद पंथ या कोई समुदाय हावी नहीं होना चाहिए। अगर ऐसा है तो हम कहीं ना कहीं पर वैचारिक गुलाम हो चुके हैं। इसके लिए आवश्यक है कि दोनो दिशाओं से मंडराते खतरे अपना सिर उठा रहे हैं उनके बीच समभाव से काम करते हुए एक दूसरे के विचारों का सम्मान दिया जाना चाहिए।हमारी स्वतंत्रता अगर सवाल करने की स्वतंत्रता देती है तो सवालों को सही तर्क और तथ्य के अधारा पर जवाब देने की सहन शक्ति भी प्रदान करती है। जो हमारा कर्तव्य भी है।सवाल करने की ताकत से लोकतंत्र मजबूत बनता है। अपने से भिन्न विचारधारा रखने वाले लोगों की विचारधारा का सम्मान और विचारधाराओं से परे व्यक्ति का महत्व भी लोकतंत्र के लिए जरूरी है। विकसित राष्ट्र के लिए भविष्योन्मुखी दृष्टि का होना जरूरी है। और जरूरी हो जाता है साहसपूर्ण स्वर का सम्मान करना जो  एक  साहस पूर्ण वैचारिक स्वतंत्रता का दूसरा पहलू है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी एक दो पहलू वाल सिक्का है जिसके एक पहलू को तो हम बखूबी याद रखते हैं किंतु दूसरे पहलू को हम बहुत जल्दी भूल जाते हैं। यह भूल जाते हैं कि हमारी स्वतंत्रता से किसी की स्वतंत्रता बाधित ना हो। हमारे विचार अगर आयातित हैं तो हम बहुत जल्दी उग्र हो जाएगें क्योंकि हमारे पास वैचारिक रटन्त विद्या का उथला बोझ है। हमारे पास विषय वस्तु पर ज्ञान का सागर ना होकर मात्र बरसाती नाले का मौसमी बहाव है। इस बहाव में हमारे साथ हमारी शांति बहजाती है और कट्टरता उफान पर आजाती है। आज जरूरी है कि अभिव्यक्ति की स्वंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ढकोसले को भिन्नता करने की। अगर हम इस भिन्नता को समझ लेते हैं तो शायद हम अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को  सही मायने में उपयोग कर पाएगें। अन्यथा इस स्वतंत्रता को किसी की वैचारिक परतंत्रता के लिए बलिदान करते रहेंगें।
अनिल अयान सतना

९४७९४११४०७

हिंदी है हम वतन हैं हिंदोस्तां हमारा।

हिंदी है हम वतन हैं हिंदोस्तां हमारा।
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा, हिंदी हैं हम वतन हैं हिंदोस्तां हमारा। यह गीत हमारी भाषाई पहचान को वैश्विक स्तर पर रखने का काम करता है। विगत सप्ताह दो प्रमुख भाषाई और दर्शनशास्त्रीय पर्व मनाए गए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी दिवस और युवा दिवस। इसके साथ ही कई संस्थानों में युवाओं के साथ हिंदी के तालमेल को बिठाने की जग्दोजहद प्रारंभ कर दिया गया। आज हम कुछ तथ्यों पर विचार करेंगें जो यह बताएगें कि कैसे युवा वर्ग हिंदी को वैश्विक स्तर तक पहुंचाने के लिए प्रयास रत हैं। वास्तविकता यह है कि हम हिंदी को याद करने के लिए राजभाषा पखवाडे तक सीमित रखने के प्रयास में खुद को भावनाशून्य बना लेते हैं। किंतु विश्व हिंदी दिवस का प्रारंभ और इसके प्रचार प्रसार में युवा वर्ग का एक महत्वपूर्ण योगदान है। साथ ही साथ वैश्विक स्तर पर हिंदी की पहचान मजबूत करने के लिए युवाओं का योगदान दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। वैसे तो अधिक्तर युवा अपने महाविद्यालयीन काल से ही अंग्रेजियत और प्रौद्योगिकी की ओर रुख कर देता है। किंतु उसके अंतस में हिंदी का कीड़ा कुलबुलाता रहता है। हिंदी उसकी जुबान से अलग नहीं होती। हिंदी उसकी सांसों में गतिमान बनी रहती है। मेरे पहचान के अधिक्तर इंजीनियर्स, डाक्टर, टीचर्स,और अन्य व्यवसायी मित्र हिंदी के प्रति शुभ संकेत देते हैं। वो हिंदी को बोलना सुनना और संवाद करना पसंद करते हैं। हिंदी राजभाषा के रूप में स्थापित हो या ना हो किंतु समाज में हिंदी का अपना प्रजातंत्र हैं।
जब हिंदी के वैश्विक परिदृश्य की बात करें तो हमें हिंदी के प्रचार प्रसार के विभिन्न कारकों को नहीं भूलना नहीं चाहिए। हिंदी को बोलने के साथ साथ हिंदी को वैश्विक भाषा साहित्य में स्थापित करने का काम भी युवा कर रहे हैं। वर्तमान में भारत के बाहर भी हिंदी के युवा लेखकों की पुस्तकों को ७० प्रतिशत तक इंटरनेशनल प्रकाशक प्रकाशित करने के लिए स्वागत करते हैं। विश्व पुस्तक मेले में युवा लेखकों की पुस्तकों का प्रतिशत साठ से अधिक ही रहा। अधिक्तर बिक्री वाली पुस्तकों में भी युवा लेखकों की पुस्तको को पढ़ने और खरीदने का श्रेय युवकों और युवतियों और महिला ग्रहणियों को जाता है। यह मामला तो प्रगति मैदान का है। भारत में जितनी भी नेटवर्किंग साइटस हैं उसके भारतीय खाताधारकों की ८० प्रतिशत संख्या हिंदी को हिंदी में लिखने में खुश होते हैं। उनका रोमन हिंदी में लिखना और अंग्रेजी के प्रति रवैये की उदासीनता की वजह से इस परिणाम तक हम पहुंच चुके हैं। वर्तमान में युवाओं के प्रेरणा श्रोत ऐतिहासिक और समाजिक पात्रों के साथ साथ आस पास के सफल युवा होते हैं। वर्तमान युवा नौकरी की बजाय उद्यमी बनना ज्यादा पसंद करते हैं और सर्विस सेक्टर में अपनी पहचान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन करते हैं। विश्व स्तर पर जितने भी हिंदी भाषा अप्रवासी युवा वर्ग हैं वो सब अपने आप को हिंदी के परिवेश में ढालने की चेष्टा करते हैं। औसतन युवा लेखक, संपादक और युवा उद्यमी भारत में अपनी पहचान को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहते हैं। वो विदेश में हिंदी की पहचान को दिन दो गुना रात चौगुना वृद्धि करने में अपने स्तर पर प्रयास करते रहते हैं।
अगर हम हिंदी से संबंधित इंटरनेट में ई मैग्जीन्स और हिंदी के पोर्टल्स की बात करें,  या हिंदी में ब््लॉग्स की बात करें तो युवा वर्ग हिंदी के क्षेत्र को यहां पर भी विस्तार दे रहें हैं। फेसबुक, ब्लाग, ट्वीटर, स्टॊरीमिरर, प्रतिलिप, वेबदुनिया हिंदी आदि नाना प्रकार की हिंदी वेबसाइट हैं जो हिंदी को वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए मददगार हैं। पिछले सप्ताह से अगर हम विश्व हिंदी दिवस, विश्व पुस्तक मेले, विश्व अप्रवासी दिवस, और स्वामी विवेकानंद के जन्म दिन को मना रहे हैं तो हमें युवाओं की भाषा: हिंदी के लिए, युवाओं के हिंदोस्तां में रहने की वजह से : हिंदी नागरिक होने के लिए, इटरनेट के माध्यम से युवाओं के हिंदी प्रयासों के लिए युवाशक्ति युगे युगे को स्वीकार करना होगा। युवा शक्ति से राजनीति में वोटनीति है। योजना नीति है। और संवैधानिक नीति है। संसद से लेकर पगडंडी तक, कारखानों से लेकर खेतों तक युवा मौजूद हैं और मानवसेवा के मिशन लगे हुए हैं। संघर्ष,समर्पण,और सफलता अलग अलग स्तर पर युवा शक्ति विकास को पागल होने से रोक रही है। कुछ समूहों के बरगलाए युवाओं को अगर सही दिशा दी जाए तो वो भी हिंदोस्तां के सर को गौरव से ऊंचा करेंगें।
हम बार बार कहते हैं कि युवा वर्ग अपने उद्देश्यों से भटक रहे हैं। वो अलगाव, भ्रष्ट राजनीति, और आतंकवाद के पैतरे बन रहें हैं, वो समाज में वैमनस्यता फैलाने के लिए एक औजार के रूप में गुटों के द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे हैं आदि आदि बहुत सी बाते बुजुर्गों के द्वारा सुनते हैं किंतु कभी युवाओं को अपने पास बिठाकर उनके साथ बुजुर्गों को जवान होते या जवान महसूस करते या उनके साथ युवा हृदय होते बहुत कम बुजुर्गों को देखा होगा। समाज को यह स्वीकार करना होगा कि पीढी के वैचारिक अंतर को संवाद ही दूर करता है और वर्तमान में युवावर्ग इस अंतर को दूर करने के लिए स्वमेव प्रयासरत होगा है। उस समय पर भी वो हिंदी का ही सहारा लेता है। विदेश में जाकर शिक्षा लेने वाले युवाओं में अधिक्तर युवा वर्ग वैश्विक परिदृश्य में हिंदी को फैलोशिप स्कालर्स के रूप में अनुवादक, अध्ययन और अध्यापन को चयन किये और सफलतापूर्व देश के साथ साथ विदेशों में हिंदी को प्रचारित प्रसारित कर रहे हैं। इसी की तरह विदेशों से भी बहुत से युवा अन्य देशों से हिंदी को पढ़ने सीखने बोलने और हिंदी के क्षेत्र में कार्य करने के लिए भारत आते हैं। इस बार के युवाओं की योग्यता, उनकी काबिलियत, काबिलियत का भाषाई संवर्धन में योगदान, और योगदान से वैश्विक स्तर पर हिंदी की स्थिति को जानना तो हम सबका अधिकार है। इसी बहाने अगर और युवा इस कर्मक्षेत्र में आगे आकर झंडावरदारी करते हैं तो सही अर्थों में  युवाओं का दिवस हर दिवस होगा और हम हर दिवस हिंदी दिवस के रूप में मनाएगें।
अनिल अयान,सतना

९४७९४११४०७

न्यायपालिका में उपजती विभीषणगिरी बनाम राम राज्य की तलाश

न्यायपालिका में उपजती विभीषणगिरी बनाम राम राज्य की तलाश
न्यायपालिका में भी विभीषण निकल कर आयेंगें ये सोचा नहीं था कभी। इस विभीषणगिरी में रावण की भूमिका में कौन है यह तो समझ में आता है किंतु विभीषण के द्वारा बगावती सुर किस आराध्य प्रभु राम के तले हो रहा है यह तो समझ के परे है। धरने पर लोकतंत्र के मंदिरों में, शिक्षा के मंदिरों में प्रेस कांफ्रेंस करते अपराधी और प्रतिवादियों को खूब देखा है किंतु न्याय के मंदिर के बार पंचपरमेश्वरों को प्रेस कांफ्रेंस करते पहली बार देखा है। इस प्रकार के संवाद से मेरे मन में रह रहकर कई प्रश्न उपजते रहे,सोचता हूं वो प्रश्न आप सबसे भी साझा कर ही दूं क्या सर्वोच्च न्यायाल्य के माननीय न्यायाधीशों ने अपनी समस्या को माननीय राष्ट्रपति जी से साझा की, या एटार्नी जनरल, रजिस्टार सुप्रीमकोर्ट, को बताना उचित समझा, जजों के यहां सरकार और विपक्ष के नेता किस विषय पर चर्चा करने गए, जजों ने परिस्थिति जन्य त्यागपत्र देने का रास्ता क्यों नहीं चुना, इनके द्वारा की गई प्रेस कांफ्रेंस किसकी अनुमति से हुई, इससे न्यायपालिका के प्रति जनसाधारण और नागरिकों के बीच किस तरह की वैचारिक टूटन आयेगी, क्या न्यायपालिका के विभागीय मसले अब खुले आसमां में मीडिया के द्वारा सुलझाए जाएगें, क्या न्यायाधीशों के ऊपर बैठे अधिकारी अब विश्वासयोग्य और न्याय संगत नहीं रहे, क्या वो अब विधायिका और कार्यपालिका के एजेंट बन चुके हैं,आदि बहुत से प्रश्न अपने उत्तर की तलाश करते रहे। अब सवाल यह है कि ऐसी स्थिति निर्मित हुई क्यों, इस विभीषणगिरी की रीड़ कहां से प्रारंभ होती है।
जस्टिस दीपक मिश्र पहले भी कई आदेशों को लेकर मीडिया और न्यायपालिका में लाइमलाइट में रहे जैसे निर्भया कांड के दोषियों की सजा को बरकरार रहना, चाइल्ड पोर्नोंग्राफी वेबसाइट को भारत में वैन करना, सबरी माला मंदिर में महिलाओं के लिए खोलना, सिनेमाहाल में राष्ट्रगान अनिवार्य करना, एफ आई आ की काफी को वेवसाइट में चौबीस घंटे में अपलोड़ करना, अपराधिक मानहानि की संवैधानिक मानता, मेमन की फांसी को बरकरार रखना, आरक्षण को मायावती के शासन काल में रोक लगाना, आदि इतना ही नहीं जस्टिस मार्कंडेय काटजू, टीएस ठाकुर, करन्न, प्रतिभारानी जैसे जस्टिस भी अपने कार्यकाल में विवादों में रहे। इस बार की विभीषण गिरी का प्रारंभ जज ब्रजगोपाल लोया की संदिग्ध हालत में मौत के मामले की जांच को लेकर हुआ, किंतु इसके अलावा भी कालेजियम सिस्टम में पारदर्शिता, चीफ जस्टिस और अन्य जस्टिसों के बीच विभागीय मतभेद,  मामलों को अन्य जस्टिसों के बेंच में स्थानांतरित करना, और सबसे महत्वपूर्ण बात न्यायपालिका और सरकार दोनों ही इस बात के लिए वैचारिक युद्धरत हैं कि जजों की नियुक्ति उनके पास ही रहे। सरकार, और सुप्रीमकोर्ट दोनों ही इस मामले में खुद को ड्राइविंग सीट में रखना चाहते हैं। इस विषयों में कोर्ट और संविधान दोनों की नियमावलियां चुप्पी साधे हुई हैं। ये दोनो संवैधानिक समूह अभी तक तय नहीं कर पा रहे कि आखिर कैसे लोगों को जज बनाया जाए, उनकी योग्यता और अनुभव के मापदंड क्या होगें, मेमोरेंडम आफ प्रोसीजर्स की कमी के चलते यह मामला अदालत से खुले आसमां में आकर दिखने लगा।
वास्तविकता में देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट में ही चीफ जस्टिस के अलावा एकतिस पदों में छ पद खाली है और पांच जज इस मार्च तक सेवानिवृत हो जाएगें। जब यह हाल सुप्रीम कोर्ट का है तो अन्य राज्यों की न्यायपालिका की तो इससे ज्यादा दुर्गति है। सुप्रीम कोर्ट में आठ राज्यों के जस्टिसों का कोई प्रतिनिधित्व भी नहीं हो पाया, नियुक्ति मेमोरेंडम आफ प्रोसीजर्स के फाइनल ना होने की वजह से नई नियुक्तियां ठंडे बस्ते में सो रही है और तीन करोड़ मामले उसके वादी प्रतिवादी न्यायपालिका के मंद्रिर में  प्रसाद पाने के लिए मुंहबाए खडे हुए हैं। चयन की बात करें तो जजों का चयन एक समान प्रक्रिया से होता है वह है वरिष्ठता और योग्यता के आधार पर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों, हाईकोर्ट जजों और वकीलों को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया जाता है। इसके लिए अखिलभारतीय वरिष्ठता, और उम्र को प्रमुख माना गया है। साथ ही साथ महिला जजों का प्रतिनिधित्व भी ध्यान में रखकर नियुक्ति की जाती है। उधर हाई कोर्ट में जजों को अपने गृह हाई कोर्ट के अलावा नियुक्ति में लाने के लिए उसी कोर्त के वरिष्ठ जजों की मंजूरी आवश्यक है यही कालेजियम सिस्टम है। केस के वितरण के लिए सुप्रीम कोर्ट की बारह बेंच में चीफ जस्टिस से पहली बेंच प्रारंभ होकर वरीयताक्रम के आधार पर बारहवीं बेंच तक केस वितरित किये जाते हैं। राज्यों और संवेदनशील मुद्दों की सुनवाई चीफ जस्टिस की बेंच को सौंपी जाती है। पिछले पांच सालों मेंअधिक्तर मामले इसी बेंच के द्वारा सुलझाए गए। अन्य बेंच तक मामले क्यों नहीं गए यह प्रश्न चिंन्ह खडा करता है।
अक्टूबर में जब दीपक मिश्रा चीफ जस्टिस की सेवा निवृति है इसके पहले इस तरह के आरोप प्रत्यारोप की सिटकिनी लगाकर मीडिया में कूदने वाले विभीषणगीर जस्टिसेस ने उनकी छवि को दागदार बता दिया है। इसके अलावा जस्टिस दीपक मिश्र के द्वारा लिया गया केंद्रीय विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलर्स के भ्रष्ट्राचार के मामले को सुलझाने के लिए पहले जस्टिस गोयल और जस्टिस ललित की बेंच से अपने बेंच में ले जाया गया और निर्णय सुनाने की बजाय जस्टिस अरुण मिश्र को यह केस ट्रांसफर कर दिया और वहां से इन भ्रष्टाचार आरोपी वाइस चांसलरों के खिलाफ केस खारिच कर दिया गया। इस तरह की अंदरूरी खींचातानी,शिक्षा के मंदिरों के पीछे चल रहे दोगलेपन को छिपाने की कोशिश, जस्टिसों का भी पक्ष और विपक्ष राजनैतिक पार्टियों की विचारधारा के समर्थन से यह स्तिथि पैदा हुई है। जस्टिसेस का विचारधारा के प्रति झुकाव, विचारधारात्मक पार्टियों से संबंधित केसेस के प्रति छद्म पारदर्शिता का दिखावा, और फिर मेमोरेंडम आफ प्रोसीजर्स को लागू करने में सहयोग करने की बजाय , अपने सुप्रीम न्याय, कार्य और विधायिका के केद्र व्यक्ति की जानकारी के बिना इस तरह मीडिया से सीधे रूबरू होना मुझे तो असंवैधानिक और अप्रत्याशित लगा। न्यायपालिका की नियुक्तियों के लिए न्यायपालिका को पूरे डेकोरम सहित बातचीत करके मामले के परिणामों को सबसे सामने रखने की उम्मीद हम सबको है। यह भी सच है गाहे बगाहे विधायिका का अप्रत्याशित दखल न्यायपालिका में देखा जाता रहाहै किंतु संवैधानिक परिवर्तनों के माध्यम से ऐसे कानून बनाना होगा जिससे तीनों पालिकाओं के बीच में समान्जस्य भी बना रहे और एक दूसरे के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा भी हो।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

बसंत के बहाने निराला की याद

बसंत के बहाने निराला की याद
जब फूलों  पर बहार आजाये, गेहूं की  बालियां नृत्य कर्ने लगे, आमों के पेडों में बौर करलव करने लगे, तितलियां फूलों पर मोहित होले लगे तब मानिये कि बसंत आ गया है। माघ का महीना आये और पंचमी के दिन उसका अर्ध्य पूर्ण हो तो मानिये बसंत है। ऋषियों की पंचमी का उद्धरण बसंत में ही उल्लेख होता है। सूर्य से लेकर धरा तक, मनुष्य से लेकर पशु पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। मां सरस्वती का जन्मदिवस के रूप में भी यह दिवस मुख्य रूप से मनाया जाता है। हर कला का साधक इस दिन को अपने आराध्य का दिन मानता है। इसी दिन पृथ्वीराज चौहान की आंखें मोहम्मद गौरी ने फोड़ा था।यह घटना ग्यारह सौ बानवे ईश्वी ही है। और इसी दिन ही अमर विभूति सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म दिन भी आता है। इस दिन जहां एक ओर मदनोत्सव  मनाया जाता है भगवान श्री कृष्ण और काम देव की पूजा होती है। कामशास्त्र में सुवसंतक नाम के उत्सव की चर्चा इसी समय के लिये किया है। अर्थात इसी दिन बसंत पृथ्वी पर अवतरित हुआ था। सरस्वतीकंठाभरण में यह लिखा है कि यह बसंतवार का दिन है। इसी दिन काम देव के पंचशर -शब्द, स्पर्श,रूप, रस, और गंध को आमंत्रित किया जाता है। चैंत्र कॄष्ण पंचमी को बसंतोस्तव का अंतिम दिन रंग पंचमी के रूप में मनाया जाता है।
मां सरस्वती सृजन की अधिष्ठात्री देवी है। पुराणों में लिखा है कि बसंत को ऋतु राज कहा गया। देवो के अलावा साहित्य महामानव,छंदशास्त्री, महाप्राण कवि निराला के जनमदिन को हम सब बसंत पंचमी के दिन ही तो मनाते हैं।डा रामविलास शर्मा ने लिखा कि जब निराला को पता चला दुरालेलाल भार्गव बसंत पंचमी को अपना जन्मदिन मनाते हैं तो उन्होने निश्चय किया कि वो भी अपनी आराध्या के उत्सव के दिन अपना जन्म दिवस मनायेगें। बसंत उनके गीतों छंदों में झूमता है। अवतरित होकर बसंत अपना वरद हस्त उनकी रचनाओं में रखने में सफल होता है। वो लिखते हैं कि - फूटे रंग बासंती गुलाबी/ लाल पलास, लिए सुख,स्वाबी/  नील स्वेतशतदल. सर के जल/ चमके है केशर पंचानन में।" रक्त संचार में भी बसंत का आवेश समाजाता है। कबीर हो नानक हों सूर हो मीरा हो किसी ना किसी रूप में बसंत का वर्णन अपने शब्दों में करके मां सरस्वती का आराधन किया है। वो बसंत ही था जब निराला की कविता तुलसी दासमें रत्नावली को शारदा सरस्वती के रूप में पल्लवित किया। निराला की मां वाणी वंदना में देवी सरस्वती से भारत की स्वतंत्रता को साकार और संस्कार युक्त बनाने का वर मांगते हैं। वो मुक्ति की इच्छा के साथ प्रार्थना कुछ ऐसे करते हैं- नव गति, नव लय, ताल, छंद नव,/ नवल कंठ, न्व जलद मंद्र रव/ नव नभ के नव विहग वॄंद को। नव पर नव स्वर दे।" "भारति, जय,विजय करे,कनक शस्य कमल धरे"।
बसंत ने जो अमर संगीत प्रकृति के माध्यम से दिया है। वो कला और सौंदर्य को और पुष्पित किया है। निराला बसंत दूत के रूप में दैदीप्तमान रहे।निराला ने जीवन भर आभाव रस पिया किंतु भाव उनके अभावों के बीच पोषित होता रहा। रविवार को जन्म होने के साथ उनका नाम सूर्यकांत रखा गया था। उनके अंदर प्रकाश पुंज, उष्मा,और तेज विद्यमान था। उनकी जीवन शैली हमेशा अभिषापों को झेलने वाली ही रही। वो अक्खड, स्वाभिमानी, परदुख कातर बन कर जीवन भर रहे। निराला एक शैली, एक छंद, एक काव्य का नाम बन गया। निराला ने जीवन को सशक्त त्रिभुज के रूप में जिया। निराला ने राम के असहाय और शक्ति के आराधन के छण को पकड़ा और राम की शक्तिपूजा की रचना की।छायावाद के के चारो स्तंभों में निराला ने ही कविता के सबसे ज्यादा और स्तरीय पाठक पैदा किये। वो भक्ति से शक्ति की बात करते हैं। वो धर्म से आध्यात्म और आध्यात्म से एकात्म की बात करतेहैं। निराला के विवाद और विवाद के बीच से निकलते निराला अपने आप को सूर्य की भांति कांतिमय बनाये रखने में सफल रहे।

अनिल अयान,सतना

उनके लिए रिबेट, हमारे लिए डिबेट

उनके लिए रिबेट, हमारे लिए डिबेट
बजट आया, किसी ने विकास कहा, किसी ने आश कहा, किसी ने विनाश कहा, किसी ने पकोड़ा कहा, किसी ने रोड़ा कहा, किसी ने कहा गरीबों के लिए सब्सिडी है, किसी ने कहा अमीरो के लिए टैक्स में रिबेट है, किसी ने कहा पेट्रोल मोदी की उम्र से आडवानी की  उम्र तक पहुंच गया, किसी ने कहा कि सेस की ऐश हो गई, किसी ने कहा, यह उद्योगपतियों का बजट रहा, किसी ने कहा कि टैक्स के ऊपर टैक्स लगाने की परंपरा की शुरुआत हो गई। मध्यम वर्ग के लिए क्या आया सिर्फ डिबेट, नौकरी पेशे वालों के हाथों में क्या आया, चातक के लिए स्वाति की बूंदे, सरकार के लिए तो जनता अब प्रयोग की सामग्री बन गई है। टीवी चैनलों में मध्यम वर्ग को बजट ने क्या दिया यह चर्चा का विषय बना कर बहसें जारी रखी गई। बहसों से परिणाम उसी तरह निकला जैसे योजनाओं का परिणाम निकलता है।
योजनाएं सुनने में कितनी अच्छी लगती हैं, परन्तु जमीनी स्तर पर काम करने के लिए कर्मचारियों के छक्के छूट जाते हैं। पिछले दो सालों में प्रधान मंत्री जी की दो योजनाएं सभी लोगों के लिए जारी की गई। सभी के खातों से इसका प्रीमियम अप्रैल के महीने में काट लिया गया। अब इस बार आ गया अभ्युदय योजना, और मोदी केयर योजना का प्रचार प्रसार करना, बजट कुछ खास ना हो तो उसके ऊपर योजनाओं की नक्कासी कर दी जाती है। घोषणाएं तो ऐसे की जाती है जैसे साल भर में देश की अर्थव्यवस्था लाइन में आजाएगी। मध्य प्रदेश में तो सेस की मार उत्पादों की नाक में नकेल डाल दी है। आयुष्मान के नाम पर गरीबों के भले करने की बात कहा तक अपनी हकीकत की जमीन पर उतर सकती है यह देखना और भोगना है। यह जुमला सन चौदह के चुनावी घोषणा पत्र में था और चार साल लग गए। ओबामाकेयर की नकल मार कर मोदी जी ने इस ब्रांड को मार्केट में उतार दिया। जनता से प्रीमियम लेकर इंस्योरेंश सेक्टर में लगा दिया जाएगा। ढाई करोड़ लोगों के स्वास्थय की चिंता अब सरकार करेगी।
ओबामा ने स्वास्थ्य के साथ खाने और नाश्ते तक की स्कीम को इस केयर में जोड़ाथा, उसके लिए विभिन्न योजनाएं बनाई गई थी। परन्तु मोदी केयर में ऐसा कुछ भी नहीं बताया गया। सरकारी अस्पतालों की स्थिति और डाक्टर्स की स्थिति यह है कि हर डाक्टर्स का खुद का मल्टी स्पेशियलिटी हास्पीटल, और नर्सिंग होम्स हैं। वो हमारी केयर करेंगें कि  हमारे प्रीमियम से खुद के परिवार का वेल्फेयर करेंगेम। ओबामा केयर के तहत इंश्योरेंश कंपनियां व्यक्ति की बीमारी के लिए मुआवजा के लिए मना नहीं कर सकती थी। मोदी केयर में तो निजी अस्पताल, और इंश्योरेंश कंपनियों की चांदी है। डेढ लाख केंद्रों को खोलने का लक्ष्य है। पर लक्ष्य को पाने के लिए रास्ता और फंड कहां से जुगाड़ा जाएगा वह निश्चित नहीं है। इस योजना में बीमा कंपनियों की वल्ले बल्ले है। डाक्टर, हास्पीटल, और बीमा कंपनियों से जुडे हर व्यक्ति के जेब गरम रहेगी। इसको गर्म करने के लिए मध्यम वर्ग की जेब को लूटा जाएगा। गरीब को लाइफ इंश्योरेंश में कोई रुचि नहीं होती। अमीरों का काला धन इन योजनाओं की शान होती है। और बचा मध्यम वर्ग जो अपनी मौत और अस्वस्थ होने के डर और परिवार के भविष्य की चिंता के चलते इन मामलों मेंभी हाथ पैर मारेगा। बजट के प्रकोप को कम करने के लिए यह योजना मलहम का काम करेगी। दूर से देखने में तो यह योजना गरीबों को पांच लाख रुपये का इलाज।  अन्य वर्गों को आठ से दस लाख तक का इलाज मुफ्त में कराएगा। परन्तु पिछली हकीकत तो भयावह लगती है।
प्रायोगिक रूप से देखें तो समझ में आएगा कि छ सात महीने इसको लागू करने में लगेगा, फिर  कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने में लगेगा,  उसके बाद,  परिवारों को जोड़ना, उनका डाटा और रिकार्ड को मेंटेन करना, फिर उसके बाद हास्पीटल्स को इंश्योरेंश कंपनियों को जोडना एक लंबे अवधि का काम है। स्वास्थ्य मंत्री जी का यह कहना कि लोग हेल्थ इंश्योरेंस की बातों को जानते हैं हमारे पास इससे  भी बेहतर हेल्थ माडल्स मौजूद है। जिसमें वेलनेस सेंटर खोल कर इन योजनाओं को घर घर तक पहुंचाने की योजना है। इस प्रकार की लोकलुभावनी योजना का कुछ फायदा वाकयै जनता को होना है या इस प्रकार की योजना सरकार अपने चुनावी फायदे, फंड और अपने कामों की नाकामियों को छुपाने के लिए जारी की है यह तो आने वाला वक्त बताएगा। इस योजना की तरह, पहले भी खाद सुरक्षा गारंटी योजना, मनरेगा, अटल पेंशन योजना, और भी अन्य ढेरों योजनाएं सरकार के द्वारा लागू की गई परन्तु गारंटी केयर की कम और वेल्फेयर की ज्यादा समझ में आई। इन योजनाओं में तो प्रीमियम बैंक सेक्टर तुरंत काट लेते हैं फंड कम होने पर भी माइनस बैलेंश दिखाकर काट लिया जाता है। और जब रिफंड का नंबर आता है तो कागजात की इतनी मांग की जाती है कि प्रीमियम देने वाला मध्यम वर्गीय मुखिया माथा पकड़ कर घुटने टेक लेता है। वित्त मंत्री जी जितनी मासूमियत से कैमरे के सामने घोषणा करते हैं और जनता के फायदे का वचन देते हैं। भुगतान के समय पर इन योजनाओं की नियम व शर्तें अपना रूप और रंग दोनों बदल लेते हैं। प्रारंभ में कुछ और भुगतान के समय पर कुछ और नजर आते हैं।
इस योजना में भी दस से पंद्रह हजार करोड़ खर्च करने का अनुमान सरकार ने बताया,  दो हजार उन्नीस में लोक सभा चुनाव है, स्वास्थ्य इफ्रास्ट्रक्चर उतना सुदृण नहीं है, सरकारी अस्पताल की तुलना प्राइवेट संस्थानों से की नहीं जा सकती, डाक्टर्स काम के प्रेशर की वजह से आत्महत्याएं कर रहे हैं। कुल मिलाकर सरकार अपने दिन अच्छे करने के चक्कर में आने वाले चुनावों का वोट बैंक तैयार कर रही है। और इस तैयारी का खर्च जनता से प्रीमियम जनता की बचत और सैलेरी खातों, सेस जैसे उपकरों के उठा रही है, आखिरकार कब तक सरकारी योजनाओं की नाव में बैठकर सरकार जनता से प्रीमियम, टैक्स, टैक्स पर भी उपकर, लेकर नौकरी पेशे वाले नागरिकों को लूटती रहेगी। हम सब यह जानते हैं कि उन लाभान्वित होने वाले पचार करोड नागरिकों में बेचारे मध्यम वर्ग के लोग नहीं आएगें, उनमें जुगाडू, पहुंच वाले, पहचान वाले, बीमा कंपनियों के कर्मचारियों के रिश्तेदार, डाक्टरों और हास्पीटल में काम करने वाले लोग और उनके रिश्तेदार , और तो और सरकारी अमलों के आस पास के महानुभाव ही लाभान्वित होंगे। मध्यम वर्ग के पास मात्र दिन भर की नौकरी, महीने की दस तारीख को तनख्वाह, डर की वजह से पालिशियों की प्रीमियम, और रात में सोने से पहले  टीवी चैनलों में चल रहे राजनैतिक ड्रामे और नौटंकी की बहस ही आएगा। बल्ले बल्ले तो उन लोगों की हैं जिन्हें कभी रिबेट दिया जाता है, जिनके बैंक लोन मेंछूट दी जाती है, जिनके पास अकूट धन और सत्ता का सुख है।
अनिल अयान
९४७९४११४०७

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

आओ बच्चों तुम्हे दिखाए झांकी पटाखिस्तान की

आओ बच्चों तुम्हे दिखाए झांकी पटाखिस्तान की
इस बार की दीवाली भी नये रंग ले कर आ रही है। नवंबर दो हजार सोलह के आदेश जिसके तहत दिल्ली एनसीआर में पटाखों की बिक्री और भंडारण पर रोक लगाने पर आगे इस वर्ष भी जारी रखा। पटाखो के विक्रय पर रोक, पटाखों के फोड कर उत्साह जाहिर करने पर रोक, प्रदूषण के हवाले को ध्यान में रखकर इस रोक बरकरार रखा गया है। कभी कभी इन रोकों को अन्य माध्यमों से देखने का प्रयास नहीं किया जाता। न जाने कितने सवालात अंतर्मन में उठ जाते हैं। कभी दही हांडी को लेकर आदेश आ जाता है। कभी दुर्गाप्रतिमाओं और गणपति विसर्जन पर आदेश जारी कर दिये जाते हैं। कभी विदेशी पटाखों पर रोक कभी विदेशी सामानों पर रोक लगा दी जाती है। ऐसा महसूस होता है। किसी दिन प्रदूषण का हवाला देकर विभिन्न अवसरों पर आयोजित होने वाली यज्ञ और हवन पर भी रोक लगा दी जाएगी। दियों और मोमबत्तियों को जलाने में भी रोक लगा दी जाएगी। छमा सहित महसूस होता है कि किसी दिन न्यायालय द्वारा अंतिम संस्कार में जलने वाली लकडी की चिताओं को जलाने में रोक लगा दी जाएगी। क्या कभी जीव जंतुओं की बलि प्रथा पर न्यायालय रोक नहीं लगाने की सोचता। बच्चों का उत्साह जिस तरह पटाखों फुलझडियों के लिए चरम पर होता है उसको रोकना कितना सही है यह समझ के परे हैं। इतना ही नहीं व्यवसाइयों के व्यवसाय पर भी यही आलम देखने को मिल रहा है। अबतक कुल पटाखे का कारोबार लगभग सातहजार करोड रुपये का है। इसमें दीवाली पर लगभग पांच हजार करोड का कारोबार होता है, इसमें चीनी पटाखों का कारोबार दो हजार पंद्रह सोलह में नौ सौ करोड, दो हजार सोलह में पंद्रह सौ करोड और आगामी दो हजार सत्रह में पच्चीस सौ करोड का कारोबार करने की आशा रही है। इस रोक की वजह से तीस प्रतिशत लगभग नुकसान होने के आसार नजर आ रहे हैं। यह बात समझ के परे है कि दीवाली के अलावा भी हम विभिन्न अवसरों, उत्सवों में राजनैतिक, पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक अवसरों पर फुलझडियों,बंबों, पटाखों का प्रयोग किया जाता है। इसके चलते कितना प्रदूषण होता है इसका मूल्यांकन करके इन अवसरों पर रोक क्यों नहीं लगाया जाता है। यदि प्रतिबंध इतना महत्वपूर्ण है तो हर जगह प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जाता है।
हमारी सरकार बार बार यह अपील करती है कि विदेशी पटाखों और सजावटी लाइटों का उपयोग ना करें। देशी उत्पादों का प्रयोग करके देश के विकास में योगदान दें। अब यह जानने का विषय है कि हमारे देश में देशी पटाखों की स्थिति क्या है। विक्रय मूल्य कितना है। क्या आम जन उसे खरीद सकते हैं। हम दीवाली की बात करते हैं ऐसा कोई त्योहार नहीं है जिसमें हमारे देश में चीनी और जापान का सामान आयातित किया जाता है। हमारा बाजार चीन के सामानों के दम पर फायदे का गुमान भरता है। क्योंकि चीनी उत्पादोंमें तीस से पचास और सत्तर प्रतिशत तक का फायदा मिलता है और तो और गारंटी का कोई टेशन नहीं होता है। हम क्या बडे बडे मीडिया से जुडे हुए एमएलए और एमपी तक , अभिनेता और अभिनेत्रियां, बडे बडे बिजनेशमैन, और खिलाडी विदेशी माल और उत्पाद का प्रचार प्रसार करने के लिए ब्रांड एम्बेस्डर बनते हैं। उनको इतना फायदा होता है, साइनिंग एमाउंट मिलता है इसका कोई जवाब नहीं है। पटाखों की बात की जाए तो विदेशी पटाखों के परे देशी पटाखों के इस्तेमाल पर क्या प्रदूषण नहीं होगा। भले ही हिंदूवादी संगढनों ने इसे वामपंथ और दक्षिण पंथ के बीच का मुद्दा बनाकर संप्रदायिक बहस का रास्ता खोलने का प्रयास किया है। किंतु सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर कोई भी धार्मिक विवेचना करने से मना कर दिया। नई दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने दो साल पहले आड और इवेन नंबरों की कारों को अल्टरनेट दिन में चलने का नियम भी लागू कर पर्यावरण को बचाने का प्रयास करने का स्वांग रचा था परन्तु उसको दोबारा इस्तेमाल नहीं लाया गया। इस फार्मूले को आगामी रूप से जमींजोद कर दिया गया। पटाखों की एम आर पी भी इस बार जीएसटी के चलते दस से पंद्रह प्रतिशत तक इजाफा किया गया है। इसके चलते मुनाफे के साथ टैक्स की बढोत्तरी के आसार पर भी सरकार के मुख पर ताला लगाहुआ है। इसके अलावा दूसरा तर्क देंखें तो क्या प्रदूषण का स्तर डीजल गाडियों के चलने में विशेषकर एक हजार सीसी से अधिक छमता वाले वाहनों के प्रयोग से बढता नहीं है। इसका भी जवाब प्रदूषण बोर्ड के पास नहींहै।
मुझे तो महसूस होता है कि हम ज्यादा तटस्थ नहीं हैं। हमारा कानून तटस्थ नहीं है। एक राज्य के लिए अलग कानून है अन्य राज्यों के लिए अलग कानून है। महानगरों के लिए कानून को सख्त कर दिया जाता है और अन्य नगरों के लिए व्यवसाइयों के साथ तालमेल बिठाकर हम नियम कायदों मेंढील दे देते हैं।  प्रदूषण बोर्ड के अनुसार दिल्ली को छ सात दिन प्रदूषण को कम करने के बाद  हवा को सांस लेने लायक बनाने की कवायद यह है। अब यह बताइये कि इस कवायद में अन्य राज्यों को क्यों नहीं शामिल किया गया है। दिल्ली में भाजपा विरोधी पार्टी का शासन है तो यह कवायद दौड में बदल दी गई। अन्य राज्यों में इस पार्टी की कृपा दृष्टि के चलते कवायद को पैदल दौड मेंबदल दिया गया। इतना ही नहीं देशी विदेशी पटाखों पर बहुत बहस की जातीहै देशी पटाखों से आवाज और धुंआ कई गुना ज्यादा निकलता है। देशी दियों को बनाने वाले भट्टे आज भी पारंपरिक तरीकों से इस्तेमाल किए जाते है। क्या इसमें प्रदूषण नहीं फैलता है। क्या इनका व्यवसायिकीकरण क्यों नहीं किया गया। इनको नई तकनीकियों का प्रशिक्षण क्यों नहीं दिया गया। ताकि ये कम लागत में अच्छे उत्पाद तैयार कर सके। हम सब देशी उत्पाद तो उपयोग करे किंतु क्या ये उत्पाद सुलभ सहज और आसानी से हर वर्ग के लिए उपलब्ध हैं। इनका जवाब किसी के पास नहीं है। मेक इन इंडिया में इस समस्या का समाधान क्यों नहीं खोजा गया है। हमारे विद्युत उत्पादों के पास इस तरह के उत्पाद क्यों नहीं पैदा किए गये जिसमें कि हम सस्ते दर से कम बिजली खर्च वाली सजावटी लाइटों का प्रयोग कर सके। पटाखा कंपनियों से पूंछिये कि क्यों उनका व्यवसाय चीनी पटाखे और बंबों के आयात होने पर प्रभावित हुआ है? इसका समाधान हमारी सरकार और न्याय व्यवस्था के पास नही है। हम देश में बार बार देशी समान उपयोग करने का राग अलापते हैं किंतु विदेशी आयात पर सरकार खुद रोक नहीं लगाती है। देशी उद्योंगों को विश्वस्तर की तकनीकि प्रशिक्षण  प्रदान नहीं करती है और दोगली दोमुही बात करके सबको खुश करने की कोशिश में लिप्त होती है। प्रदूषण को कम करना है तो पटाखों फुलझडियों और बंबों में भी वर्गीकरण करके निम्नतम प्रदूषण करने वाले उत्पाद को त्योहार की खुशी के लिए प्रतिबंध से मुक्त किया जा सकता है। ध्वनिप्रदूषण, जल प्रदूषण, और वायु प्रदूषण के मानकों की सीमा के चलते हमे दूसरे रास्तों पर भी विचार करना चाहिए। यदि नियम कायदों का आदेश हो तो हर राज्य में एक समानपालन होना चाहिए चाहे वो किसी भी राजनैतिक पार्टी से ताल्लुकात रखे। विशेषकर मुद्दा जब धार्मिक, सामाजिक, और पर्यावरण पर जाकर केंद्रित हो जाए। हर वस्तु को बंद करना किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। यही नैतिक आधार होना चाहिए।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

नोटों-वोटों की दीवाली में छिपा राजनैतिक डर

नोटों-वोटों की दीवाली में छिपा राजनैतिक डर
सन दो हजार चौदह के चुनाव में मोदी सरकार का चुनावी मुद्दा अगर काला धन था तो दूसरा मुद्दा जीएसटी था, इसके साथ दुश्मनों को धूलचटाने की बात तो हम सबको भूली ना होगी। इसके साथ एक देश एक टैक्स का नारा देकर जिस तरह जीएसटी की शुरुआत हुई वो काबिले तारीफ थी। इस काबिले तारीफ काम को भाजपा ने मूल मंत्र मान कर देश में खूब प्रचार प्रसार किया। दिवाली के पहले तोहफा दे कर माननीय ने गुजरात की चांदी कर दी। और अन्य राज्यों को यह सोचने में मजबूर कर दिया कि जरूर यह दिवाली नहीं गुजरात के चुनाव का प्री गिफ्ट हैं। खाखरा और गुजराती पांपड जैसे उत्पाद में तो जिस तरह से जीएसटी में कटौती किया गया है वह वाकायै जबरजस्त निर्णय था। एक तरफ राहुल गांधी ने नवसर्जन यात्रा में जामनगर और गुजरात को फोकस करके व्यापारियों का कंधा थामा है वह भी भाजपा के लिये चिंता का विषय बना हुआ है। इसका परिणाम भी कहीं ना कहीं यह प्री गिफ्ट है। अरुण शौरी , यशवंत सिन्हा, और शत्रुधन सिन्हा जैसे मुखर नेताओं ने इन ढाई कदम वाले व्यक्तियों को केंद्र में रखकर कठघरे में खडा करने का कोई मौका हाथ से नहीं छोडे।
भाजपा की मजबूरी है कि  इन तीनों महारथियों को निंदक के रूप रखे हुए हैं।  सरकार को नोट बंदी में मनी लांडरिंग  स्कीम बताया इन न्होने। अरुण शोरी ने  जीएसटी मामले में कांग्रेसियों जैसी राय रखी। अरुण जेटली ने तो उन्हें यहां तक कह दिया कि पी चितंबरम के पीछे पीछे नहीं चलना चाहिये। यशवंत और शत्रुघन सिन्हा ने तो सरकार को हर कदम में आइना दिखाया है। अपने ही घर में सरकार से बगावत के लक्षण इनमें दिखने लगे हैं। यह बात अलग है कि इनकी बातें भी अधिक्तर काम की हो जाती है।  शिवसेना ने तो इस मुद्दे में कूद कर यहां तक बयान बाजी कर दी कि यह अब व्यापारियों का भाजपा के अंदर डर का परिणाम है। पेट्रोल की कीमतों में बढोत्तरी और जीएसटी दरों में बढोत्तरी भी गुस्से का प्रमुख वजह मानी गई। जीएसटी की मूल समस्या साफ्टवेयर भी है। इन्फोसिस को इसका प्रयोग कर पुष्टि करने से पहले ही सरकार ने रातो रात एक कर लागू तो कर दिया अब यथार्थ को भोग रही है। नोट बंदी के समय पर  दो लाख तक का सोना खरीदने के लिये पहले पैन की अनिवार्यता और अब उसके नियम में बदलाव करके जरूरत को खत्म करना कहां की बुद्धिमत्ता है यह समझ के परे है। उस समय  नोटबंदी के प्रभाव से काले धन को सोने में बदलने के लिये यह कदम उठाया गया था। क्या अब वह काला धन इस निर्णय को वापिस लेने से रुक जाएगा। अब तो ऐसा लग रहा है कि काले धन को पीला करने का रास्ता खोल दिया गया है। छ अक्टूबर के पहले वित्त मंत्री यह कह  रहे थे कि जीएसटी की वर्तमान व्यवस्था में कुछ गलत है। दीवाली के एक सप्ताह पहले ऐसा क्या हुआ कि इस इसमें खामी नजर आने लगी। इसका जवाब किसी के पास नहीं है। जिस ईबिल के लिए इतनी मसक्क्त करनी पडी उसको अभी फिलहाल टाल दिया गयाहै। ई वे बिल की व्यवस्था लागू करने के बाद ही जी एसटी का असली प्रभाव समझ में आएगा।
जनवरी में खत्म होने वाली गुजरात विधानसभा का असली तोहफा तो भाजपा को क्या मिलेगा यह तो आने वाला दो हजार अठारह साल बताएगा। नोटबंदी, जीएसटी, और मंहगाई वो जहरीले नाग हैं जो निगल चुके हैं मंहगाई लगातार बढ रही है। चुनाव के चलते  जिस तरह से भाजपा सकते में है वह जीएसटी के सूत्र को बदलाव करने के अलावा कोई रास्ता मुहैया नहीं कराता है। सूरत अहमदाबाद, जैसे औद्योगिक शहर के वोट बैंक भाजपा के लिये ज्यादा महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनके जैसे कई शहर विधानसभा में समीकरण बदल सकते हैं। छॊटे और मध्यम उद्योगों के प्रति भाजपा की नीतियां जिस तरह विरोधी होती जा रही है वो भी कहीं ना कहीं पर डर का प्रमुख कारण है। विधानसभा चुनाव के फायदे के लिए कई सत्ताइस प्रकार के उत्पादों में परिवर्तन किया गया है। दूसरी तरफ पेट्रोलियम  बिजली और रियल स्टेट पर जीएसटी का कोई रोडमैप सरकार के पास नहीं है।
खेतीकिसानी वाले उत्पादों पर जीएसटी को लागू करना कपडा उद्योग को लाभ ना देना भी सरकार की कमजोरी है जो विधान सभा चुनाव में मुख्य मुद्दा बनने वाला है। जब अरुण शौरी कहते हैं कि केंद्र में गुजरात के ढाई लोगों की सरकार है तो गुजरात से मोदी सरकार और मोदी शाह की प्रीति जग जाहिर हो जाती है। गुजरात के स्टेट  ब्रेकफास्ट में जीएसटी को अठारह से पांच प्रतिशत तक लाना भी इसी गुजरात एफिनिटी का उदाहरण है। एक तरफ पटाखों को जलाने से रोकना, पटाखों पर जीएसटी को अट्ठाइस प्रतिशत करना और दूसरी तरफ दीवाली के पहले ही  जीएसटी की दरों को कम करके दीवाली का उपहार देने का ढिंढोरा पीटना । जनता सब जानती है इन सब शतरंज की चालों को। सन एकसठ की फिल्म नजराना का गीत एक वो भी दीवाली थी और एक ये भी दीवाली है उजडा हुआ गुलशन है रोता हुआ माली है। कितना मौजूं है हम सब समझ सकते हैं।
गुजरात को केंद्र मान कर जिस तरह के मूल चूल परिवर्तन किये गए हैं जीएसटी में वह तो पूराने जुमलों के प्रभाव पर पानी फेरने वाले है। पहले जो भी वायदे किये गए वो चूल्हे में चले गए। एक बार फिल चुनावी बिगुल में आम जनता को छला गया और व्यापारियों को लाभ देकर वोट बैंक को बचाने और वोट बैंक में छिपे काले धन को सफेद करने का प्रयास किया जा रहा है। नोटबंदी के बाद जीएसटी का प्रभाव सरकार और भाजपा के लिए अपेंडिक्स बन गई है। ऊपर के गाने में माली के पास ना बगीचे में आने वाली तितलियों  के लिए खाना तक नहीं है। दीवाली के जशन में पटाखों की खुशी को ग्रहण तो लगाया जा सकता है किंतु चीनी सामानों को प्रचार प्रसार करने वाले आइकान के लिए कोई प्रतिबंध सरकार के पास नहीं है। ना ही कोई दूसरा विकल्प देशज रूप से हैं। चुनावी भाषणॊं के आईकान बन चुके हमारे प्रधानमंत्री जी विकास को इतना दौडाए कि अब वह बौरा गया है। चुनाव के लिए रातोरात किए गए एक टैक्स नीतियों को परिवर्तन कर दिया गया है। नुकसान जो व्यापारियों को हुआ वह भी अब तक अंधेरे में छिपा हुआ है। सरकार के पास इन सब के लिए कोई शब्द नहीं है। परन्तु इस बात को सुनकर मन गदगद हो जाता है कि सरकार अब कृषि प्रधान देश को व्यापारी प्रधान देश मानकर उनकी दीवाली मनाने के लिए चुनावी आतुरता जिस तरह से आम जनता के सामने दिखा दी है वह वाकायै यह शाबित करता है कि दीवाली में धन वैभव उलूक वाहन के जरिए ही आती है। चाहे वह उलूक नीति ही क्यों ना हो।
अनिल अयान ,सतना
९४७९४११४०७

बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

आदिकवि का स्मरण-छण

आदिकवि का स्मरण-छण
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वम्गमः शास्वतीः समाः।
 यत्क्रोंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितः।
संस्कृत का यह श्लोक हम सबने अपने पढा नहीं तो सुना होगा ही। आदि कवि के नाम से विख्यात महर्षि बाल्मीकि की जयंति हमने कल ही मनाई होगी। रामचरित मानस के परे भी जिस व्यक्ति ने राम के चरित्र का वर्णन किया वो व्यक्ति ही नहीं महर्षि  संस्कृत का प्रकांड विद्वान और आदिकवि बाल्मीकि ही थे। महर्षि कश्यप और अदिति के नौंवे पुत्र वरुण और चर्षणी के पुत्र बाल्मीकि भृगु ऋषि के भाई थे। इनका दूसरा नाम प्राचेतस भी है दीमक से ढक चुके शरीर की साधना के बाद तो इन्हें दीमदूह बाल्मीकि भी कहा जाने लगा। वो ही ऐसे महर्षि थे जिनका उल्लेख सतयु़ग, द्वापर और त्रेता युग में देखने को मिलता है राम के चरित्र के साथ उनका संबंध जितना गहरा है उतना ही गहरा उनका संबंध कृष्ण के साथ भी रहा। अगर वो राम के लिए ये कहते हैं कि
तुम त्रिकाल दर्शी मुनिनाथा,
विश्व बिद्र जिमि तुमरे हाथा।
तो कृष्ण के जीवन में महाभारतकाल में कुरुक्षेत्र के युद्ध कोजीतने के बाद जब द्रोपदी का यज्ञ सफल नहीं हो पाता तो  बाल्मीकि उसके निवेदन से आते है और अनुष्ठान पूर्ण होता है। इस घतना को कबीर ने लिखा कि
सुपच रूप धार सतगुरु जी आए।
 पांडवों के यज में शंख बजाए।
बाल्मीकि ने अंततः राम के चरित्र का वर्णन किया। राम के चरित्र कोआराध्य मान कर पूरी की पूरी रामायण उन्होने लिखी। इस रामायण में सूर्य चंद्र नक्षत्र की स्थितियों का वर्णन जिस तरह किया गया है वह तो खगोल विज्ञान के जानकार को ही करना चाहिए था। बाल्मीकि का लिखा यह श्लोक आदि कविता के रूप में प्रसिद्ध भी हुआ। हम उन्हें हिंदु दर्शन के अतिरिक्त भी देख सकते हैं। हमें यह पता होना चाहिए कि आज के समय में अगर तुलसी बाबा को सब लोग जानते हैं और बाल्मीकि को तुलनात्मक कम लोग जानतेहैं तो उसके पीछे यही कुनबे बाजी जिम्मेवार है। राम को केंद्रित करके दोनों ने अपने विचार लिखे किंतु रामचरित मानस घर घर की पूजा हो गई। बाल्मीकि रामायण के तथ्य ज्यादा परंपरागत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संबंधित है।
वनवास में राम का बाल्मीकि से निर्देशन लेना और सीता के परित्याग के बाद बाल्मीकि का सीता को प्रश्रय देना लवकुश का पालन पोषण ज्ञानी बनाना भी बाल्मीकि के तेज का ही प्रभाव था। वर्तमान में जिस तरह के आचार विचार चल रहे हैं उसक चलते कबीर, रहीम, तुलसी, बाल्मीकि, और अन्य ऋषि मुनियों को कुनबों में बांट दिया गया है। किसी कवि और कलमकार का एक ही धर्म हैं वह है मानव धर्म और मानवधर्म की सेवा करना। आजकल तो इन साधू संतो और ऋषि मुनियों की जयंतियां भी इनके समाज के लोग मनाते हैं जैसे कबीर के लिये कबीर पंथी, बाल्मीकि के लिए बाल्मीकि समुदाय के लोग इनको अपने कुनबे में उठाए घूमते फिरते रहते हैं। अब सोचने वाला विषय यह है कि इस प्रकार के आयोजनों में उसी समुदाय के लोगों के द्वारा उत्तराधिकार स्थापित करना और अन्य व्यक्तियों की प्रतिभागिता से परहेज करना न्यायसंगत नहीं है। कवि लेखकम, संत पीर फकीर, औलिया अगर इस गुटबाजी से परे रखकर आस्था से जुडे हों तो लाभप्रद होते हैं। अन्यथा संकीर्ण मानसिकता के काल कपाल क्रिया में विलुप्त होते चले जातेहैं। इतने बडे कवि का आयोजन उतना ही सीमित होता है। सीमित हुआ। एक पक्ष पर बात करके उसके रचनाकर्म को एक पक्षीय बना दिया जाता है। यह वैचारिक स्वतंत्रता का हनन हैं। हम अगर इस संस्कृति के वाहक है तो हमें यह अधिकार है हम आदिकवि और अन्य पुरातन से आद्यतन कलमकार के बारे में किसी नेपथ्य के पक्ष को भी उजागर करें। यही समयपरक सार्थकता होगी।

अनिल अयान ,सतना

शनिवार, 2 सितंबर 2017

शिक्षक खडा बाजार में सबकी मांगे खैर

शिक्षक खडा बाजार में सबकी मांगे खैर
पाँच सितंबर की तारीख यानि शिक्षक दिवस, डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को पूरा देश शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है। एक दिन के लिए शिक्षक को इस बात का भान कराया जाता है कि वह ही समाज का सबसे सम्माननीय व्यक्तित्व है। अन्य सारे व्यक्ति उसके सम्मान के अधीनस्थ हैं। पांच सितंबर के पहले और बाद में शिक्षक का पद, कद, और हद क्या है वह हम सब बखूबी जानते हैं। ऐसा महसूस होता है कि शिक्षक जैसा दरिद्र प्राणी इस समाज में कोई नहीं है। एक मजदूर को भी उससे ज्यादा श्रम का भुगतान प्राप्त होता है। शिक्षक से समाज से लेकर सरकार और प्रशासन तक आदर्शवादी व्यक्तित्व की उम्मीद करता है और यह माना जाता है कि शिक्षक जैसा आदर्श स्वर्गलोक से आया है। इस लोक में प्रकट हुआ है सब की अपेक्षाएं भी वह अपनी जादू की छडी से पूरी कर देगा। उसके पास जैसे अलादीन का चिराग है जिससे बच्चे के अभिभावकों की अपेक्षाओं में भी खरा उतरेगा। विद्यालय प्रबंधन की उम्मीदों का सितारा होगा। समाज की आशाओं का चितेरा होगा। अपने परिवार और सगे संबंधिओं के साथ रिश्तों में भी शिखर में होगा। आखिरकार शिक्षक को इतना महत्वपूर्ण पद दे कैसे दिया जाता है? लेकिन एक बात तो तय है कि सभी लोग शिक्षक से यही उम्मीद करते हैं कि वो किसी से कुछ उम्मीद ना रखे। यह गल्ती से भी शिक्षक ने इसके बारे में सोच लिया तो उसे समाज का दलिद्र और लालची मानव समझ लिया जाता है।
वर्तमान में शिक्षक का कद कई रूपों में हम सब देख सकते हैं। कभी वो शिक्षक होता है। कभी शिक्षाकर्मी बन जाता है। कभी संविदा अनियतकालिक शिक्षक बन जाता है। कभी गुरु जी बन जाता है। कभी अतिथि शिक्षक बन जाता है। समाज में स्वास्थ्य से लेकर जनगणना तक, समग्र आई डी से लेकर आधार कार्ड तक के आंकडों को इकट्ठा करने में शिक्षकों को निपुण माना जाता है। शिक्षक को और तो और इन कामों को पूरा न कर पाने पर सरकार इनकी वेतन वृद्धि रोक लेती है या मुख्यालय में अटैच कर देती है। शिक्षक को एक बार खराब परीक्षा परिणामों के लिए वेतन वृद्धि रोकने की सजा मिले तो समझ में आता है किंतु इन कामों के वेतन वृद्धि रोकना समझ के परे हैं। अरे भाई जब समय से वेतन जब सरकार नही तब तो उसकी ब्याज नहीं देती है। परन्तु वेतन वृद्धि रोकने के लिए हमारे आलाअफसर आगे- आगे लुतुर-लुतुर करने लगते हैं। आज के समय पर प्रायोगिक रूप से शासकीय विद्यालयों के शिक्षकों को सीएम आनलाइन का जवाब देने, छात्रवृत्ति से लेकर, समग्र आईडी के कलेक्शन, प्रतिभा पर्व मनाने, और शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन का प्रभार का भार ढोने से फुरसत नहीं मिलती है, बचे कुचे समय में से अधिक्तर समय वोटर लिस्ट में नाम हटाने और नये जोडने का काम करना पडता है और अंततः कक्षाओं में जाकर पढाने का समय मिलता है। इसके बाद फिर अपेक्षा की जाती है कि इनका परीक्षा परिणाम प्राइवेट विद्यालयों के परीक्षा परिणामों से बेहतर आए। यह भी एक अतिशयोक्ति से कमतर कुछ भी नहीं है।
शिक्षक दिवस में शिक्षकों के काम में समान वेतन समान काम की बात नहीं की जाती है। उनके विषय उन्नयन पर कोई काम नहीं किया जाता है। सम्मान समारोहों में सम्मानित शिक्षकों की उम्र देखकर और अनुभव देखकर सूचियाँ तैयार की जाती है। यदि एक लेक्चर एक विद्यालय में पढाता है तो उसे राजपत्रित अधिकारी का दर्जा प्राप्त है किंतु उसी विद्यालय में संविदा शिक्षक वर्ग एक के शिक्षक को राजपत्रित अधिकारी से कोसों दूर रखा जाता है। एक दूसरे उदाहरण में अगर हम प्राथमिक और पूर्वमाध्यमिक विद्यालयों में नजर डालें तो विद्यालय में बच्चों और शिक्षक-शिक्षिकाओं के अनुपात की कहानी कुछ और ही होती है। आओ मिल बांचे कार्यक्रम में जन प्रतिनिधि इन विद्यालयों में जाकर अपना ज्ञान बच्चों को प्रदान जरूर करते हैं। किंतु एक दिन में क्या होता है। इन विद्यालयों में अधिक्तर समय मध्यान भोजन की तैयारी करवाने, भोजन करवाने, और उसके बाद बचे कुचे फंड पर हाथ मारने के लिए रखा जाता है। इन विद्यालयों में कितने दिन किताबों को पलटा जाता होगा यह तो यहां का स्टाफ बखूबी जानता है। गुरु जी का कद पुराने जमाने में सबसे ज्यादा हुआ करता था किंतु वर्तमान में शिक्षा गांरटी शालाओं के लिए इनका उपयोग सरकार करती है। इनकों पूरी तरह से निम्न श्रेणी शिक्षकों की कैटेगरी में रखा जाता है। यह समझ के परे है कि शिक्षा की गारंटी कैसे ली जा सकतीहै। साक्षरता को प्रचारित करना समझ में आता है किंतु शिक्षा की गारंटी लेने वाली शालाओं का विषय गत गहराई हम सब खुद समझ सकते हैं।
प्राइवेट विद्यालयों का यह है कि शासन किसी भी जगह पर किसी भी नगर पर कितने भी विद्यालयों को मान्यता दे देता है। विद्यालय के पास उचित जरूरी संसाधन हैं या नहीं, विषय के शिक्षक प्रशिक्षित हैं कि नहीं है। इससे ज्यादा कोई फर्क नहीं पडता है। एक कालोनी में कुकुरमुत्ते की तरह विद्यालय मिल जाते हैं। बिना किसी गुणवत्ता को जाने इन शिक्षा की दुकानों में शिक्षक जैसे नये युवा मिल जाते हैं जिनक प्रशिक्षण से ज्यादा कोई वास्ता नहीं होता है। एक दो किलोमीटर के दायरे में हर गली कोने में दो चार स्कूल मिल ही जाते हैं। मान्यता माध्यमिक शिक्षा मंडल की होती है  किंतु किताबें सीबीएसई पैटर्न की प्राइवेट पब्लिकेशन की विद्यालयों में चलाई जातीहै। इससे शिक्षा विभाग को कोई लेना देना नहीं होता है। उडनदस्ता में जाने वाले अधिकारी अपनी जेब गरम करके मामले को रफा दफा करने की आदत से मजबूर होते हैं।इन विद्यालयों को शिक्षक रूपी प्राणी मात्र पढा लिखा गुलाम नजर आता है। वो झाडू लगाने का काम बस नहीं करता है। विद्यालय का बस चले तो वह काम भी  शिक्षक  से करवा ले।शिक्षक का कद जितना बढा चढा कर इस दिन दिखाया जाता है। वास्तविकता में शिक्षक की हद अन्य दिनों में विद्यालयों में देखी जा सकती है। शिक्षक के ना कोई भविषय निधि होती है। ना पेंशन का प्रावधान होता है। ना चिकित्सा की कोई व्यव्स्था होती है और ना ही सुरक्षित नौकरी होती है।जब मैनेजमेट का मूड बदला, शिक्षक ने किसी बात से इंकार किया तो मैनेजमेंट ने दूसरा रास्ता खोज कर बाहर का रास्ता इन शिक्षकों को दिखा देता है। सरकार को इन प्राइवेट किस्म के शिक्षकों से कोई वास्ता नहीं होता है।इन शिक्षकों का कोई माई बाप या कोई संगढन नहीं होता है। यदि संगढन बने तो वो भी मात्र कुछ समय तक के लिए जब तक कि पदाशीन दायित्वधारियों के स्वार्थ सिद्ध हो रहे हैं। इन शिक्षकों पर स्कूल प्रबंधन का हाथ जब तक हैं तब तक इनकी नौकरी हैं इसलिये इनमें बहुत से शिक्षक तो मख्खनबाजी में तल्लीन रहते हैं। शिक्षकों पर जिस ट्यूशन को लेकर लांछन लगाए जाते हैं उस बारे में यह कहना ज्यादा सही रहता है कि आज के समय में ट्यूशन एक सोशल स्टेटस सिंबल बन गया है। जितना मंहगा ट्यूशन उतना ऊँचा स्टेटस सिंबल, शिक्षक जितना कहे कि उसके पास टाइम नहीं है अभिभावक अपने बच्चों को उनके घर तक में छॊडने को तैयार रहते हैं। शिक्षा के बाजार में खडा शिक्षक दूसरों के खैर तब भी मांगता है।
शिक्षक दिवस के बहाने इतनी सारी बातें विभिन्न बिंदुंओं में हो गई हैं कि लगता है कि शिक्षक जैसे अवतरित मानव के लिए एक दिन क्यों।स्व. राधाकॄष्णन जी अगर यह लिख गये होते  कि राष्ट्रपति बनने से पूर्व और पश्चात उन्हें शिक्षण पेशा कैसा लगता है तो हम सब शिक्षकों के कलेजे में ठंडक मिल गई होती कि उनके जन्मदिन में शिक्षकों को क्यों बलि का बकरा बनाया गया। वास्तविक शिक्षक दिवस शिक्षकों के लिए तो तब होगा जब शिक्षक दिवस के दिन शिक्षकों को कुछ भविष्य गत लाभ हो। उसका शिक्षण पेशा सुरक्षित हो। उसका परिवार सम्मान से जीवन यापन कर सके। शिक्षक को सम्मान स्वरूप उसके स्तर के अनुरूप वेतन मिले, उसकी भविष्य निशि उसके पास सेवानिवृति होने के बाद शिक्षा विभाग समय से पहुंचा दे। शिक्षकों की पेंशन उन्हें और उनके परिवार वालों को मिले। शिक्षकों को सिर्फ पढाने और भविष्य सुधारने का काम सौंपा जाए। शिक्षकों को पढा लिखा गुलाम, और समाज का लगुआ या बरेदी ना समझा जाए। शिक्षकों को सम्मान से समाज में रहने कहने और ज्ञान को स्थापित करने का अवसर दिया जाए। शिक्षा के उद्योगें में उसको कोल्हू का बैल ना समझा जाए। विद्यालय और अभिभावकों के बीच की कडी के रूप में शिक्षकॊं को स्थापित किया जाए। शिक्षक आज भी पारस की तरह है चाहे वो मणि हो या पत्थर।आज आवश्यकता है समाज में इन पारस को पहचानने की और उचित सम्मान देने की।
अनिल अयान
सतना
९४७९४११४०७

शनिवार, 26 अगस्त 2017

देश के लिये सिर दर्द बना बाबावाद

देश के लिये सिर दर्द बना बाबावाद
भारत को हरि भूमि कहा जाता है। यहां लोग साधू संतों महात्माओं को जी भर के पूजते हैं। जी भर के पूजने के चक्कर में इन बाबाओं और साधू संतों के हाथों में अपने घर की इज्जत को भी सौंप देते हैं। दान दक्षिणा का तो कोई पैमाना ही नहीं होता। बाबाओं के तथाकथित भक्तों को वोट बैंक बनाकर राजनैतिक पार्टियां भी मजे लूटती हैं। सरकार की तरफ से भी इनकी खूब खातिर दारी होती है। इसी लिये तो सरकार भी मौनी बाबा बन जाती है जब इन बाबाओं और साधू संतों को न्यायालय और जेल  की राह दिखाई जाती है। अपराधों की फेहरिस्त बढने के बावजूद सरकार और प्रशासन मौन हो जाता है। इससे बडे सम्मान की बात इन बाबाओं के लिये क्या हो सकता है। इन बाबाओं को पहले पाला पोशा जाता है। कुकुरमुत्तों की तरह जब इनके सम्राज्य का विकास हो जाता है तब इनकी फसल को काटने में सरकार और प्रशासन को पसीना आ जाता है। विगत बाबा और साध्वियों ने तो देश में भयंकर उत्पात मचाया है। हर जाति के लोग तो साधू और संत बन जाते हैं। और अपना दरबार लगा लेते हैं। हमारे भक्त तो अंधभक्त होते हैं जहां देखा कि पंडाल लगा है और प्रवचन चल रहा है वहीं जाकर शामिल हो गये। इनके दरबार में तो सिनेमा और हस्तियों का जमावडा लगने लगता है। इन्हीं दरबारों से आश्रमों को चंदा मिलता है। आश्रमों में मुफ्त की रोटी खाने और राम राम गाने के लिये ये लोग बाबाओं के पक्के चेले बन जाते हैं। और फिर धीरे धीरे बाबा और उनके डेरे विवादित होते चले जाते हैं। चेलों और चेलियों की सेवा में बाबा मलाई चाटते रहते हैं। इसके चलते बाबाओं का बाबावाद चरम सीमा पर होता है।
इस समय पर राम रहीम,आसाराम, रामपाल, राधे मां जैसे लोग इसी का उदाहरण है। हमारी अंध भक्ति और अंधभक्ति का समर्पण का परिणाम होता है कि ये बाबा ज्ञान देने के साथ साथ अस्मिता लेने का भी काम करते हैं। यह हाल पूरे देश में चल रहा है। जहां जहां मठ और आश्रम बने हैं वहां वहां जिस्म का खेल खुले आम कोड वर्ड के जरिये चरम पर हैं। यह हाल सिर्फ हिंदुओं के डेरे का बस नहीं है। बल्कि हर धर्मों में अपना अपना रंग दिखाता यह अपराध फलता फूलता है। हमारे देश में हिंदू बाहुल्य देश होने की वजह से बाबाओं का प्रचार प्रसार होजाता है जबकि मौलवियों , काजियों, पारसियों, फादरों को मीडिया का कैमरा भुला देता है। इन बाबाओं के खाते में मर्डर केश, भक्तों को नपुंसक बनाने का केश, मीडिया को खरीदने का केश, सत्तापक्ष के नेताओं को राजनीति में धन धान्य की मदद करने का मुद्दा घेरे रहताहै। इनका परिधान भी चर्चा का विषय बना होता है। इन बाबाओं को जेल में विशेष परिधान भी तो चर्चा का विषय बना होता है।
इन बाबाओं और साधुओं का हिंदु धर्म संस्कृति के साथ कोई लगाव नहीं होता। इनके अनुयायी भक्त कम और उपद्रवी ज्यादा होतेहैं। जो लोग इनके भक्त होते है सजा होने के बाद लोग इनके नाम से अपना मुंह छिपाते फिरते है। सरकारें चाहे कहीं की भी हो, किसी भी पार्टी की हो बाबाओं को उनके प्रभाव से समाप्त करने के लिये पसीने छूट जाते हैं। उनके उपद्रवी  सरकार तो सरकार पुलिस तक के पसीने छूट जाते हैं। सेना को युद्ध का प्रशिक्षण दिया जाता है। उन्हें भी बाबाओं के लिये जब ड्यूटी में बुलाया जाता होगा तो उनका भी आत्म सम्मान कहीं ना कहीं झुक जाता होगा। पडोसी देश इस बात पे हंसते हैं कि भारत भी अपनी बाह्य सुरक्षा को भुला कर आंतरिक सुरक्षा के लिये परेशान है। हां यह तो तय है कि ये बाबा उन बाबाओं और साधुओं से कुछ अलग होते हैं जो नागा होजाते हैं। जो  गंगा और यमुना के तीर में भभूत लगाये दिन रात तपस्या में लीन रहते हैं। जिनकों किसी मठ, किसी आश्रम, किसी डेरे की आवश्यकता नहीं होता। जिनका प्रवचन से कोई लेना देना नहीं है। भारत ऐसे बाबाओं के लिये जाना जाता है। ये बाबा तो ढपोरशंखी हैं। और हमारे देश के राजनीतिज्ञ  इन्हीं ढपोरशंखियों के चरणों में गिर कर अपनी सत्ता के लिये भीख मांगते हैं। इसके लिये जितना ये बाबा जिम्मेवार हैं। उससे कहीं ज्यादा हमारी अंधभक्ति भी दोषी है। हमारी अंध भक्ति हमें विवेकहीन बना देती है। हम अपने गलत कामों को छिपाने के लिये और काला धन बचाने के लिये ये बाबा ही एक मात्र चारा नजर आता है।
धर्म और संस्कृति वह साधन बन चुका है कि जो चाहे वो इसके अंदर प्रवेश करके इसका दोहन कर सकता है। खुद को भगवान मानने का दंभ पालने वाले ये लोग देश की आस्था को बेचने वाले होते हैं। हमारा देश इन्हें पूजता है और सिर आखों में बैठाता है। अंततः इन्हीं के द्वारा देश की इज्जत को सरे राह नीलाम कर दी जाती है। सरकारें तक इन बाबाओं के भक्तजनों में सुमार होते हैं। इस वजह से देश जलता है, लोग मरते हैं, कत्ल होते हैं पर हमारे देश के मंत्री और प्रशासन मौन धारण करके मूक दर्शक बन जाते हैं। यही मौन इन ढोंगियों को सातवें आसमान में बैठाने के लिये एक वरदान के समान होता है। और यही वरदान मानवता के लिये श्राप बन जाता है। इसका दंश हम सब आम जन भोगते हैं। इस सिरदर्द का इलाज भी हम ही हैं और दवा भी हम ही है। बस हमें इस सिरदरद को पालने से रोकना होगा।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७


रविवार, 6 अगस्त 2017

पनामा भूचाल में धरासाई शरीफ

पनामा भूचाल में धरासाई शरीफ
भारत की तीन चिंतायें और बढ गई है पनामा पेपर्स में नवाज शरीफ की ताजपोशी खत्म होने से भारत की तीन चिंतायें और बढ गई है। पहली पाक सेना का मेजर बाजवा की अगुआई में मजबूती। दूसरी भारत विरोधी आतंकी संगढनों को बढाने वाली छूट और तीसरी भारत के काश्मीर में पाक सेना का बढता हस्ताक्षेप। शाहिद अब्बासी भले ही पाकिस्ता के अंतरिम प्रधानमंत्री बन गये हैं किंतु निर्धारित समय के बाद तो पाक प्रधानमंत्री पद पर कोई और शक्श बैठेगा। जो भारत के साथ मजबूत रिश्तों को टोडने का प्रयास करेगा। पाकिस्तान में शरीफ को भारत का हमदर्द माना गया। लाहौर निमंत्रण से पाक सेना और सैनिक सकते में थे।  यह सभी को पता है कि पाकिस्ता की विदेश नीति रावलपिंडी में तैयार की जाती है विदेश मंत्रालय तो इसे अमल में लाता है। नवाज शरीफ के प्रयासो को कट्टरपंथी ताकतों के द्वारा और पाकिस्तानी सेना के द्वारा हमेशा ही खत्म किया जाता रहा है। पनामा पेपर्स तो मात्र बहाना था जिसके चलते पाकिस्तान की सत्ता डगमगा गई। ऐसा पहला मौका नहीं था जब शरीफ की शराफत को पाकिस्तानियों ने आडे हाथों किया हो। दो बार इसके पूर्व भी पाकिस्तान ने शरीफ की शराफत के चलते कुर्सी से उतार कर जमीं में बैठा दिया था। हालांकि शरीफ इसके लिये पहले से तैयार थे। पनामा तो उनका तीसरा अनुभव था। उनके बाल यूं ही धूप में सफेद नहीं हुये थे। उन्हें यह पदवी राजनैतिक विरासत में अता हुयी थी। हां इस बार ना को कोई जनता थी ना कोई परवेज थे था तो न्यायालय के जज और उनका फैसला।
बीते साल ब्रिटेन में पनामा की ला फर्म के सवाकरोड टैक्स डाक्यूमेंट्स लीक हो गये थे जिसमें पुतिन, नवाज शरीफ, शी जिनपिंग और मैसी ने कैसे अपनी बडी दौलत टैक्स हैवन देशों में जमा की थी। वो बस नहीं एक सौ चालीस नेताओं और सैकडों के सेलीब्रेटीज के खातों के नाम खाते एमाउंट और इन्वेस्टमेंट के बारे में जानकारी थी। टैक्स हैवन वो देश हैं जहां पर इनवेस्टमेंट करने के बाद व्यक्ति की पहचान का खुलाशा नहीं किया जाता है। इसमें विश्व की चार लाख सीक्रेट इंटरनेशनल कंपनीज के भी आंकडे थे। सन सतहत्तर में बनी मोसेक फोंसेक कंपनी के हेड क्वार्टर पनामा में होने की वजह से इस कंपनी से अधिक्तर पेपर्स गायब हुये। ऐसा नहीं है कि इसमें सिर्फ पुतिन से लेकर शरीफ बस शामिल हैं। इसमें भारतीय नाम भी शामिल हैं। पांच सौ से ज्यादा नाम भारतीय है। मोदी सरकार ने सेंट्रल बोर्ड आफ डायरेक्ट टैक्सेस को यह जिम्मा सौंपा जिसके चलते आयकर विभाग ने इस पर नोटिस भी भेजी थी। अभी तक इन पेपर्स के रसूखदारों पर निर्णय अधूरा है। एक तरफ सरकार ब्लैक मनी अर्थात काला धन वापिस लाने के लिये प्रतिबद्धता शामिल करती है। अब देखना है कि पनामा पेपर्स से कितने चेहरे सामने आते हैं। पाकिस्तान के प्रधान का इस तरह से देश के न्यायालय के द्वारा कुर्सी से नीचे भेजने का संकेता पनामा की महत्ता को भी विश्व में और बढा देता है। अन्य संबंधित देशों में भी इस निर्णय का प्रभाव देखने को मिलेगा।
पाकिस्तान की इस अस्थिरता का भारत पर क्या प्रभाव पडेगा यह देखने और जानने का विषय है।राजनैतिक अस्थिरता के इस दौर में पाकिस्तान की सेना किस ओर करवट लेती है यह भी भारत के लिये भविष्य के गर्त में छिपा प्रश्न है। पिछले साल से शरीफ की शराफत पर जिस तरह से शवाल उठाये जा रहे थे उससे तो यह तय हो चुका था कि एक ना एक दिन शरीफ को जमीं में आना पडेगा और इस बार कोई मुशर्रफ नहीं होगें इस बार उनका कोर्ट ही उन्हें गुनहगार कुबूल कर लेगा। राजनीतिक अस्थिरता के चलते सेना के हौसले और बढेंगें। आतंकी संगठनों को राजनीतिक बंधनों से मुक्ति मिलेगी। पठानकोट और ऊडी हमलों के बाद जिस तरह की तल्खी बढी थी वह और ज्यादा गहरी होती चली जायेगी। इस सब रूझानों के चलते पाक सेना के साये में भारत पाक के रिश्ते सुधारने की बजाय बिगाडने की स्थिति ज्यादा निर्मित होगी। कहा जाता है कि कट्टरता के पैमाने में शाहिद अब्बासी जो पेट्रोलियम मंत्रालय सम्हाल रहे थे वो आगामी डेढ महीने में इस रिश्ते को और आग के हवाले करने के लिये दिन रात एक कर देगें। उसके बाद शरीफ के भाई शहबाज शरीफ के चुनाव लडकर पाकिस्तान की कुर्सी में काबिज होने की खबर है। पाकिस्तान की जनता और सेना नहीं चाहती है कि सन अठारह के चुनाव में भारत की तरफ झुकने वाला व्यक्ति सत्ता में काबिज हो।  भविष्य में माहौल कुछ भी पैदा हो परन्तु भारत और पाकिस्तान के बीच तल्खी का दौर और बढेगा और साथ ही साथ इस दौर में दोनों देशों के बीच सैन्य संघर्ष तीव्रता के साथ अपने पैर पसारेगा।

अनिल अयान,सतना

गर्व है आजाद भारतीय होने पर

गर्व है आजाद भारतीय होने पर
वंदेमातरम सुजलाम सुफलाम मलयजशीतलाम शस्य श्यामलाम मातरम की परिकल्पना करने वाले बंकिम दा आज खुश होंगें की वंदनीय भारत माता अपने स्वतंत्रता के सात दशक पूर्ण कर चुकी है। सन १७५७ से शुरू हुआ विद्रोह जो मिदनापुर से शुरू हुआ वह  बुंदेलखंड और बघेलखंड में १८०८-१२ के समय पर अपने शिखर में था। अंततः सन अठारह सौ सत्तावन जिसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का वर्ष माना जाता है। फिर उसके बाद चाहे बंग भंग आंदोलन हो या फिर बंगाल का विभाजन, चा फिर भगत चंद्रशेखर आजाद युग रहा हो। चाहे करो या मरो वाला अगस्त आंदोलन की बात की जाये। या फिर दक्षिण पूर्व एशिया में आजाद हिंद आंदोलन और आजाद हिंद फौज की भूमिका हो। सब इस स्वतंत्रता से अटूट रूप से जुडे हैं। आज के समय में कितना जरूरी हो गया है ,समझना कि आजादी के मायने क्या है. जिस तरह के संघर्ष के चलते अंग्रेज भारत छॊड कर गये और भारत को उस समय क्या खोकर यह कीमती आजादी मिली यह हमे हर समय याद रखना होगा. आज  ७० वर्ष के ऊपर होगया है भारत अपने विकसित होने की राह सुनिश्चित कर रहा है. वैज्ञानिकता, व्यावसायिकता, वैश्वीकरण के नये आयाम गढ रहा  है. आज के समय समाज, राज्य, राष्ट्र और अन्य विदेशी मुद्दे ऐसे है जिनके चलते स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान में पानी फिरता नजर आ रहा है. ऐसा महसूस होता है कि पहले हम अंग्रेजों के गुलाम थे और आज अपने राजनेताओं के गुलाम हो गये है भारत के हर राज्य अपनी जनसंख्या बढाने में लगे हुये है. पहले जहाँ भारत की प्राकृतिक संपदा और मानव संसाधन समुचित थे यहाँ के विकास के लिये आज के समय में भारत को हर क्षेत्र में आयात ज्यादा और निर्यात कम करना पड रहा है, भारत ने जितना विकास किया और विकास दर बढाई है उतना ही भारत की मुद्रा स्फीति की दर में गिरावट हुई है. आज भारत विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आने के लिये जगदोजहद करने में लगा हुया है. आज जो भी राज्य और केंद्र की कुर्सी में बैठ रहा है वह सब अपने राजनैतिक समीकरण बनाने में लगे हुये है.आज के समय में भारत का संविधान भी सुरक्षित नहीं है.इसके साथ साथ भी खिलवाड करने , बलात्कार करने से राजनेता बाज नहीं आरहे है, आज के समय में भाषा गत मुद्दे, क्षेत्र के मुद्दे,जाति धर्म के मुद्दे इस तरह छाये हुये है कि उसके सामने देश को प्रगति और विकास के विचार विमर्श करने का मौका ही नहीं मिल पा रहा है.आज सिफ भारत को भौतिक रूप से आजादी मिल गयी है परन्तु सामाजिक,आर्थिक,सांस्कृतिक, आजादी के सामने भारत आज भी पाश्चात सभ्यता के पीछे घिघिया रहा है.
  राजनैतिक स्थिति यह है भितरघात से बचने की कोशिश में खुद भी भितरघाती बन जाते है. आजादी के बाद आज के समय मे एक सर्वहारा वर्ग से पूँछे की बाबा तुम्हे आजादी के पहले और बाद में क्या अंतर दिखाई पडता है तो चाहे किसान हो, मजदूर हो, बुजुर्ग हो, या कामगार हो वह सब यही कहेंगें कि पहले साहूकारों से, बिचौलियों से कर्जा लेकर अपना जीवनयापन करते थे आज सरकार घर आकर जबरन कर्जा दे जाती है. और फिर मार  मारकर वसूल करती है. आज पाश्चात सभ्यता का प्रभाव है कि दो पीढियाँ एक साथ टेलीविजन का मजा नही ले सकती है. आज के समय में सब कारक उठे है परन्तु आज के समय  में सिर्फ चारित्रिक अवमूल्यन इस तरह हुआ है कि ऐसा लगता है हर रिश्ते बेमानी से है. आज के समय मे आरक्षण की आग इस तरह फैली हुई है कि आज के समय में आरक्षित जातियाँ ही इसका दुरुपयोग करने में लगी हुयी है. अन्य जातियां भी आरक्षण की रेवडी चाटने के लिये आंदोलन और सरकारी नुकसान करने ली चेष्टा में लगी हुयी हैं। आज के समय बौद्धिक आजादी के नाम पर लोग अन्य जातियों धर्मों को गाली देने में अपनी शान समझते है. आज लोकतंत्र में तंत्रलोक मिलता नजर आरहा है. और पब्लिक प्रापर्टी को लोग अपने घर की जागीर समझ कर अतिक्रमण करने में उतारू होगये है. आज के समय सिनेमा और खेल दोनो सेंसर और डोपिंग टेस्ट की कगार में खडे हुये है. पूरा देश अपनी आजादी के गुमान और गुरूर में इतना मादक होगया है कि उसे ना अपने अतीत के संघर्ष की फिक्र है और ना इस बात का भान है कि भविष्य में भी कोई उसे फिर किसी तरीके से अपना उपनिवेश बना सकता और वो कुछ भी नहीं कर सकता है. आज के समय में भारत के पडोसी ही दुश्मन बने हुये है,. और तब पर भी भारत उनसे भाई चारे की बाँह फैलाये गले लगाने के लिये आतुर नजर आता है. इतने वर्ष होने के बाद भारत आज भी वैचारिक रूप से गुलाम है. बस गुलाम बनाने वाले अपना नकाब बदल लेते है.आज के समय में जरूरत है कि बेरोजगारी को कम करके आने वाली पीढी को आतंकवादी, अराजक, और डकैत बनने से रोका जाये, पलायन करने से रोका जाये. और यह प्रयास किया जाये कि नजर लग चुकी आजादी का अपने प्रयासों के सार्वभौमिक बनाया जाए नहीं तो. आज के जनप्रतिनिधि... प्रति जन निधि संचय करने में अपने आप के साथ साथ देश को भी विदेशियों के हाँथों बेंचते रहेंगें।
आजकल समय सापेक्ष जिस स्वतंत्रता की सबसे ज्यादा विध्वंसक स्थिति बनी हुई है, वह वैचारिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। समाज में हर वर्ग में इसके मायने बदले हुये नजर आ रहे हैं। हर क्षेत्र में विचारों के आदान प्रदान और इसकी स्वच्छंदतावादी नीति असफल नजर आ रही है। किसी वर्ग के लिये यह स्वतंत्रता वरदान शाबित हो रही है किसी के लिये यह अभिशाप के रूप में सामने आ रही है। इसकी वजह यह है कि उच्च और प्रतिस्पर्धी वर्ग अपने विचारों को व्यक्त करते समय अपना आप खोते नजर आते हैं।  आज के समय पर विचारों को जनता के सामने लाने से पहले लोगों के द्वारा सोचने की प्रवृति छोडी जा चुकी है। वैचारिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे ज्यादा बेडा गर्त राजनीति में हुई है। कुर्सी पा जाने का दंभ और ना पाने का क्षोभ राजनैतिक व्यक्तित्व की मिट्टी पलीत कर देता है। राजनैतिक फायदे के लिये ये लोग देश के विरोध में कुछ भी बोल देते हैं।भाषागत जूतम पैजार देखने को अधिक मिलती है।मीडिया द्वारा परोसे जा रहे समसामायिक विमर्श भी सिर्फ बहसबाजी का रूप लेकर दम टोड देते हैं। सार्थक और स्वस्थ विमर्श और चर्चा का युग जा चुका है। आज के समय में वैचारिक आजादी के मायने विचारों की लीपापोती और विचारों के माध्यम से निकले शब्दों को आक्रामक बनाकर प्रहार करने की राजनीति की जा रही है।
जब सन सैतालिस में देश आजाद हुआ उस समय की स्थिति और आज की स्थितियों के बीच जमीन आसमान का अंतर हो चुका है यह अंतर समय सापेक्ष है। आज के समय में भारतीय जनता पार्टी का सम्राज्य लगभग पूरे देश के राज्यों में फैल चुका है। और वैचारिक दृष्टिकोण भी इसी पार्टी के रंग में रोगन हो चुका है। आज के समय में राष्ट्रभक्ति की परिभाषा परिवर्तित होकर पार्टी जन्य हो चुकी है। राजनैतिक अवमूल्यन अगर गिरा है तो उसके प्रचार प्रसार को तीव्र करने के लिये समाज के पांचवें स्तंभ की भूमिका महती हो गई है। आज के समय में मीडिया के विभिन्न रूप भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं हैं। स्व तंत्र की स्थापना जिसके चलते सर्व जन हिताय की परिकल्पना लोकतंत्रीय ढांचे की नीव रखते समय की गई थी वह अब अपने परिवर्तित रूप में है। आज की राजनैतिक स्थिति यह है कि भगवाकरण में अन्य पार्टियों की अस्तित्व खतरे में। विगत तीन पंच वर्षीय में अन्य पार्टियों के पास राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर के नेतृत्व का आभाव है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को भी दलों ने अपने अपने कुनबों में कैद कर लिया है। क्षेत्रवाद के चलते देश का विभाजन कई राज्यों में हो गय है। हमारा देश टुकडों में अपना अस्तित्व खोज रहा है। भारत अपने पडोसी देशों के ही असुरक्षित है। चीन, पाकिस्तान, जैसे दुश्मन हमारी सरकार ने दोस्तों के रूप में गढा है। हमारे भितघातियों का हाल यह है कि दुश्मन देशों के साथ मिल कर हम सबकी अखंड स्वतंत्रता को खंडित कर दिया है। भारत भूमि को माता मानने वालों का कलेजा दर्द से फटा जा रहा है क्योंकि भारत आजादी के सात दशक बाद किस स्थिति में पहुंच चुका है। अंततः हम स्वतंत्र तो हैं। परन्तु स्वमेव तंत्र जन हितों की बजाय राजनैतिक हितों को सिद्ध करने में लगा हुआ है।यह हमारी आजादी के सत्तर दशकों का विधान है। परन्तु इस बात का हमें गर्व होना चाहिये कि हम स्वतंत्र भारत में पैदा हुये।
अनिल अयान

९४७९४११४०७

राजनैतिक अलाव में जलता केरल

राजनैतिक अलाव में जलता केरल
हमारे देश का सबसे पढा लिखा प्रदेश केरल माना जाता है। यहां की साक्षरता लगभग ९० प्रतिशत को छू रही है। लोग पढे लिखे होने के साथ जागरुक भी हैं। पिछले कई दशकों में यह जागरुकता होने के बावजूद राजनैतिक अलाव में केरल की आम जनता और वहां के जन प्रतिनिधियों की लाशें बिछती चली जा रही है। छ दसकों से वहां सीपीएम और संघ के बीच की स्थिति गंभीर बनी हुई है। अमन की कोई उम्मीद नजर नहीं आती है। प्रतिशोध दर प्रतिशोध जानों का दुश्मन बना हुआ है। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के जिले कन्नूर से ही तीन सौ लोगों को इस एजेंडे में स्वाहा कर दिया गया। कभी वाम पंथी पार्टियों के कार्यकर्ताओं को दुर्दांत तरीके से मौत के घाट उतारा जाता है तो उसका बदला संघ के स्वयंसेवकों को मौत के घाट उतार कर लिया जाता है। विगत तीस जुलाई को जब केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में संघ के कार्यकर्ता की हत्या कर दी गयी। तो यह मुद्दा और गर्मा गया। बीजेपी इस हत्या के पीछे सीपीएम के कार्यकर्ताओं को दोषी बताया। एक प्रेस कांफ्रेस में तो मुख्य मंत्री तक का आपा बाहर हो गया और वो मीडिया को गेट आउट कहने पर विवश हो गया। साठ के दशक से जारी हिंसा अब भी जारी यह हिंसा और वीभत्स होती जा रही है। मारने के बाद अंग भंग करने तक की खबरे आती हैं। राज्य की मीडिया भले ही इसे दोनों दलों के हिंसात्मक रवैये का परिणाम मानते हों। परन्तु राष्ट्रीय न्यूज चैनल्स इन्हें संघ के पक्ष में लेजाने का प्रयास कर रहे हैं।
घटनाक्रम में देखें तो जुलाई माह में एक तरफ सीपीएम नेता सीवी धनराज की हत्या होती है और उसी दिन रात में बीजेपी कार्यकर्ता सी के रामचंद्रन की हत्या कर दी जाती है। धनराज की बरसी में बम से हमला होता है। तो सीपीएम के कार्यकर्ता संघकार्यालय को बम के हवाले कर देते हैं। वहीं पर उपद्रव में बीस घरों को आग के हवाले कर दिया जाता है। इसके पूर्व १० अक्टूबर को पिछले सल सीपीएम नेता के मोहनन की हत्या कर दी जाती है। उसी चौबीस घंटे के अंदर बीजेपी कार्यकर्ता रीमिथ की हत्या प्रतिशोध के रूप में लिया जाता है। और तो और मही में सीपीएम सरकार के विजय जुलूस में बंब से हमला करके उपद्रव मचाने की साजिश की जाती है। अर्थात मौत का बदला मौत से ही लिया जाता है। केरल की हिंसा पर रिसर्च करने वाली युनीवर्सीटी आफ केपटाउन की लेक्चरर रुचि चतुर्वेदी का कहना है कि इस खूनी प्रतिशोध में थिय्या जाति के लोग मारे जाते है। ये कम जमीन वाले साधारण तबके के लोग हैं। इनके युवा वर्ग दोनों राजनैतिक दलों में शामिल हैं इसलिये इन युवाओं का मौत से सामना अधिक होता है। बीआरपी भास्कर अपनी रिपोर्ट में कहता है कि इन हमलों में सीपीएम और संघ दोनों के कार्यकर्ताओं की मौतें हुई है। आरोपियों को सजा का प्रावधान है। केरल के हाई कोर्ट और सेसन कोर्ट ने कई मामलों में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।  जिसमें दिसम्बर सन सोलह में सीपीएम के बीस कार्यकर्ताओं को आजीवन कारावास की सजा हुई। इसी तरह दूसरे तरफ का भी हाल रहा। राजनैतिक दल वहां अपने नेताओं के चलते आराम से राजनीति चमका रहे हैं। और कार्यकर्ता आजीवन कारावास भोग रहे हैं। कन्नूर ही सबसे ज्यादा हत्या वाला जिला बना हुआ है।
केरल की सरकार को घेरने की पूरी तैयारी भाजपा द्वारा की जा रही है। सरकार बैकफुट पर है। कानूनव्यवस्था लगभग खत्म हो चुकी है। संघ के कार्यकर्ताओं की मौतों का सिलसला थमने के लिये वहां पर भाजपा शासन प्रमुखता से लाने की तैयारी है। राष्ट्रपति शासन की लगातार मांग उठना इस बात को शाबित करता है। संघ का मानना है कि केंद्र में भाजपा के होने के बावजूद ऐसी स्थिति जिसमें कि स्वयंसेवक मारे जा रहे हो और सत्तामौन धारण किये हो वह संघ के गले नहीं उतर रही है। उधर बीजेपी को लगता है कि इस मुद्दे की पतवार का सहारा लेकर वामपंथी सरकार को कुर्सी से उतार कर खुद काबिज हुआ जा सकता है। विस्तार और संगठन की मजबूती भी इस रणनीति का हिस्सा बन चुकी है।सवाल यह है कि यह छोटा सा राज्य बडे राजनैतिक कुरुक्षेत्र का अड्डा बन चुका है। जिसमें दोनों घटकों का यह मानना है कि तुम हमारे एक मारोगे हम तुम्हारे दस मारेंगें और वीभत्स तरीके से मारेंगें। राजनैतिक झंडावरदारों के लिये कानून मौन है। कार्यकर्ताओं के लिये कानून आजीवन कारावास की सजा देता है। एक पक्ष को सजाए ज्यादा है और दूसरे पक्ष को सजायें कम। कानून का दोगला पन भी इस अलाव का मुख्य वजह है। केंद्रीय कानून मंत्री इस मामले को संजीदगी से नहीं ले रही हैं क्योंकि उनहें लगता है कि यह मुद्दा जितना गरमायेगा उतना ही भाजपा का पक्ष वहां मजबूत होगा। देश में बहुमत दलीय राजनीतिक दल के रूप में भाजपा ही आज के समय में सर्वोपरि है। परन्तु सवाल यह उठता है कि लाशों पर कुर्सी में बैठे सीपीएम की निष्क्रियता और भाजपा की कुर्सी की दौड के बीच का द्वंद नैतिक रूप से कितना सही है। मीडिया पूरी तरह से भाजपा के साथ है जिसके चलते नेसनल लेवल पर यह राज्य नेपथ्य में जा चुका है। हालांकि राजनीति में नैतिकता की उम्मीद बेमानी है। परन्तु इस कूटनीतिक तंत्र में केरल फिल हाल अपने स्वस्थ होने की असफल प्रतीक्षा कर रहा है।
अनिल अयान,सतना

शनिवार, 15 जुलाई 2017

किसी की बपौती नहीं है कविता

किसी की बपौती नहीं है कविता / कवि धर्म बनाम कविपुत्र धर्म
नाश के दुख से कभी/ दबता नहीं निर्माण का सुख/ प्रलय की निस्तब्धता से/ सृष्टि का नव गान फिर - फिर/ नीड का निर्माण फिर - फिर/ नेह का आह्वान फिर - फिर।  यह वो कविता है जो हरिवंश राय बच्चन ने अपनी कलम का दायित्व निर्वहन करते हुये लिखी थी। इस कविता तो कहा जाता है कि अन्य कविताओं की तरह उनके बेटे अभिताब बच्चन जी ने कापी राइट करा कर रखा हुआ था  और तर्पण कार्यक्रम में जब कुमार विश्वास ने साहित्यिक विश्वास के साथ इसको गाया और हरिवंश राय बच्चन जी को अपना साहित्यिक प्रणाम करके लोगों के सामने रखा साथ ही साथ उसका वीडियों यूट्यूब में अपलोड किया गया तब से  एक विवाद गहराया। अभिताब जी ने केश करके कुमार विश्वास को कानूनन नोटिस भेजा और उसका जवाब भी कुमार विश्वास ने अपने राजनैतिक अंदाज में देते हुये उसकी कमाई का बत्तीस रुपये अभिताब जी को वापिस कर दिया। क्या कविता का अपमान किया था कुमार विश्वास ने या कवि का अपमान किया गया। क्या स्व. बच्चन जी की कविता को चोरी करके अपने नाम से कुमार विश्वास ने दर्शकों के सामने रखा। अगर ऐसा नहीं था तो कापीराइट क्या साहित्यिक धर्म से बढ कर है। क्या साहित्यकार के पुत्र होने के नाते अभिताब जी का कुमार विश्वास जी के साथ कोई साहित्यिक और सामाजिक रिश्ता नहीं है। अगर है तो फिर कविता की बपौती के लिये कोर्ट का नोटिश मेरे जैसे कलमकार के गले नही उतरता।
      यह साहित्य और काव्य परंपरा के इतिहास का एक ऐसा विषय पैदा हुआ जिससे कई सवालात मन में जागृत हुए। समान्यतः यह देखा जाता है कि कवि सम्मेलनों मुशायरों  में संचालक कवि अन्य मसहूर कवि शायरों की रचनायें सम्मान के साथ पढते हैं गाते हैं और श्रोताओं तक पहुंचाते हैं। वो जिन कवियों और शायरों की कविताओं को पढते हैं बयाकदे उनका नाम तक लेते हैं। और ये वीडियों यूट्यूब में बाकायदे अपलोड किये जाते हैं ताकि वो कार्यक्रम यादगार बने। आज तक ऐसा नहीं हुआ कि इस तरह का केश किसी कवि ने दूसरे कवि पर किया हो कि तुमने एक नामी गिरामी कार्यक्रम में मेरी कविता मेरे नाम से क्यों पढी। एक कवि एक पाठक भी है और वह अगर अच्छी रचना पढता है उसे वह रचना पसंद आती है तब वह उसका प्रयोग उसके रचनाकार का उद्द्धरण देते हुये करने के लिये स्वतंत्र होता है। कमलकार की रचना तब तक वैयक्तिक है जब तक वह स्वांताह सुखाय के लिये लिख कर डायरी में कैद है। अगर वह प्रकाशित हो गई। या श्रोताओं के बीच आ गई तब से वह समाज की रचना हो जाती है। हर रचनाकार चाहता है कि उसकी रचनायें उसके नाम को मरने के बाद भी जग में अमर करती रहें।
      अब सवाल यह है कि क्या कविता कवि तो ठीक है उनके परिवार की पैतृक संपत्ति है। क्या गायत्री मंत्र श्लोक, राष्ट्र गान और राष्ट्रगीत आदि भी इसी तरह कापीराइट हो जाने चाहिये। अभिताब जी के अनुसार देखा जाये अगर ऐसे ही कापीराइट का सिस्टम चलता और उपर्युक्त मंत्रों श्लोकों के रचनाकार अगर जीवित होते और उन्होने  अगर हम सब पर केश कर दिया होता तो हम सब पाठकों और रचनाकारों की कहानी समाप्त हो चुकी होती। स्व. बच्चन जी ने यह  कभी नहीं सोचा होगा कि उनका सगा पुत्र अभिताब जी  उनके साहित्यिक पुत्र सम कुमार विश्वास के ऊपर उन्ही की रचना के प्रचार प्रसार के कारण केश कर देगें। एक पुत्र अपना पुत्र धर्म निभाने का भ्रम पाले बैठा है जिसका साहित्य से कोई वास्ता नहीं है जो बालीवुड और सरकार के ब्रांड एम्बेस्डरशिप के ना जाने कितने कांटेक्ट से जुडे हुये हैं। दूसरी तरफ उनके साहित्यिक पुत्र सम कुमार विश्वास उनकी मृत प्राय कविता को युवा और मीडिया के सामने ससम्मानपूर्वक लाकर अपने कवि धर्म को निर्वहन कर रहे है। तब भी वो गलत हो गये क्योंकि कानूनन अपने खून को अधिकार है कि वो अपने बाप के माल पर अपना अधिकार जमाये। भले ही वो कविता जैसा भावनात्मक शब्द शक्ति क्यों ना हो।  जिस कविता के भाव को लेकर कविता का गायन कुमार विश्वास ने किया वह जग हिताय था। कविता का मर्म हम समझ सकते हैं कि कविता अगर श्रृष्टि के नवगान का आह्वान कराती है तो वह नेह के प्रसार को भी आह्वानित करती है। अफसोस कि यह आह्वान उनके पुत्र नहीं समझ सके और बालीवुड की बाजारी सोच के चलते कविता को धार बनाकर एक कवि को कविता गाने के नाम पर कानून की बारीकियों के आमना सामना करना पडा। हम अगर स्व. बच्चन जी को निशा निमंत्रण और मधुशाला जैसी रचनाओं और कृतियों की वजह से जानते हैं इसमें अगर कुछ और इजाफा करने का काम कुमार विश्वास ने किया तो क्या गलत लिया।
      कुमार विश्वास ने भले ही आप राजनैतिक पार्टी में शामिल हुये हो। भले ही साहित्यिक जगत में उन्हें मंचीय कवि के रूप में जाना जाता हो। भले ही वो राजनीति में शामिल होकर विवादित रहे हो। किंतु कवि के रूप में उनकी ही प्रतिभा थी कि कवि सम्मेलनों की नीरसता को खत्म करने की सोच और साहित्यिक गीतों की परंपरा को उन्होने कालेज कैंपस और युवा मन के अंदर तक घर करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कुमार की लोकप्रियता ने कपिल के लाफ्टर शो को कवितामय कर दिया जो उस शो के इतिहास में पहली बार था। कुमार की कविता के प्रति वफादारी के चलते विभिन्न अवसरों में सिर्फ टीआरपी के पीछे अंधी दौड में दौडने वाले प्राइवेट चैनलों ने कविता को अपने दर्शकों तक पहुंचाने के लिये विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जिसमें कविता हुआ। कविता के साथ रचनाकार और रचना पर विमर्श हुआ। और साहित्य के प्रति एक नया दृष्टिकोण दर्शकों तक पहुंचा। यह सब काम करने के लिये अभिताब जी के पास वक्त ना होगा। इस सब से कुमार को अगर कुछ मूल्य मिल भी रहा है तो उनके जीविकोपार्जन के लिये नहीं है। वर्षों से चली आ रही एक कटु शिलालेख जिसमें यह कहा गया कि कविता या साहित्य पेट नहीं भरता सिर्फ प्रसिद्धि देता है, को कुमार ने मिटाने का काम किया। अगर वो अपनी कविताओं को बस उस कार्यक्रम में सुनाये तो व्यक्तिगत स्वार्थ समझ में आता है किंतु एक कविधर्म को निर्वहन करते हुये उन्होने अपने अग्रज कवि साहित्यकारों को मीडिया और दर्शकों के सामने लाने का सराहनीय काम किया है। जो साहित्यिक परंपरा का मूल भी है। मुझे लगता है कि कविता को किसी की बपौती नहीं मानना चाहिये। कवि कविता जग के लिये लिखता है। कवि के स्वर्गवासी होने के बाद कविता पर अगर उसके बेटे का अधिकार है उससे कहीं ज्यादा कवि वंश के हर रचनाकार का अधिकार है उससे कहीं ज्यादा पाठक वर्ग का अधिकार है जो हमेशा रहेगा। कवि धर्म कविपुत्र धर्म से ज्यादा श्रेष्ठ था है और रहेगा। अभिताब जी यह साहित्यिक अपरिपक्वता और कुमार विश्वास की यह साहित्यिक परिपक्वता ही थी कि इस विवाद को कोर्ट के दरवाजे तक पहुंचना पडा।"नेह का आह्वान फिर - फिर" का उत्स अगर अभिताब जी समझ जाते तो विवाद यह था ही नहीं भले वो बिग बी हो। पर इस बार एंगरी ओल्ड मैन की छवि बिग ब्रदर पर ज्यादा हावी रही। हमारा साहित्य और साहित्यिक विरादरी इस तरह की छवि का कट्टर विरोधी है।
अनिल अयान

सतनाकिसी की बपौती नहीं है कविता / कवि धर्म बनाम कविपुत्र धर्म
नाश के दुख से कभी/ दबता नहीं निर्माण का सुख/ प्रलय की निस्तब्धता से/ सृष्टि का नव गान फिर - फिर/ नीड का निर्माण फिर - फिर/ नेह का आह्वान फिर - फिर।  यह वो कविता है जो हरिवंश राय बच्चन ने अपनी कलम का दायित्व निर्वहन करते हुये लिखी थी। इस कविता तो कहा जाता है कि अन्य कविताओं की तरह उनके बेटे अभिताब बच्चन जी ने कापी राइट करा कर रखा हुआ था  और तर्पण कार्यक्रम में जब कुमार विश्वास ने साहित्यिक विश्वास के साथ इसको गाया और हरिवंश राय बच्चन जी को अपना साहित्यिक प्रणाम करके लोगों के सामने रखा साथ ही साथ उसका वीडियों यूट्यूब में अपलोड किया गया तब से  एक विवाद गहराया। अभिताब जी ने केश करके कुमार विश्वास को कानूनन नोटिस भेजा और उसका जवाब भी कुमार विश्वास ने अपने राजनैतिक अंदाज में देते हुये उसकी कमाई का बत्तीस रुपये अभिताब जी को वापिस कर दिया। क्या कविता का अपमान किया था कुमार विश्वास ने या कवि का अपमान किया गया। क्या स्व. बच्चन जी की कविता को चोरी करके अपने नाम से कुमार विश्वास ने दर्शकों के सामने रखा। अगर ऐसा नहीं था तो कापीराइट क्या साहित्यिक धर्म से बढ कर है। क्या साहित्यकार के पुत्र होने के नाते अभिताब जी का कुमार विश्वास जी के साथ कोई साहित्यिक और सामाजिक रिश्ता नहीं है। अगर है तो फिर कविता की बपौती के लिये कोर्ट का नोटिश मेरे जैसे कलमकार के गले नही उतरता।
      यह साहित्य और काव्य परंपरा के इतिहास का एक ऐसा विषय पैदा हुआ जिससे कई सवालात मन में जागृत हुए। समान्यतः यह देखा जाता है कि कवि सम्मेलनों मुशायरों  में संचालक कवि अन्य मसहूर कवि शायरों की रचनायें सम्मान के साथ पढते हैं गाते हैं और श्रोताओं तक पहुंचाते हैं। वो जिन कवियों और शायरों की कविताओं को पढते हैं बयाकदे उनका नाम तक लेते हैं। और ये वीडियों यूट्यूब में बाकायदे अपलोड किये जाते हैं ताकि वो कार्यक्रम यादगार बने। आज तक ऐसा नहीं हुआ कि इस तरह का केश किसी कवि ने दूसरे कवि पर किया हो कि तुमने एक नामी गिरामी कार्यक्रम में मेरी कविता मेरे नाम से क्यों पढी। एक कवि एक पाठक भी है और वह अगर अच्छी रचना पढता है उसे वह रचना पसंद आती है तब वह उसका प्रयोग उसके रचनाकार का उद्द्धरण देते हुये करने के लिये स्वतंत्र होता है। कमलकार की रचना तब तक वैयक्तिक है जब तक वह स्वांताह सुखाय के लिये लिख कर डायरी में कैद है। अगर वह प्रकाशित हो गई। या श्रोताओं के बीच आ गई तब से वह समाज की रचना हो जाती है। हर रचनाकार चाहता है कि उसकी रचनायें उसके नाम को मरने के बाद भी जग में अमर करती रहें।
      अब सवाल यह है कि क्या कविता कवि तो ठीक है उनके परिवार की पैतृक संपत्ति है। क्या गायत्री मंत्र श्लोक, राष्ट्र गान और राष्ट्रगीत आदि भी इसी तरह कापीराइट हो जाने चाहिये। अभिताब जी के अनुसार देखा जाये अगर ऐसे ही कापीराइट का सिस्टम चलता और उपर्युक्त मंत्रों श्लोकों के रचनाकार अगर जीवित होते और उन्होने  अगर हम सब पर केश कर दिया होता तो हम सब पाठकों और रचनाकारों की कहानी समाप्त हो चुकी होती। स्व. बच्चन जी ने यह  कभी नहीं सोचा होगा कि उनका सगा पुत्र अभिताब जी  उनके साहित्यिक पुत्र सम कुमार विश्वास के ऊपर उन्ही की रचना के प्रचार प्रसार के कारण केश कर देगें। एक पुत्र अपना पुत्र धर्म निभाने का भ्रम पाले बैठा है जिसका साहित्य से कोई वास्ता नहीं है जो बालीवुड और सरकार के ब्रांड एम्बेस्डरशिप के ना जाने कितने कांटेक्ट से जुडे हुये हैं। दूसरी तरफ उनके साहित्यिक पुत्र सम कुमार विश्वास उनकी मृत प्राय कविता को युवा और मीडिया के सामने ससम्मानपूर्वक लाकर अपने कवि धर्म को निर्वहन कर रहे है। तब भी वो गलत हो गये क्योंकि कानूनन अपने खून को अधिकार है कि वो अपने बाप के माल पर अपना अधिकार जमाये। भले ही वो कविता जैसा भावनात्मक शब्द शक्ति क्यों ना हो।  जिस कविता के भाव को लेकर कविता का गायन कुमार विश्वास ने किया वह जग हिताय था। कविता का मर्म हम समझ सकते हैं कि कविता अगर श्रृष्टि के नवगान का आह्वान कराती है तो वह नेह के प्रसार को भी आह्वानित करती है। अफसोस कि यह आह्वान उनके पुत्र नहीं समझ सके और बालीवुड की बाजारी सोच के चलते कविता को धार बनाकर एक कवि को कविता गाने के नाम पर कानून की बारीकियों के आमना सामना करना पडा। हम अगर स्व. बच्चन जी को निशा निमंत्रण और मधुशाला जैसी रचनाओं और कृतियों की वजह से जानते हैं इसमें अगर कुछ और इजाफा करने का काम कुमार विश्वास ने किया तो क्या गलत लिया।
      कुमार विश्वास ने भले ही आप राजनैतिक पार्टी में शामिल हुये हो। भले ही साहित्यिक जगत में उन्हें मंचीय कवि के रूप में जाना जाता हो। भले ही वो राजनीति में शामिल होकर विवादित रहे हो। किंतु कवि के रूप में उनकी ही प्रतिभा थी कि कवि सम्मेलनों की नीरसता को खत्म करने की सोच और साहित्यिक गीतों की परंपरा को उन्होने कालेज कैंपस और युवा मन के अंदर तक घर करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कुमार की लोकप्रियता ने कपिल के लाफ्टर शो को कवितामय कर दिया जो उस शो के इतिहास में पहली बार था। कुमार की कविता के प्रति वफादारी के चलते विभिन्न अवसरों में सिर्फ टीआरपी के पीछे अंधी दौड में दौडने वाले प्राइवेट चैनलों ने कविता को अपने दर्शकों तक पहुंचाने के लिये विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जिसमें कविता हुआ। कविता के साथ रचनाकार और रचना पर विमर्श हुआ। और साहित्य के प्रति एक नया दृष्टिकोण दर्शकों तक पहुंचा। यह सब काम करने के लिये अभिताब जी के पास वक्त ना होगा। इस सब से कुमार को अगर कुछ मूल्य मिल भी रहा है तो उनके जीविकोपार्जन के लिये नहीं है। वर्षों से चली आ रही एक कटु शिलालेख जिसमें यह कहा गया कि कविता या साहित्य पेट नहीं भरता सिर्फ प्रसिद्धि देता है, को कुमार ने मिटाने का काम किया। अगर वो अपनी कविताओं को बस उस कार्यक्रम में सुनाये तो व्यक्तिगत स्वार्थ समझ में आता है किंतु एक कविधर्म को निर्वहन करते हुये उन्होने अपने अग्रज कवि साहित्यकारों को मीडिया और दर्शकों के सामने लाने का सराहनीय काम किया है। जो साहित्यिक परंपरा का मूल भी है। मुझे लगता है कि कविता को किसी की बपौती नहीं मानना चाहिये। कवि कविता जग के लिये लिखता है। कवि के स्वर्गवासी होने के बाद कविता पर अगर उसके बेटे का अधिकार है उससे कहीं ज्यादा कवि वंश के हर रचनाकार का अधिकार है उससे कहीं ज्यादा पाठक वर्ग का अधिकार है जो हमेशा रहेगा। कवि धर्म कविपुत्र धर्म से ज्यादा श्रेष्ठ था है और रहेगा। अभिताब जी यह साहित्यिक अपरिपक्वता और कुमार विश्वास की यह साहित्यिक परिपक्वता ही थी कि इस विवाद को कोर्ट के दरवाजे तक पहुंचना पडा।"नेह का आह्वान फिर - फिर" का उत्स अगर अभिताब जी समझ जाते तो विवाद यह था ही नहीं भले वो बिग बी हो। पर इस बार एंगरी ओल्ड मैन की छवि बिग ब्रदर पर ज्यादा हावी रही। हमारा साहित्य और साहित्यिक विरादरी इस तरह की छवि का कट्टर विरोधी है।
अनिल अयान
सतना