शनिवार, 19 मई 2018

सत्ता का सौंदर्यीकरण

सत्ता का सौंदर्यीकरण

वैसे तो हम सबने हर जगह के सौंदर्यीकरण देखें ही हैं। जब भी यह पुण्य कार्य किया जाता है तब वास्तविक रूप से सामाजिक धतकरम सभी को मुंह बनाए चिढ़ाता है। सड़कों से लेकर गली कूचों का, नगर से लेकर महानगर का, उद्यानों से लेकर शासकीय इमारतों का आदि आदि जितने भी ऐसे पुण्यकार्य हुए उसमें कल्पनाशीलता की इतनी अति हो गई कि वास्तविकता भी चुल्लू भर पानी में डूब मरी। इस बार तो अच्छे दिन की लालसा लिए कुछ जुमले या यह कहूं कि मिसरे नाक कान  को चुभने लगे क्योंकि उसमें आत्म सम्मान की कम अभिमान के लोभान की महक आ रही थी। वो यह था कि एक सत्तारूढ़ अमुक पार्टी के बैनर में यह सुनने में मिला कि आप वोट गिनें हम तो राज्य गिनते हैं। अमुक पार्टी की यह सत्ता के सौंदर्यीकरण की प्रस्तावना के रूप में मतदाताओं के सामने आया। बार बार अमुक तमुक पार्टी के अध्यक्ष को कुछ नाम को बार बार कहने की अपील की जैसे कच्चा पापड़ पक्का पापड़ कहने की आदत हम छोड़ चुके थे। यह सत्ता है यह सब जानती है किंतु मौन भाषा किसी के समझ में कहां आती है। जानने भर से क्या होता है, यहां पर जिंदा मौन लोगों को मृत ही कहा जाता है।
भाषाई संतुलन तो उम्मीदवारों के संतुलन तक को गिरा दिया। पूर्व प्रधान मंत्री जी ने तो राष्ट्रपति से घुटने के बल खडे होकर विनती कि हमारे प्रधानमंत्री की चुनावी भाषा अमर्यादित है वह प्रधानमंत्री की भाषा नहीं हो सकती। अब चुनाव का मतलब ही है अमर्यादित होकर नंग दहाव करना। पूर्व राज्यों में सत्ता का सुख भोगने के बाद अमुक पार्टी ने जिस शेख चिल्ली के स्वप्न को साकार करने का प्रयास किया वह वाकयै सत्ता की भूतनी को राजरानी के रूप में बदलने की चेष्टा थी। इस चेष्टा की प्यास इतनी ज्यादा थी कि संविधान, लोकतंत्र सब को अमुक पार्टी ने धता बता दिया। दोनों बेचारे संविधान और लोकतंत्र इस जबर जस्ती की पीड़ा से कराह उठे। इसके बाद तो सत्ता पगडंडी को फास्ट ट्रैक नेशनल हाईवे बनाने की जग्दो जहद चालू हुई। अमुक पार्टी और  तमुक पार्टी ने एक दूसरे के विजयी विधायकों को लालच की हद तक गिरते देखना चाहते थे। फ्लोर टेस्ट के पहले ही सीटों की रिक्तता और त्रिसंखु सत्ता का स्वप्न दिवा स्वप्न नजर आने लगा। सत्ता की मोहिनी ने अमुक तमुक और भी अन्य को नाचने के लिए मजबूर कर दिया। यह मजबूरी भी थी और सत्ता सुख के लिए मजदूरी भी थी।
राज्य के मुखिया के ऊपर जब अमुक पार्टी ने जब केंद्र का दबाव बनाया तो तमुक पार्टी का व्यास बदल गया। मुखिया की परिधि कब्जे में आ गई। मुखिया ने पक्षपात का शीर्षस्थ नमूना सत्ता के सौंदर्यीकरण के लिए रखा। तमुक पार्टी ने न्यायालय से न्याय की उम्मीद अच्छे दिन की लालसा में लगाई। हालांकि यह उम्मीद कितना साकार होगी वह तो आने वाला वक्त बताएगा। यह देखने में आ रहा है। कि तमुक पार्टी गैर की शादी में अब्दुल्ला दीवाने की स्थिति में है। अमुक पार्टी तो शोक मना रही है क्योंकि उसके अच्छे दिन में चंद्र ग्रहण लग गया। तमुक पार्टी को इस बात की चिंता है कि कहीं उसकी सत्ता रूपी बेगम मौलवी के साथ फरार न हो जाए। आखिर कार हुआ वही मौलवी तो नहीं किंतु मौलवी के सिपेहसलारों ने इसको हथिया ही लिया किंतु। इस चाल की गीदडी खाल बहुत जल्दी ही उतर गई। 
इसी "सप्ताह" की इह लीला देखकर मन द्रवित भी है क्यों कि आखों से द्रव तभी निकलता है जब बहुत ज्यादा खुशी हो या बहुत ज्यादा दुख। यहां पर फिफ्टी फिफ्टी का मामला है। राज्य गिनने वाली अमुक पार्टी के लिए पीपीपी फार्मूला अभी बिना पीओपी के कमजोर है। तमुक पार्टी दूसरे पार्टी की मुख्यमंत्रित्व का गैरपार्टीसुख में लीन है। किंतु कहीं मामला " तेरह घंटे, तेरह दिन, तेरह माह" वाली केंद्र की सरकार की तरह हुआ तो इस बार डूबने के लिए इस गर्मी में चुल्लू भर पानी भी नसीब न होगा। खैर कर्नाटक को जो न जानता होगा वह भी रग रग से जानने लगा होगा। करनाटक ने अमुक को अमुक होने की सीख दी और तमुक को तमुक होने की सीख दे ही दी। इस सप्ताहिक नाटक में सबसे ज्यादा मजे किए इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले न्यूज चैनलों को उनकी बाइट देखने लायक होती थी। समझ में नहीं आ रहा था कि मीडिया की बहसों और चर्चाओं का उद्देश्य क्या है टाइम पास करना या जनता के विश्वास के मोहजाल को और सघन करना।
स्थिति यह थी कि वो भी मनोरंजन वाले चैनल बन गए थे। भेडिया घाट में भेडों को हलाल होता तो दिखाया जा रहा था। किंतु भेड़ों के बचाव का रास्ता निकाले बिना ही भेडियों के राजा का गुणगान किया जा रहा था। ऐसा लग रहा था कि इस बलि के बाद प्रसाद में कुछ भाग इधर भी सरका दिया जाएगा। कई चैनल तो दुखी होकर अमुक पार्टी के लिए शोक संदेश बांचने  में आज भी लगे हुए हैं। ऐसा लगता है कि वीरगाथा काल का चारण वंदन सभा का आयोजन किया जा रहा था। राजनीति विष्लेषक अपनी राजनीतिशास्त्र की सारी किताबों को पलटते पलटते उतान हो गए कि आखिर लोकतंत्र में यह उत्तर प्रदेशी नौटंकी के कलाकार कहां से आ गए। सभी अपना माथा पकड़े हाथों की लकीरों और माथे की लकीरों की तुलना करने में व्यस्त थे।
विधायकों नामक सत्ता की करेंसी को भारतीय करेंसी से तुलादान करके हथियाने की कोशिश में पूरा देश साथ दे रहा था। कुल मिला कर स्वर्ण आभूषणों की बजाय गिलिट के सोने का पानी चढ़ाकर सत्ता को सुशोभित किया जा रहा था। इस सब सप्ताहिकी को देखकर लगा कि वाकयै भारत की सत्ता ने भारत को इतने दशक के बाद भी विकासशील ही क्यों बनाए हुए है। सत्ता सुख किसी भी पार्टी को मिले अमुक या तमुक किंतु जिस प्रकार भेडियों ने लोकतंत्र की भेड़ों को धोबिया घाट में नाटक करके हलाल किया है वह यह साबित करता है कि समय अब जनता का नहीं इन्ही लोगों का है। कार्यपालिका, न्यायपालिका, संवैधानिक पद और  देश का चौथे स्तंभ तक विधायिका की मुट्ठी में कैद हो चुके हैं। इस सौंदर्यीकरण से विदेश में अमुक पार्टी के प्रधान नेतृत्व कुछ भी दिखाए किंतु अंदर की लोकतंत्रीय देह में दीमक को पालने , दीमकों की खरीद फरोख्त करने की शाजिस अमुक पार्टी को ही जाती है। जब सौंदर्यीकरण के मेकप धुलेंगें तब सत्ता की बदसूरत तस्वीर हमें लज्जित जरूर करेगी।

अनिल अयान,सतना

रविवार, 6 मई 2018

स्त्री सुरक्षा के यक्ष प्रश्न से जूझता समाज

स्त्री सुरक्षा के यक्ष प्रश्न से जूझता समाज

पुरातन काल से स्त्री सम्मानित स्थान समाज में रखती चली आई है। हमारे धर्म ग्रंथ वेद पुराण गवाह रहे हैं कि स्त्री को पुरुष के पूर्व देवी देवताओं के नामों के रूप में पुकारा जाता रहा है। स्त्री को आराध्य देवीय रूप माना जाता रहा है। हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुरूप स्त्री पर केंद्रित सत्ता रही है। स्त्री की सत्ता को सिरोधार्य मानकर पुरुष ने समाज की रचना की है। हमारी  धार्मिक वर्ण और समाजिक व्यवस्था के परिणाम स्वरूप पुरातन काल से से स्त्री को लेखन का केंद्र माना गया। स्त्री के ऊपर तुलसी ने रावण के मुख से ढोल गंवार सूद्र पशु नारी को एक पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया। अहिल्या को इसी व्यवस्था के अंतर्गत अपमान का घूंट पीकर श्राप ग्रहण करने को मजबूर होना पड़ा। रंभा को इंद्र का छल भोगना पड़ा। देवों ने दानवों की स्त्रियों के ऊपर और दानवों ने देवों की स्त्रियों के ऊपर अत्याचार, व्यभिचार के हर स्तर को पार किये। यह रीति हमारे देश में वर्तमान तक चली आ रही है। हमारे देश में स्त्री पुरुष अनुपात कम होने के बाद स्त्री की कम संख्या होने पर एक तरफ चिंता की जाती है और दूसरी तरप कन्या को गर्भ में ही समाप्त करने की चालें स्त्री के द्वारा ही चलाई जाती है। इस काम में पुरुष समाज भी उनक बखूबी साथ देते हैं।
पद्मावती फिल्म का एक संवाद याद आता है कि जो भी स्त्री की अस्मिता में हाथ ड़ाले उसकी अंगुलिंयां नहीं काटना चाहिए बल्कि सीधे गला काट देना चाहिए।यह संकेत हैभविष्य गत समाज में इस तरह के व्यभिचारों और यौन अपराधों की सजा के लिए। हमारा देश अरब राष्ट्र नहीं बन सकता, मुस्लिम राष्ट्र नहीं बन सकता किंतु सजा में फेर बदल करने के लिए उसे सोचना होगा। हमारे देश में हजारों महिला संगढ़न चल रहे हैं। महिला आयोग को कितना फंड़ स्त्रियों की सुरक्षा के लिए सरकार उपलब्ध करवा रही है। महिलाओं के लिए मानवी परामर्श केंद्र, महिला पुलिस थाने, महिला सुरक्षा कानून, पास्को कानून तक हमारे संविधान में है। बहुत से एनजीओ महिलाओं के उच्च समाजिक स्तर, स्वास्थ्य स्तर, परिवारिक और समाजिक उन्नयन के लिए सरकार के करोडो रुपये निगल रहे हैं। किंतु ये भी महिला सुरक्षा के लिए मौन हो जाते हैं।
विगत कुछ दशकों से यह देखा जा रहा है कि महिला सशक्तीकरण के नाम पर जितना स्वांग हमारी सरकारों ने रचाया है। वह राजनैतिक हथकंडा मात्र शामिल हो रहा है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि मीडिया जो पहले खबरे परोसता था अब वह सरकारी अंगुलियों की कठपुतली बनकर खबरों में तेल मसाला लगाकर महिलाओं के ऊपर हो रहे यौन अपराधों,बलात्कार की घटनाओं को वर्ग विशेष हेतु उद्वेलित और उत्तेजित करने का काम कर रहा है। पहले भी समाज में बलात्कार और व्यभिचार हुए हैं किंतु वह या तो दबा दिये गये, या तो महिला को मौत की नींद सुला कर मामले को बंद कर दिया गया। वर्तमान में मीडिया की सक्रिया की वजह से सोशल मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया, प्रिंट मीडिया इस घटनाओं को बडी खबर बनाकर समाज के सामने ला रही हैं। यह  कैमरे के सामने आने के बाद पुलिस की नजरों तक पहुंच पाती हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर कार पिछले कुछ दशकों से ही महिला सुरक्षा पर बहस, चर्चा, मुद्दे उठना क्यों शुरु हुए। पहले भी महिलाएं काम करती थी, पहले भी महिला पहनती ओढ़ती और बिछाती थी। पहले भी वो कामगार थी।
आसपास के वातावरण को देखें तो समझ में आता है महिलाएं पुरुषो से ज्यादा टेक्नालाजी फ्रेडली हो गई हैं। पहले महिला पुरुष को कोई भी काम करने से रोकती थी। अब की स्थिति में महिलाए पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर यहां तक की दो कदम आगे बढ़ चुकी हैं। सोशल मीडिया, कार्यक्षेत्रों,परिवार, समाज, सोशल क्लब्स, समाज सेवा नाम से महिला समाज और परिवार के डेहरी लांघ चुकी हैं, डेहरी लांघने के साथ साथ संबंधों की स्वच्छंदता भी बढ़ी है। संबंधों के रूप बदले हैं। शादी जैसे संबंध अब आधुनिक युग में ढ़कोसले और लिव इन जैसे संबंध आवश्यकता बन चुके हैं, रूम मेट्स में मेल फीमेल का शामिल हो जाना, अपने कोआर्डिनेट्स के साथ स्त्री और पुरुष की निजता का समाप्त होना, परिवार में प्रथाओं का विलोपन, सीमाओं की समाप्ति, आधुनिकता का समावेश सुरक्षा में सेंध उत्तपन्न कर रहा है। वर्तमान में कोई भी क्षेत्र हो महिला चाहे जितने ऊंचे पद पर हो वह अन्य महिला साथी का उतना सहयोग नहीं प्राप्त कर पाती जितना कि पुरुष से प्राप्त करती है। खेल, मीडिया, व्यवसाय, बाजार, बालीवुड़ जैसे कितने स्थान हैं जहां पर महिलाओं से विश्वासघात, मानसिक और शारीरिक शोषण होता है, पूर्व में मौन रहकर सब सहा जाता है और अंततः जब सहा नहीं जाता तब विरोध कर दिया जाता है। यही स्तिथि परिवार के विभिनन संबंधों पर भी देखने को मिलती है।
महिलाएं अपने अधिकारों, सरकार और संविधान के द्वारा दिए गये सुरक्षा कवच को जानती तो हैं किंतु उसे उपयोग करने से सकुचाती हैं,वो अपने परिवार,समाज की इज्जत की चिंता के चलते तात्कालिक निर्णय लेने से घबड़ाती हैं। वहां पर उन्हें अपने पित्रसत्तात्मक और पुरुष समाज की चिंता खाए जाती है। वहां पर उनका सशक्तीकर मौन क्यों हो जाता है। सोशल मीडिया इसका गवाह है कि महिला को एक्सपोजर उसके मेकप,उसके रहन सहन,उसके पहनावे, और उसके वैचारिक स्वतंत्रता के अनुरूप मिलता है, ग्लैमर और वाकपटुता की कीमत लाइक कमेंट और पर्सनल आडियो वीडियों चैट होते हैं, बाजार और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने महिलाओं को उत्पाद मानकर उन्हें कैस कर रहा है। आज के समय में वर्जनाएं खत्म हो चुकी हैं, महिलाओं को जिस एक्स्पोजर बोल्ड़नेश और ग्लैमर की जरूरत है वो उसे मीडिया और बाजार परोस रहा है। खुले आम महिलाओं से संबंधित निजी उत्पादों का  प्रदर्शन और विज्ञापन किया जा रहा है, सरकार की सूचना पौद्योगिकी की नाक के नीचे अश्लीलता और पोर्नोग्राफी का खुला बाजार चल रहा है उसमें महिलाओं और पुरुषों की भागीदारी देखने को मिलती है। परन्तु फिर भी कहा जाता है सोच बदलने की जरूरत है। देश में महिलाओं को देह, उत्पाद, बाजार, मनोरंजन का साधन बनाकर परोसने और अप्रत्यक्ष रूप से हुकूमत की रजामंदी के बाद स्त्री असुरक्षित नहीं होगी तो क्या होगी।
स्त्री की समाजिक सुरक्षा तभी संभव है जब स्त्री को समाजिक प्राणी रहने दिया जाए, उसको शिक्षित होने का अधिकार हो, उसे अधिकारों के उपयोग करने का तरीका पता हो, उसके ऊपर समाज का मनोवैज्ञानिक दबाव न बने, उसे मानव बने रहने दिया जाए, अपने घर में बेटे बेटियों को यह समझाया जाए कि रील लाइफ और रियल लाइफ में कोई समानता नहीं हैं। कोर्ट कचेहरी से असुरक्षा को नहीं खत्म किया जा सकता है। यह समाज की समस्या है समाज के मानसिकता सोच और आने वाली पीढी को वैचारिक रूप से मजबूत बनाकर ही इस पीड़ा से छुटकारा पाया जा सकता है। बच्चों  को यह भी बताया जाए कि भारतीय समाज और पाश्चात समाज की रूप रेखा बिल्कुल अलग है। यहां पर अंग प्रदर्शन और वस्त्र धारण करने में महीन अंतर है, यहां पर सहवास का सुख विवाह पश्चात मान्य है न कि लिव इन रिलेशन में रहकर भोग कर छॊड़ने में है। बच्चों के बीच संवाद स्थापित करने का काम जितना पिता  की जिम्मेवारी निर्वहन कर रहे पुरुष का है उतना ही माता के रूप में जिम्मेवारी का निर्वहन कर रही स्त्री का भी है। स्त्री को अपने स्त्री समाज के लिए खडे होना चाहिए। स्त्री पुरुष की पूरकता को हर स्त्री पुरुष को समझना होगा। स्वतंत्रता,स्वछंदता,उच्छखृलता और इसका बोल्ड़नेश ग्लैमर और अश्लीलता में परिवर्तित होने के बीच में महीन अंतर है। एक सीमा रेखा के इस पार और उसपार पहुंचने के लिए कुछ सेकेंड ही लगते हैं अगर हम इस अंतर को नहीं समझ सकते हैं। स्त्री पुरुष एक साथ चलेंगें तो शायद यह सुरक्षा घेरा नहीं टूटेगा, अगर स्त्री आगे गई और पुरुष पीछे छूटा या फिर पुरुष आगे गया और स्त्री पीछे छूट गई तो यह सुरक्षा असुरक्षा में बदल जाएगी।

अनिल अयान, सतना
९४७९४११४०७

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

जीवितं जीवेति धरा, यत्र-तत्र युगे युगे।

जीवितं जीवेति धरा, यत्र-तत्र युगे युगे।
प्रकृति, जो है हमारी पालनहार, जो है हमारे पुरखों की सर्वेसर्वा,हमारी प्राकृतिक और नैसर्गिक पालक, मानव प्रजाति ही बस नहीं बल्कि करोड़ों जीवजन्तु अपने अपने तरीके से इस जीवन को जीने के लिए भली भूत हो रहे हैं। हमारी करतूतों के कारण हमें इस दिन को देखना पड़ रहा है। हम अब अपने पालनहार के बारे में, अपने अस्तित्व के खतरे के बारे में बात करने के लिए विवश हैं। हम ही क्या पूरा विश्व इस धरा की तपन को महसूस कर रहा है। धरती लगातार प्यास से व्याकुल हो रही है। सूरज का तापमान धरती के लिए खतरनाक हो रहा है। धरतीवासी अपनी आकाशगंगा में पृथ्वी जैसे ग्रह का कोई विकल्प खोजने में फिलहाल असमर्थ हैं। धरती ने अपने आपको विज्ञान के परे परिवर्तित कर लिया है।यह परिवर्तन के लिए हम सब मानव ही गुनहगार हैं। और इस गुनाह के पश्चाताप के लिए ही हम एक्जुट होकर अपनी धरती और इसके ऊपर पड़ने वाले कारको पर विचार करने के साथ बचाव के लिए प्रयास कर रहे हैं। हर देश के रहवासी इस मुहिम में अपने आप को आहुत करने के लिए आतुर नजर आ रहे हैं। कोई कुछ नहीं कर पा रहा तो अपने आस पास पौधा लगा रहा है। अपने आसपास से प्लास्टिक और सिथेटिक रसायनिक पालीथीन प्रोडक्ट को खत्म करने की कोशिश कर रहा है। हमें वैश्विक प्रयासों में व्यक्तिगत प्रयासों की मुहिम को जोड़ना ही होगा। हर व्यक्ति जो जहां है उसे अपने स्तर पर इस प्रकृति और धरती के लिए कुछ ना कुछ संरक्षण हेतु करना होगा। हम खुद सोचें कि इस मुहिम में यदि हम मिलियन भर लोग अगर अपने अपने स्तर पर स्वतंत्र रूप से प्रयास करें तो प्रकृति संरक्षण में कितनी बढ़ोत्तरी होगी।
हर सार विश्व धरा दिवस पर्यावरण आंदोलन जो सन सत्तर के दशक में प्रारंभ किया गया उसकी याद में नित नये प्रयोग किये जाते हैं।हर व्यक्ति समझ रहा है कि हमारा जीवन और इसका अस्तित्व खतरे में है। जानते सभी हैं किंतु क्या करना है यह जानकर भी कोई कुछ करना नहीं चाहता है। वर्तमान परिस्थितियों के लिए धरती को बचाने के लिए जरूरी है कि हम इसमें पाए जाने वाली जीवजन्तुओं और पेड़ पौधों की प्रजातियों को सुरक्षित करें,दैनिक जीवन से मानवनिर्मित रसायनिक खपत को कम करें,प्राकृतिक संसाधनों की महत्ता को समझते हुए उनकी सुरक्षा की जिम्मेवारी लेंऔर उसको पूरा करें, अपने आसपास हरियाली विकसित करें, हमारे आसपास की भूमि को सूखने से बचाएं,व्यर्थ में बह रहे पानी को धरती तक सीधे पहुंचाकर धरती की प्यास को बुझाएं, आसपास के जल स्रोंतों को दोबारा जीवित करें,अपने आसपास के पुराने पुरखों के कुओं और बावड़ियों का रखरखाव करके जल की एक एक बूंद संजोएं, अपने आसपास खेतों की पानीदारी, और हरियाली को दिन दोगुनी और रात चौगुनी बढ़ाने की कोशिश करें, वर्तमान समय के अनुसार घर के निकलने वाली गीले विघटित होने वाले कचडे को आसपास की जमीन में ही नष्टकरें ताकि उसका विघटन जैविक रूप से हो और धरती को उर्वरकता को बढ़ावा भी मिले, आस पास जल सोखने वाले गड्ढे बनाने की आवश्यकता है जिससे आपके आसपास जल के स्रोत पानीदार बने रहे, काक्रीट की दीवालों से बाहर आकर दिमाग में जमें कांक्रीट को हटाना होगा। शहरीकरण का जो प्लासटर हमारे दिमाग में पैवस्त हो चुका है वह प्रयासों की ड्रिल मशीन से और कटर से टॊड़ कर हटाने की जरूरत है। हमारी मानवीय प्रकृति अगर प्राकृतिक धरा की प्रकॄति को समझ कर एक दूसरे के साथ मिल जुल कर काम करे तो दोहन जैसा कार्य बहुत जल्दी खत्म हो जाएगा। ये धरा हमें देती है सब कुछ अगर हम भी इसे इसके जरूरत की कुछ सामग्री इस संरक्षण यज्ञ में आहुत कर सकें तो कितना अर्थदायी कदम हम सबका होगा। प्रकॄति के नजदीक हम अनायास ही पहुंच जाएंगें। हम खुद बखुद कई बीमारियों, कई अवरोधकों को खत्म कर देंगें, हम खुद बखुद पोषित होजाएंगें अगर हम पोषक को पोषण देने का कार्य प्रारंभ करेंगें।
हमारे दैनिक जीवन में जितना कचड़ा इस्तेमाल हो रहा है, जितना सामान सुविधाभोगी वस्तुओं को एक बार में उपयोग करके भूल जाते हैं उन सबको बार बार उपयोग करने की आदत डालना चाहिए, कैमिकल खाद्य प्रदार्थों की बजाय प्राकृतिक खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल करना चाहिए, प्लास्टिक, पालीथीन, पाली काटन जैसे सामान को कई बार रिसाइकिल करके इसतेमाल करने की कोशिश करना चाहिए। प्रदूषण के हर उस कारक को खत्म करने की बजाय कम करने की पहले कोशिश करना चाहिए। कम करने की कोशिश में प्रदूषक खत्म तो हो ही जाएगा। हम सब मै नहीं वह करे की परंपरा में अपने घर से किसी प्रयास का प्रारंभ नहीं करते, हमे यही शुरुआत करनी है, हमें अपने आसपास जल प्रबंधन, कचड़ा प्रबंधन, प्रदूषण प्रबंधन, और वस्तुओं को बार बार उपयोग करने की परंपरा को उपयोग करना है और आने वाले पीड़ी के हमसे ज्यादा समझदार बच्चों को भी यही मूल मंत्र सिखाना होगा। हम कुछ अच्छी बात और अच्छे काम के सूत्र सिखाएगें तो आने वाली पीढ़ी के बच्चे इसे अपने जीवन में अपनाएगें, समय की जरूरत है कि प्रकॄति/ धरा के बारे में चिंता, चिंतन, मनन, अध्ययन, अवलोकन, और प्रयास हर दिन हर पल हर घडी होना चाहिए।  हम आने वाली पीढियों को समय सापेक्ष प्रकृति से जुड़ने के हर मौकों में शामिल करना चाहिए। हमें उनको इस काम के लिए तैयार करना चाहिए के वो जल संरक्षण करें, वो अपने आसपास की हरियाली को नष्ट होने से बचाएं और  अधिक से अधिक  पौधों को रोप कर उनकी सुरक्षा करके वन महोत्सव जीवन भर मनाएं, हमें यह याद रखना होगा कि यदि जल है तो कल है, ठीक उसी तरह  यदि हरियाली होगी, जल की खुशहाली होगी, जीवन में दीवाली होगी, महकेंगें बाग बगीचे, लहराएगी लताएं और डालियां, प्रसन्न होकर धरती वर देगी हमारी मनुष्य प्रजाति को कि यह प्रजाति कई जनम उसके आंचल में फले फूंले, आने वाली पीढियां इसी धरा के गुणगान करके आने वाली पीढियों को धरा  पर्यावरण को सुरक्षित रखने का संदेश आजीवन देती रहें। अंतत जीवितं जीवेति धरा, यत्र तत्र युगे युगे। जीवित धरा जीवित रहे, हमारे आसपास से युग युग तक प्राण्युक्त बनी रहे।
अनिल अयान,

सोमवार, 9 अप्रैल 2018

सोशल मीडिया का लोगों के नाम खुला खत

सोशल मीडिया का लोगों के नाम खुला खत
मेरे देश वासियों, आप सभी को इस नाचीज सोशल मीडिया का सादर प्रणाम, उम्मीद है आप सब सकुशल होंगें। क्यों ना अपने मुंह अपनी तारीफ कर लिया जाए। यह मै इसलिये कह रहा हूं क्योंकि आजकल आप सभी मेरे कब्जे में हैं,ठीक उसी तरह जैसे देश की राजनीति भाजपा के कब्जे में आ चुकी है। मै समय के अनुसार आर्वाचीन से प्राचीन तक आप लोगों की नशों में बह रहा हूं, आपकी नब्ज को जानने में मुझे कुछ सेकंड भी नहीं लगता। मै रक्त की तरह आपके अंदर प्रवाहित हो रहा हूं। भारत देश में मेरा अस्तित्व सर्व व्यापी है। मै चर चराचर में समाया हुआ हूं। लोग एक दिन खाना खाए रह सकते हैं किंतु एक पल भी मेरे बिना रह नहीं सकते। मेरी आवश्यकता धर्मपत्नी से भी ज्यादा हो चुकी है। मेरे बिना एक मजदूर क्या मंत्री तक रह नहीं सकते हैं। मै कभी किसी दशक में नवोदित था कभी आर्कुट में सिमटा हुआ था, किंतु वर्तमान में फेसबुक, व्हाट्स ऐप, मैसेंजर ऐप, इंस्ट्राग्राम,और ट्वीटर जैसे अप्लीकेशन ने मुझे आपलोगों की प्राइवेट जिंदगी से लेकर प्राइवेट पार्ट तक बनने के लिए स्वीकार कर लिया। मेरे लिए एक नौनिहाल अगर रोता है तो एक बुजुर्ग अपनी बूढी अंगुलियों को सहला लेता है। मुझे आज के समय में इलेक्ट्रानिक मीडिया से भी चार कदम और आगे आप लोगों ने ही कर दिया है। आपकी इस नवाजिस के चलते मै फूला नहीं समा रहा। मैने आपके मानवीय रिश्तों को आभाशी रिश्तों में बदल दिया है। मैने लोगों को मोबाइल में कैद कर दिया है। लोग बाल बच्चों को बाद में देखते हैं और हाल चाल लेते हैं पहले मेरा ही दीदार करते हैं, चाहे बिस्तर हो, बाथरूम हो या नौकरी की टेबल मेरा चाहत बॉस के डर से बढ़कर है,और बीवी के तानों के परे हैं। मै चलता फिरता पाकेट फ्रेंडली, कम्प्यूटर से बढ़कर हूं। मेरी कीमत इतनी है कि लोग कीमती सामान की खरी दारी, अपने पर्व त्योहार को मनाने की तैयारी ,भी मुझे बिना उपयोग किये पूरा नहीं कर सकते। मै लेखक, रंगमंचीय कलाकार, पालीटीशियन, प्रोफेसनल्स की सबसे अनमोल पर्शनल डायरी हूं,
मेरी आवश्यकता इतनी ज्यादा हो गई है कि मेरे सहारे लोग भारत बंद जैसे बडे बडे कारनामों को अंजाम दे रहे हैं, मेरे द्वारा ही आतंकी संगठन जनता के बीच में मीठे जहर के रूप में प्रवाहित होते हैं, मेरे द्वारा ही देश में भगवा रंग, नीला रंग, हरा रंग, और लाल रंग के झंडे अपने गुट तैयार करने में दिन रात एक कर रहे हैं, मेरी वजह से ही राजनैतिक पार्टियों के जन संपर्क सेल के साथ साथ आई टी सेल को सक्रिय करना पडा, मेरी वजह से कभी मोदी जी ने गुजरात चुनाव जीता, कभी केजरीवाल दिल्ली के मुख्य मंत्री बने,कभी राहुल गांधी के ट्वीट्स का मजाक बनाया गया, मेरे द्वारा ही राजनेता तो राजनेता, खिलाड़ी, बालीवुड स्टार, तक मेन थीम बने रहते हैं, मेरे द्वारा ही देश साथ साथ विदेश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री विश्व में अपना संदेश देते हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया जिस समाचार को बाद में दिखाता है वह मेरे द्वारा पल पल में लोगों के लाइक और कमेंट का हिस्सा बनता है। मेरे द्वारा सात समुंदर पार के लोग आप सबके सगे संबंधी नजदीक आपके मोबाइल स्क्रीन में होते हैं। मैने आपको सुविधाएं दी हैं। मैने आपको रिश्तों के नजदीक लाया है। मैने आपको टेक्नालाजी से जोडा है। मैने आपको इस फील्ड में रोजगार दिया है। मैने मीडिया को कंटेट राइटर दिया है। मेरे द्वारा भले ही आपका डेटा उड़ा दिया गया हो किंतु आपका अंधविश्वास तो प्रणाम करने योग्य हैं आप अपने व्यक्तित्व के लिए झूठी प्रशंसा पाने की इच्छा के चलते अपने डेटा,अपने कांटेक्ट्स और अपनी जानकारियां मुझसे जुडी कंपनियों के साथ साझा करके उनका बैठे बिठाए मुनाफा करवा रहे हैं, पहले मै लोगों के लिए अमृत था और फिर पीने का पानी हुआ धीरे धीरे मिनरल वाटर की बोटल हो रहा हूं।
मेरे देश वासियों आज मै आप सबके लिए मीठा जहर बन रहा हूं, मेरे द्वारा या मेरे माध्यम से बनाए जाने वाले समूह देश की मानसिकता,देश की प्रगति में बाधक बन रही है,आप लोग मुझे कभी औजार बनाते हैं, कभी क्रोध का माध्यम बनाते हैं, कभी आतंक फैलाने का जरिया बनाते हैं, कभी गाली गलौच करने का स्थान बनाते हैं, कभी धर्मों पर कींचड उडेलने का अड्डा बनाते हैं, कभी भाजपा और कांग्रेस के कुरुक्षेत्र युद्ध का युद्धिस्थान बनाते हैं,कभी अस्लीलता तो कभी फ्लर्ट करके बलैक मेल करने की शाजिस बनाते हैं, और तो और मेरे द्वारा, धरने प्रदर्शन, बंद, हड़ताल, कत्ल, डकैती, और भी ना जाने कैसे कैसे अपराध मास्टर माइड के द्वारा सेट किए जाते हैं, मेरे माध्यम से आप सब अपने सुकृत्य और कुकृत्य कभी परदे के पीछे, कभी मुखौटे लगाकर खुले आम करते हैं, कुल मिला कर अब  मै आपकी रखैल बन चुका हूं, पूरी दुनिया मेरे मन तन बदन का उपयोग करके मेरे ही नाम का दुरुपयोग करते हैं, तब भी मै मौन हूं, मेरा आप सबसे विशेष आग्रह है कि भविषय मै यह घोषणा करूं कि आज रात बारह बजे से मै आपकी दुनिया को छॊड कर विलुप्त हो जाऊंगा, इसके पहले ही आप अपनी औकात दिखाना बंद करिये, आपको शायद यह नहीं पता कि भारत देश में अभी फिलहाल सोशल मीडिया के ग्रुप एडमिन और दोषी सदस्य को गैरजमानती वारंट और जेल की सजा है, यदि आप लोगों ने मेरा इसी तरह गलत उपयोग किया तो भविषय में मुझे उपयोग करना भी गैरकानूनी हो जाएगा और आप जेल की हवा खाएगें,बाकी आप खुद समझदार हैं, समझदार के लिए इशारा ही काफी हैं, उम्मीद हैं मुझे विष कन्या होने से बचाएं, क्योंकि सावधानी ही बचाव है। मेरे आगे पीछे तो कोई नहीं किंतु आपके आगे पीछे तो बाल बच्चे हैं और वो आपको जेल का कैदी कहना और सुनना नहीं पसंद करेंगें। अंत में आप सबको राम राम, अपने अच्छॆ दिन बरकरार रखिए और सोशल मीडिया की दो बूंद जिंदगी की लेते रहिए किंतु मुझसे जो जाने अनजाने आपको नुकसान हो रहा है उसको समझिये।आपकी भलाई इसी में है कि मेरी उपयोगिता को अपराध की प्रवृति में मत बदलिये,क्योंकि आपका कानून और संविधान भी इस आईटी की महत्ता को समझ रहा है,आपकी एक लापरवाही आपकोम आपके जीवन को,आपके कैरियर को और आपके अस्तित्व को समाप्त कर सकता है।आप देश प्रेमी की बजाय देशद्रोही हो सकते है। अंत में होशियारों के सामने और क्या होशियारी दिखाऊं, अंत में इसी प्रार्थना के साथ कि आपका मेरे साथ जीवन सुखमय हो। आपका ही शुभ चिंतक, सोशल मीडिया,भारत देश।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

वर्ग संघर्ष और आगामी चुनाव

वर्ग संघर्ष और आगामी चुनाव

एससी और एसटी के अत्याचार रोकथाम कानून मे मूल चूल परिवर्तन के विरोध में जिस तरह उत्तर भारत में दलित समूहों के द्वारा हिंसक घटनाएं हुई वह हमारे देश और समाज के लिए बहुत ही चिंता जनक होने के साथ साथ यक्ष प्रश्न खड़ा करता है। दस से अधिक राज्यों में हिंसक प्रदर्शन के माध्यम से आरक्षण नीति और उससे जुडे हुए जितने भी एक्ट है उसके परिवर्तन का परिणाम हमारे सामने था। खुद मध्य प्रदेश में इससे कई जिलो में कर्फ्यू का ऐलान करना पड़ा। भारत में बीस प्रतिशन से अधिक दलित समुदाय के वोटों की चिंता हर राजनैतिक पार्टी को हो रही है। इस प्रकार के दंगों से राजनैतिक व्यूह रचनाओं को बल मिला है। उधर दूसरी तरह दलित आंदोलन को मरहम लगाते राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी नजर आई जो कई मायनों में वर्ग संघर्ष को बढाने का काम किया है। अब सवाल यह उठता है कि लोकसभा और विधान सभा की सीटों में आरक्षण के लिए निर्धारित सीटों की सुरक्षा के लिए ही ये वर्ग संघर्ष फैलाए जा रहे हैं। वर्तमान सरकार के लिए दलित रिसाव उनके चुनाव के लिए घातक सिद्ध होने वाला है। दलितों को यह अहसास हो चुका है कि मौजूदा सरकार ने उनके जीविकोपार्जन से लेकर सुनवाई तक के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं। भीम सेना और बजरंग दल के सीधे टकराव की स्थिति जातिगत समीकरण को और कट्टर बना दिये हैं। और मध्य प्रदेश ही क्यों राजसथान के अंदर उत्तर प्रदेश के अंदर जिस तरह की राजनैतिक उछल कूद की स्थिति बनी है और इस उछल कूद के बीच जिस तरह से सामाजिक वर्ग और वर्ण को घसीटा जा रहा है वह समाज की सुख शांति को भंग करने के लिए आग में घी का काम कर रहा है। हर जगह लोक तंत्र रूपी द्रौपदी का चीरहरण राजनैतिक पार्टीयां जी खोल कर कर रही हैं।
इस सरकार के कार्यकाल में यह देखा गया है कि  आरक्षण को लेकर दलित आंदोलन के खिलाफ सरकार बैकफुट पर जा रही है। हिंसा , संघर्ष, विरोध , और विद्रोह की स्थितियों सरकार के पास कोई कारगर रास्ता नहीं रहा है। यदि हम पुराने पन्ने पलटें तो  ऊना से लेकर रोहित वेमुला की घटनाए हों, हरियाणा से फरीदा बात की घटनाएं हों, या फिर महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव की घटना हो सभी घटनाओं में केंद्र में दलित ही रहे, समय स्थान और राजनैतिक परिदृश्य बस बदले बांकी सब घटनाओं में दलित ही मोहरे के रूप में उपयोग किये गए। यदि हम इस कानून के बदलाव के बारे में देखें तो इस कानून के तहत शिकायत के तुरंत बाद गिरफ्तारी पर रोक लगाने और आरोपी को अग्रिम जमानत देने का मौका देने वाले इस फैसले ने इन आरक्षित वर्ग को सुलगा दिया। इस सुलगते वर्ग संघर्ष का परिणाम ही यह आदोंलन रहा। इस परिवर्तन के बाद सवर्ण और अवर्ण दोनों सकते में हैं अवर्ण को यह चिंता है अब इस एक्ट के तहत वो आरोपी को  सीधे जेल नहीं भेज पाएगें, परन्तु दुरुपयोग करने वालों पर होने वाली कार्यवाही का कोई मानदंड़ नहीं है। सवर्ण जो इस तरह के न्यायिक मामलों में सीधे जेल की हवा खाते थे उनके लिए यह खबर अच्छी है कि अब उन्हें मामले के अंदर खुद के बचाव के लिए काफी समय मिल जाएगा। किंतु वोट बैंक के चलते कोई भी दल इस बात को कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है। उपयोग और दुरुपयोग के अनुपात को देखें तो इस एक्ट के तहत दोनों तरह के मामले समाज में देखने को मिले हैं।
इस तरह के मामलें में प्रशासन का कोई कारगर उपाय सामने नहीं आता है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी फिलहाल इस तरह की सुनवाई को जल्द चालू करने से इंकार कर दिया है। साथ ही राजनैतिक दल अपने अपने बिलों में घुस कर नौटंकी का गुणा भाग लगा रहे हैं। आरक्षित वर्ग के माई बाप कहे जाने वाले राजनैतिक दल भी खुल कर विरोध का समर्थन नहीं कर रहे क्योंकि उनका ध्येय आगामी चुनाव और उसके परिणामों पर है। सरकारों के पास पेपर लीक का निदान, पेट्रोल और डीजल के दामों की कमी, आन लाइन डाटा लीक के अपराधों पर लगने वाली नकेल नहीं हैं। उनके पास इन मुद्दों से भटकाने वाली नीतियां, डा अम्बेडकर के पिता जी के नाम को जोड़ने के लिए जग्दोजहद, विदेशी निवेश की चिंता और संसद सत्रों में सरकार की पैरवी पर ध्यान लगा हुआ है। सेवानिवृति की आयु को बढ़ाकर बेरोजगारी के ग्राफ को बढ़ाना, दिन प्रतिदिन सरकार के द्वारा नये नवेले आश्वासन वायदे, नई नियुक्तियों की घोषणाएं, समर्थन मूल्यों की आस, जल प्रदाय की उम्मीद दिखाने में व्यस्त प्रशासन चुनावी आहटों में मसगूल हो चुका है। तराजू के दो पल्ले समाजिक ढ़ांचे के अनुरूप कभी आरक्षित वर्ग की मुनादी करते हैं, कभी अनारक्षित वर्ग की मुनादी करते हैं, परन्तु तटस्थ होकर कोई भी परिणाम नहीं निकलता है। इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण मात्र और मात्र सत्ता की पंचवर्षीय दुधारू गाय है जिसका सब स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं। चुनावी दंगल के लिए समाजिक वर्गों को आपस में भिड़ाने की बजाय हिंसात्मक रवैये को खत्म करने की कोशिश दलों को करना चाहिए।
अनिल अयान सतना
९४७९४११४०७ 

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

होरी रे! अब ना पधारो म्हारे देश। अनिल अयान

होरी  रे! अब ना पधारो म्हारे देश। अनिल अयान
बरस-बरस पर आती होली,रंगों का त्यौहार अनूठा,चुनरी इधर, उधर पिचकारी,गाल-भाल पर कुमकुम फूटा,लाल-लाल बन जाते काले,गोरी सूरत पीली-नीली,मेरा देश बड़ा गर्वीला,रीति-रसम-ऋतु रंग-रगीली,नीले नभ पर बादल काले,हरियाली में सरसों पीली !-गोपाल सिंह नेपाली। गोपाल सिंह नेपाली ने कभी भी ना सोचा होगा कि होली के रंग इस तरह से रंगहीन हो जाएगें। होली की फुहार के रंग सूख जाएगें और धूल की तरह उडे़गें। एक दशक पूर्व तक होली के पूर्व होलिका स्थापित कर ईष्र्या, क्रोध व कुपृव्रत्तियों को जलरने की परंपरा में व्यापक सामाजिक सहभागिता सुनिश्रि्वत की जाती थी। इसी के तहत होलिका में कुछ न कुछ हर घर से डालने की परंपरा थी। बदलते परिवेश में यह भी समाप्ति की तरफ है। होली के पखवारे भर पूर्व से गाये जाने वाले रस भरे लोक गीतों का स्थान फूहड़ गीतों ने ले लिया है। पहले होली में गाये जाने वाले गीतों में सामाजिक उत्कर्ष की भावना निहित होती थी जबकि उसमें आंतरिक आद्रता की झलक मिलती थी। परंपराओं के प्रति अ ब लोगों में वह छोह नही रह गया है जबकि पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने की होड़ ने भी हमारी परंपराओं को पीछे धकेला है।पहले के समय में गाँव व शहर सब होली की महक में भिनसारे से रात के तीसरे पहर तक गुलाबी होते थे। पहले पलाश और टेशू के रंग तो खुद बता देते थे कि उठो फागुन आ गया है। रंग बरसते थे बरसात की तरह, बनारस का पान खाकर होरियारे जब अपनी टोलियों के साथ गली पगड़डियों में निकलते थे तो बूढो को जवानी का अहसास हो जाता है। वो गोकुल बरसाने की होली की याद देश भर में हर कोने कोतरे में दिखाई पड़ते थे। अब तो सबके चेहरों के रंग उडे हुए हैं। अब तो गरीबी में प्रह्लाद जीने को मोहताज हो गया है। अब तो विकास का होलिका दहन करने के लिए प्रशासन खुद लगा हुआ है। कर्ज की फागुनी हवाएँ आम जन को दोबारा ठंड़क का एहसास कर करा रहा है।
गाँवों में रंग तो फसलों के मुरझाए चेहरों के साथ फीके पड़े हुए हैं। हालाँकि सरकार इन फसलों पर अपने सरीखा रंग पोतने में व्यस्त हैं परन्तु मुआवजे के रंग के चढ़ने की संभावन अभी तो फिलहाल कम ही नजर आ रही है। गुलाल का हाल यह है कि यह गुस्से से लाल हो चुका है। अबीर फिलहार देश के उन चेहरों की शान बन रहा है जो देश का माल पैक करवाकर विदेश यात्राओं के मजे ले रहे हैं। फिल हाल हमारा मीडिया भी श्री देवी के स्वर्गगमन का शोक मनाने में व्यस्त नजर आ रहा है। और तो और विकास की रफ्तार वर्तमान के होरियारों की टोलियों की गति के अनुसार अवरोध महसूस कर रहा है। संत्रियों की स्थिति फिलहार मंत्रियों की स्थिति से गैर गुजरी हो रही है। चुनावी रंग रोगन करने के चक्कर में मंत्रियों की टॊली फगुआ की बोली में मृंदग बजाते नजर आ रहीं हैं। वोटों की ईष्र्या, कर्जनुमा होलिका का क्रोध, वास्तविक जीवन शैली में पाश्चात शैली का रासायनिक रंग रोगन सामाजिक मौलिकता के प्रहलाद का दहन कर रहा है। अब ना आम की बौर इस फागुन का स्वागत करती है। ना नीम की निबोरी रंगीन मिजाज दिखाती है। अब तो हर जगह दो पंथ आपस में ऐसे महा संग्राम करते हैं जैसे देवदानव युद्ध की रिहर्सल कर रहे हों। अब इन पंथों के बारे में क्या कहूं इनका भी होली मनाने का अलग अलग रंग हैं एक पंथ होली को भोजपुरी अंदाज में बोल्ड़ मानता है। चूनर ना होते हुए भी चूनर को मन में "माना कि" की तरह मानकर गोरियों को रंगने की फिराक में होता है। और दूसरा पंथ होली को अवधी के अंदाज में कृष्ण राधा की तरह बरसाने की होली की तरह चंदन रोली रंग गुलाल को भारतीय अंदाज से मनाने के लिए संस्कारिक तौर पर सर्वमान्य है।
देश में बदलाव के रंग ने रंग बदलने के लिए सबको विवष कर दिया। जो रंग नहीं बदल रहा है उसे बदलाव के रंग ने आगे से गीला और पीछे से पीला कर दिया है। चेहरे को लाल कर दिया। अब शोख होठ और गुलाबी नहीं होते हैं। चेहरों के साथ प्यास से होठ सूख रहे हैं। और गुलाबी गाल  कुछ समय के लिए कंगाल हो गए हैं। चेहरे की सुर्खियाँ भी मिलावटी बर्फियों की तरह हो गई हैं। जिसकों कोई पूँछने वाला नहीं है चेहरों में चेहरे इस तरह लगे हुए हैं कि मुखौटों को पहचान पाना कठिन हो गया है। यही मुखौटे तो चेहरे के साथ साथ समाचारों की स्रुर्खियाँ बन कर टीआरपी की बढोत्तरी कर रहे हैं। आम जन के जीवन में कुछ गिने चुने रंग बचे हुए हैं, सात रंग के इंद्रधनुषीय सपने बाजारवाद के चाइनीज रंगों की तरह बिना गारंटी वाले हो चुके हैं। सात रंग के सपने बुनना आजकर तो रईसों के खातों की जागीर हो चुकी है। मध्यमवर्ग तो अमीरी और गरीबी के बीच झूलता झूलता मुस्कुराता हुआ जीवन काट लेता है। अब तो गुझियाँ की मिठास भी खोवे की तरह हाइब्रिड हो चुकी है। शक्कर की मिठास इतनी ज्यादा हो गई कि रिश्तों में डाइबिटीज होने का खतरा बढ़ रहा है और खटास की खटाई से दांत खट्टॆ हो रहे हैं, दातों तले अंगुली दबाने के लिए हम सब विवश भी है ताकि हमारे पशीने की नमकीन शायद इस खटास को दूर कर सके। सब बदल रहा है, रंग बदल रहा है, ढ़ंग बदल रहा है,  अंग बदल रहा है, और क्यों न बदले हम जो गिरगिट के अग्रवंशी हो गए हैं। गिरगिट हमारा पूर्वज है तो हम अग्रज उससे चार कदम और आगे हैं रंग ढ़ंग बदलने में। अब देखिए ना लाल रंग खून का दिखाया जा रहा है, केसरिया रंग हिंदुत्व का दिखाया जा रहा है हरा रंग मुस्लिमों का दिखाया जा रहा है, सफेद रंग कफन का दिखाया जा रहा है, एकता,शांति,वीरता,और हरीतिमा के रंग तो होलिका दहन के साथ ही भस्मीभूत हो गए। देखिए कहीं आपके मोबाइल में भी आयातित होली का संदेश न बज रहा हो। मोबाइल की हथकडी ने हमारे पैरों को बेडियों से भी जकड़ दिया है। दिमाग को कोमा भेज दिया है। प्रचलित होली की आवृत्ति नहीं हो रही, सिनेमा भी इन त्योंहारों को हम सबसे दूर कर दिया है। सास बहू के धारावाहिकों ने रिश्तों में जहर के रंग को  होली के एपीसोड में प्रवाहित करने में तुले हुए हैं। बस होली मनाने का अंदाज अपना है। जिस तरह समाज के आचार विचार बदल कर प्रचार प्रसार के वशीभूत हो गए है, जिस तरह फूहड़ता का रंग होली के रंग को भंग करने में उतारू है, जिस तरह अश्लीलता का रंग नख सिख वर्णन की सीमा रेखा को पार करके अंतरंग की नुमाइश कर रहा है तब मन में हूक सी उठती है इसमें सुनाई पड़ता है होरी रे अब न पधारो म्हारे देश।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

ये अदद मोहब्बत है, सलीके से बेचिए इसको

ये अदद मोहब्बत है, सलीके से बेचिए इसको
जिंदगी का फलसफा भी कहां से शुरू होकर कहाँ खत्म हो जाए कोई नहीं जानता। हर कवि ने अपने अपने अनुसार इस प्रेम रूप रस की व्याख्या की है। बाजार ने अपने अनुसार इसे देखा है। खरीददार और बेंचने वालों ने इसकी बोलियां भी लगाई है। कभी कबीर ने लिखा पोथी पढ पढ जग मुआ पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढे तो पंडित होय तब से लेकर अब तक प्रेम,प्यार, मोहब्बत,इश्क और, आशिकी पर हर रचनाकार ने कुछ ना कुछ लिखा ही है। इस पर न जाने कितने लतीफे बनाए गए। वैदिक काल से कृषण-राधा से शुरू होकर कॄष्ण मीरा तक की परंपरा आज हीर रांझा, सोनी महिवाल, लैला मजनूं जैसे प्रेम कथाओं में भी समाप्त नहीं हुई। अमृता प्रीतम से लेकर पंकज सुबीर, और लघु प्रेम कथाओं पर तो न जाने कितनी कलम चलीं। पता है कभी कभी लगता है कि हमने अपने अरमानों के भी मजहब बना लिए हैं। सलीके और तरीके व्यावसायिक हो गए हैं।
हम हाईटेक हो गए हैं। अभिव्यक्ति भी हाईटेक और आभाशी हो गई हैं। हमने पश्चिम से आयात करके सभ्यता के प्रतिमान खुद गढ़ लिया है। प्रणय दिवस को लेकर इतना हो हल्ला होता है कि लगता है जैसे भारत वर्ष में इस सदी का कोई महोत्सव मनाने की तैयारी की जा रही है। यह सब बाजार के हथियार है दोस्तों। जिस प्रेम को छिपाया जाता है, जिस प्रेम को खतों, के माध्यम से अभिव्यक किया जाता था। आज हम उसी प्रेम की मार्क्रेटिंग कर रहे हैं। इस प्रेम के सेल्स मैन तैयार है बाजार में। प्रेम प्रारंभ तो होता है आकर्षण की जुबां लेकर और बाजार में जाकर उपहारों में लुट जाता है। आज का मुद्दा प्रेम कम और इस प्रणय दिवस में मिलने वाले उपहारों की कीमत ज्यादा है। उपहारों ने तो जाने अनजाने जीवन में छद्म प्रेम और छद्म प्रेमी का प्रवेश करा दिया है। बाजार हम सबके प्रेम की ब्रांडिंग और एडवर्टाइजमेंट कर रहा है। प्रेम की परिणित रोमांस भी होगी यह दिवास्वप्न ही था हम सबके लिए। पर धन्य है बाजार और प्रेम के सेल्स मैन जिन्होने पश्चिम से प्रेम की कई कई कोटियां निर्धारित कर दी हैं। हर श्रेणी में बाजार लग जाता है। हर श्रेणी के दिन निर्धारित कर दिए जाते हैं। हर श्रेणी के व्यवसाय में सरकार लाभ कमा रही है। सरकार को कर से उप कर तक मिल रहा है। और सरकार के नुमांइंदे इस प्रेम के मार्केटिंग का दिखावटी विरोध दर्ज कर रहे हैं। इसी बहाने समाज में विचलन पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।
प्रेम तो मां के बेटे के संबंध में भी है, पिता का अपनी संतति से, भाई का बहन से है, पर आजकल  बाजार उस प्रेम को प्रदर्शित कर रहा है जो लिविंग रिलेशन में हैं, जो ब्वायफ्रेंड और गर्लफ्रेंड के बीच है, जो विवाहोत्तर स्त्री का पुरुष के बीच जीवन साथी के परे हैं, जो सोशल साइट से उपजता है और कोर्ट कचेहरी या आत्महत्या पर जाकर खत्म हो रहा है। बाजार के ये सब गुर है साहब, जो अनायास ही नए रूप परिवर्तित हो गए। हमने अपने आस पास दैहिक प्यास को प्रेम के रूप में परिभाषित कर दिया। बाजार ने उसे हमी को बेंचने के लिए एक मार्केट खड़ा कर दिया। पश्चिम ने विश्व स्तर पर भारत को लाने के लिए इन्हीं भावों का बाजारीकरण कर दिया। अब तो सब संकरित हो चुका है। इजहार और इकरार भी आयातित हो चुके हैं। उपहार भी आयातित हो चुके हैं। विचार और आचार भी आयातित हो चुके हैं। इस प्रेम के लिए मदर्स डे, फादर्स डे, सिस्टर्स डे, वाइफडे,हसबैंड डे, और वेलेनटाइन डे बना दिए गए। चलो अच्छा ही है अब आज के इस भागमभाग के युग में किसी केपास किसी के लिए कुछ पल भी खर्च करने के लिए नहीं हैं। हम अकेलेपन के साथ जीवन जीने के लिए बाध्य हैं। हमारा विश्वास वास्तविक रिश्तों के प्रति कम और आभासी रिश्तों में ज्यादा बढ रहा है। तो कम से कम वैधानिक अवैधानिक रिश्तों के लिए इन दिनों के चलते कुछ जेब तो खर्च करते है। हां इस संदर्भ में एक बात तो है यहां पर हम ही बाजार है, हम ही दुकानदार है, हम ही सेल्स मैन हैं, हम  ही इसके दलाल हैं, हम ही खरीददार भी हैं। जब सब कुछ हम ही हैं तो तीसरा भी कोई अप्रत्यक्ष रूप से इस फायदे में शामिल हैं और वह है समाजिक ढांचा और हमारा वैचारिक चिंतन।
प्रशासन से लेकर समाज तक इस इस बाजार वाद में रम गया है। सबके अपने अपने स्वार्थ है। सबके अपने अपने तवे हैं जहां इसकी रोटियां परोसी जा रही हैं। और तो और रखवाले भी इस मृत्युभोज के अदद स्वाद का आनंद अंगुलियां चाट चाट कर ले रहे हैं। इस बाजार में इस मार्केटिंग के पुल बांधें जा रहे हैं। किसी को आर्थिक फायदा है। किसी को मानसिक फायदा है। किसी को जेहनी फायदा है। बस फायदे का ही कायदा है। तो हम क्यों कायदों की सीमाएं बनाएं। क्यों हम विरोध का जरिया बने। क्योंकि विरोध करने वाले जितने ठेकेदार हैं उन्हीं के घर से इसकी जडे प्रारंभ होती हैं। जिनकें यहां साल भर रोमांस चलता है वो विशेष दिनों में विरोध दलों के पेशेवर सदस्य बन जाते हैं। इस लिए जिसे जिसे प्रेम की मार्केटिंग करानी हो वो बाजार में कूद जाए। बाजार खत्म होने तक शामिल रहे और फिर बाद में सोचे कि वो फायदे में रहा कि नुकसान में रहा। अगर आप बाजार में बाजारू नहीं होंगें तो बाजार आपको कूडेदान का सामान मानकर कूडे के भाव में बेंच देगा साहब। आप वो बिका सामान बन जाएगें जिसकी वापसी की गारंटी कोई दुकान वाला नहीं लेता।  
बहरहारइस तरह के दिन पारंपरिक पर्वों की रौनक के परे भी हमारे आसपास गर्माहट बनाए रखते हैं। हम सक्रिय बने रहते हैं, हम इस सक्रियता के चलते भले ही अपना आपा खो दें परन्तु यह तो तय है कि हमारी खुद की स्वीकारोक्ति है कि इस तरह के बाजारवादी आयोजन में आपा खो दें भी तो कोई फिक्र नहीं है। हम खुद हर प्रकार परिस्थितियों को स्वीकार करने के लिए बाध्य हो चुके हैं। क्योंकि हम मार्केट में है साहब,इस मार्केट में जब हमारा शरीर,आत्मा, आस्था, विश्वास,और रिश्ते तक बिक जाते हैं, तो प्रेम किस खेत की मूली है, यहां पर हम चिताओं के जलने के बाद बची हुई लूक तक बेंच लेते हैं। यहां पर अंतरंगता भी करोडों में बिक जाती है। प्रेम तो फिल हाल बहुत सालीन है। अनमोल प्रेम को भी हम मोल लगाकर बेंच लेते हैं। विज्ञापन बनकर प्रदर्शित हो जाता है हमारा प्रेम, एक लंबे समय के तक चिंतन करने के बाद समझ में आता है कि सर्फ एक्सेल का विज्ञापन तो हम सबने देखा है कुछ अच्छा हो तो दाग अच्छे हैं। एकाकीपन को दूर करने के लिए अगर बेदाग से दागदार हो जाओ तो क्या बुरा है साहब। किसी अपने की खुशी के लिए ये मार्केटिंग भी ठीक है। बस शर्त यह है कि सलीका से काम होना चाहिए।
यह प्रेम खड़ा अब हाट में सबकी मागें खैर।
तू बेचें मुझे हाट में पर ना तुझसे कोई बैर।
खरीद बेंच धर्म है सब कुछ यहां बिक जाए।
नहीं सोच अब तू खड़ा क्या खोय क्या पाय।
अनिल अयान।

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

"अभिव्यक्ति के वैचारिक खतरे"

"अभिव्यक्ति के वैचारिक खतरे"
अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे/उठाने ही होंगे/तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब/पहुंचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार/तब कहीं देखने मिलेंगी हमको/नीली झील की लहरीली थाहें/जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता/अरुण कमल एक। (मुक्तिबोध) यह कविता तो हम सबने सुनी ही होगी। मुक्तिबोध जैसा रचनाकार बहुत साल पहले यह रचकर चला गया कि मुक्ति का बोध कैसे प्राप्त होगा हर इंशान को। संघर्ष के समय हमें किस विषय पर किस तरह के विचार व्यक्त करने होगें। हर व्यक्ति के अंदर समाज स्थित होता है। समाज में हर व्यक्ति खुद समाज की एक इकाई होता है।हर व्यक्ति समाज में रहता है। समाज की अभिव्यक्ति को अपनी अभिव्यक्ति बनाने की चेष्टा करता है। या फिर समाज में अपनी अभिव्यक्ति को समाज की अभिव्यक्ति बनाने के लिए प्रयास करता है। वैचारिक अभिव्यक्ति से लेकर, सांस्कृतिक सामाजिक, और शैक्षिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वतंत्रता के नाम अभिव्यक्ति का महिमामंडन कुछ ऐसे बिंदु हैं जिस पर स्वस्थ बातचीत की आवश्यकता है।
समाज सापेक्ष हमारी अभिव्यक्ति क्या है यह भी हमें समझने की आवश्यकता है। वर्तमान समय में हमने अभिव्यक्ति को अपना अधिकार तो माना है किंतु अभिव्यक्ति को अपने कर्तव्य के रूप में नहीं देखते हैं।भारतीय संविधान के निर्माण के दौरान संविधान सभा में हुई बहसों में ‘विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नागरिक स्वतंत्रताओं की आधार रेखा' कहा गया है. संविधान की धारा 19(1) जिन छह मौलिक अधिकारों का प्रावधान करती है उनमें विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पहला स्थान है. अन्य मौलिक अधिकारों की ही तरह विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी आत्यांतिक और अनियंत्रित नहीं है. विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त सीमाएं इन बातों के आधार पर लगायी जा सकती हैं- 1)मानहानि, 2)न्यायालय की अवमानना, 3)शिष्टाचार या सदाचार, 4)राज्य की सुरक्षा, 5)दूसरे देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, 6)अपराध के लिये उकसावा, 7)सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और 8) भारत की संप्रभुता और अखंडता.  आदि कुछ ऐसे बिंदु हैं जो यह स्पष्त करते हैं कि हमारी अभिव्यक्ति की नाक कितनी बड़ी होनी चाहिए और नाक की लंबाई को कितना बढाना चाहिए कि वो कटने से बची रहे।
कभी कभी हमारी स्वतंत्रता हमारे लिखे और बोले गए विचारों को वाद विशेष से जोडने का माध्यम बन जाता है। अगर हम स्वतंत्र अभिव्यक्ति करते हैं तो हमारे ऊपर कोई वाद पंथ या कोई समुदाय हावी नहीं होना चाहिए। अगर ऐसा है तो हम कहीं ना कहीं पर वैचारिक गुलाम हो चुके हैं। इसके लिए आवश्यक है कि दोनो दिशाओं से मंडराते खतरे अपना सिर उठा रहे हैं उनके बीच समभाव से काम करते हुए एक दूसरे के विचारों का सम्मान दिया जाना चाहिए।हमारी स्वतंत्रता अगर सवाल करने की स्वतंत्रता देती है तो सवालों को सही तर्क और तथ्य के अधारा पर जवाब देने की सहन शक्ति भी प्रदान करती है। जो हमारा कर्तव्य भी है।सवाल करने की ताकत से लोकतंत्र मजबूत बनता है। अपने से भिन्न विचारधारा रखने वाले लोगों की विचारधारा का सम्मान और विचारधाराओं से परे व्यक्ति का महत्व भी लोकतंत्र के लिए जरूरी है। विकसित राष्ट्र के लिए भविष्योन्मुखी दृष्टि का होना जरूरी है। और जरूरी हो जाता है साहसपूर्ण स्वर का सम्मान करना जो  एक  साहस पूर्ण वैचारिक स्वतंत्रता का दूसरा पहलू है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी एक दो पहलू वाल सिक्का है जिसके एक पहलू को तो हम बखूबी याद रखते हैं किंतु दूसरे पहलू को हम बहुत जल्दी भूल जाते हैं। यह भूल जाते हैं कि हमारी स्वतंत्रता से किसी की स्वतंत्रता बाधित ना हो। हमारे विचार अगर आयातित हैं तो हम बहुत जल्दी उग्र हो जाएगें क्योंकि हमारे पास वैचारिक रटन्त विद्या का उथला बोझ है। हमारे पास विषय वस्तु पर ज्ञान का सागर ना होकर मात्र बरसाती नाले का मौसमी बहाव है। इस बहाव में हमारे साथ हमारी शांति बहजाती है और कट्टरता उफान पर आजाती है। आज जरूरी है कि अभिव्यक्ति की स्वंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ढकोसले को भिन्नता करने की। अगर हम इस भिन्नता को समझ लेते हैं तो शायद हम अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को  सही मायने में उपयोग कर पाएगें। अन्यथा इस स्वतंत्रता को किसी की वैचारिक परतंत्रता के लिए बलिदान करते रहेंगें।
अनिल अयान सतना

९४७९४११४०७

हिंदी है हम वतन हैं हिंदोस्तां हमारा।

हिंदी है हम वतन हैं हिंदोस्तां हमारा।
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा, हिंदी हैं हम वतन हैं हिंदोस्तां हमारा। यह गीत हमारी भाषाई पहचान को वैश्विक स्तर पर रखने का काम करता है। विगत सप्ताह दो प्रमुख भाषाई और दर्शनशास्त्रीय पर्व मनाए गए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी दिवस और युवा दिवस। इसके साथ ही कई संस्थानों में युवाओं के साथ हिंदी के तालमेल को बिठाने की जग्दोजहद प्रारंभ कर दिया गया। आज हम कुछ तथ्यों पर विचार करेंगें जो यह बताएगें कि कैसे युवा वर्ग हिंदी को वैश्विक स्तर तक पहुंचाने के लिए प्रयास रत हैं। वास्तविकता यह है कि हम हिंदी को याद करने के लिए राजभाषा पखवाडे तक सीमित रखने के प्रयास में खुद को भावनाशून्य बना लेते हैं। किंतु विश्व हिंदी दिवस का प्रारंभ और इसके प्रचार प्रसार में युवा वर्ग का एक महत्वपूर्ण योगदान है। साथ ही साथ वैश्विक स्तर पर हिंदी की पहचान मजबूत करने के लिए युवाओं का योगदान दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। वैसे तो अधिक्तर युवा अपने महाविद्यालयीन काल से ही अंग्रेजियत और प्रौद्योगिकी की ओर रुख कर देता है। किंतु उसके अंतस में हिंदी का कीड़ा कुलबुलाता रहता है। हिंदी उसकी जुबान से अलग नहीं होती। हिंदी उसकी सांसों में गतिमान बनी रहती है। मेरे पहचान के अधिक्तर इंजीनियर्स, डाक्टर, टीचर्स,और अन्य व्यवसायी मित्र हिंदी के प्रति शुभ संकेत देते हैं। वो हिंदी को बोलना सुनना और संवाद करना पसंद करते हैं। हिंदी राजभाषा के रूप में स्थापित हो या ना हो किंतु समाज में हिंदी का अपना प्रजातंत्र हैं।
जब हिंदी के वैश्विक परिदृश्य की बात करें तो हमें हिंदी के प्रचार प्रसार के विभिन्न कारकों को नहीं भूलना नहीं चाहिए। हिंदी को बोलने के साथ साथ हिंदी को वैश्विक भाषा साहित्य में स्थापित करने का काम भी युवा कर रहे हैं। वर्तमान में भारत के बाहर भी हिंदी के युवा लेखकों की पुस्तकों को ७० प्रतिशत तक इंटरनेशनल प्रकाशक प्रकाशित करने के लिए स्वागत करते हैं। विश्व पुस्तक मेले में युवा लेखकों की पुस्तकों का प्रतिशत साठ से अधिक ही रहा। अधिक्तर बिक्री वाली पुस्तकों में भी युवा लेखकों की पुस्तको को पढ़ने और खरीदने का श्रेय युवकों और युवतियों और महिला ग्रहणियों को जाता है। यह मामला तो प्रगति मैदान का है। भारत में जितनी भी नेटवर्किंग साइटस हैं उसके भारतीय खाताधारकों की ८० प्रतिशत संख्या हिंदी को हिंदी में लिखने में खुश होते हैं। उनका रोमन हिंदी में लिखना और अंग्रेजी के प्रति रवैये की उदासीनता की वजह से इस परिणाम तक हम पहुंच चुके हैं। वर्तमान में युवाओं के प्रेरणा श्रोत ऐतिहासिक और समाजिक पात्रों के साथ साथ आस पास के सफल युवा होते हैं। वर्तमान युवा नौकरी की बजाय उद्यमी बनना ज्यादा पसंद करते हैं और सर्विस सेक्टर में अपनी पहचान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन करते हैं। विश्व स्तर पर जितने भी हिंदी भाषा अप्रवासी युवा वर्ग हैं वो सब अपने आप को हिंदी के परिवेश में ढालने की चेष्टा करते हैं। औसतन युवा लेखक, संपादक और युवा उद्यमी भारत में अपनी पहचान को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहते हैं। वो विदेश में हिंदी की पहचान को दिन दो गुना रात चौगुना वृद्धि करने में अपने स्तर पर प्रयास करते रहते हैं।
अगर हम हिंदी से संबंधित इंटरनेट में ई मैग्जीन्स और हिंदी के पोर्टल्स की बात करें,  या हिंदी में ब््लॉग्स की बात करें तो युवा वर्ग हिंदी के क्षेत्र को यहां पर भी विस्तार दे रहें हैं। फेसबुक, ब्लाग, ट्वीटर, स्टॊरीमिरर, प्रतिलिप, वेबदुनिया हिंदी आदि नाना प्रकार की हिंदी वेबसाइट हैं जो हिंदी को वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए मददगार हैं। पिछले सप्ताह से अगर हम विश्व हिंदी दिवस, विश्व पुस्तक मेले, विश्व अप्रवासी दिवस, और स्वामी विवेकानंद के जन्म दिन को मना रहे हैं तो हमें युवाओं की भाषा: हिंदी के लिए, युवाओं के हिंदोस्तां में रहने की वजह से : हिंदी नागरिक होने के लिए, इटरनेट के माध्यम से युवाओं के हिंदी प्रयासों के लिए युवाशक्ति युगे युगे को स्वीकार करना होगा। युवा शक्ति से राजनीति में वोटनीति है। योजना नीति है। और संवैधानिक नीति है। संसद से लेकर पगडंडी तक, कारखानों से लेकर खेतों तक युवा मौजूद हैं और मानवसेवा के मिशन लगे हुए हैं। संघर्ष,समर्पण,और सफलता अलग अलग स्तर पर युवा शक्ति विकास को पागल होने से रोक रही है। कुछ समूहों के बरगलाए युवाओं को अगर सही दिशा दी जाए तो वो भी हिंदोस्तां के सर को गौरव से ऊंचा करेंगें।
हम बार बार कहते हैं कि युवा वर्ग अपने उद्देश्यों से भटक रहे हैं। वो अलगाव, भ्रष्ट राजनीति, और आतंकवाद के पैतरे बन रहें हैं, वो समाज में वैमनस्यता फैलाने के लिए एक औजार के रूप में गुटों के द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे हैं आदि आदि बहुत सी बाते बुजुर्गों के द्वारा सुनते हैं किंतु कभी युवाओं को अपने पास बिठाकर उनके साथ बुजुर्गों को जवान होते या जवान महसूस करते या उनके साथ युवा हृदय होते बहुत कम बुजुर्गों को देखा होगा। समाज को यह स्वीकार करना होगा कि पीढी के वैचारिक अंतर को संवाद ही दूर करता है और वर्तमान में युवावर्ग इस अंतर को दूर करने के लिए स्वमेव प्रयासरत होगा है। उस समय पर भी वो हिंदी का ही सहारा लेता है। विदेश में जाकर शिक्षा लेने वाले युवाओं में अधिक्तर युवा वर्ग वैश्विक परिदृश्य में हिंदी को फैलोशिप स्कालर्स के रूप में अनुवादक, अध्ययन और अध्यापन को चयन किये और सफलतापूर्व देश के साथ साथ विदेशों में हिंदी को प्रचारित प्रसारित कर रहे हैं। इसी की तरह विदेशों से भी बहुत से युवा अन्य देशों से हिंदी को पढ़ने सीखने बोलने और हिंदी के क्षेत्र में कार्य करने के लिए भारत आते हैं। इस बार के युवाओं की योग्यता, उनकी काबिलियत, काबिलियत का भाषाई संवर्धन में योगदान, और योगदान से वैश्विक स्तर पर हिंदी की स्थिति को जानना तो हम सबका अधिकार है। इसी बहाने अगर और युवा इस कर्मक्षेत्र में आगे आकर झंडावरदारी करते हैं तो सही अर्थों में  युवाओं का दिवस हर दिवस होगा और हम हर दिवस हिंदी दिवस के रूप में मनाएगें।
अनिल अयान,सतना

९४७९४११४०७

न्यायपालिका में उपजती विभीषणगिरी बनाम राम राज्य की तलाश

न्यायपालिका में उपजती विभीषणगिरी बनाम राम राज्य की तलाश
न्यायपालिका में भी विभीषण निकल कर आयेंगें ये सोचा नहीं था कभी। इस विभीषणगिरी में रावण की भूमिका में कौन है यह तो समझ में आता है किंतु विभीषण के द्वारा बगावती सुर किस आराध्य प्रभु राम के तले हो रहा है यह तो समझ के परे है। धरने पर लोकतंत्र के मंदिरों में, शिक्षा के मंदिरों में प्रेस कांफ्रेंस करते अपराधी और प्रतिवादियों को खूब देखा है किंतु न्याय के मंदिर के बार पंचपरमेश्वरों को प्रेस कांफ्रेंस करते पहली बार देखा है। इस प्रकार के संवाद से मेरे मन में रह रहकर कई प्रश्न उपजते रहे,सोचता हूं वो प्रश्न आप सबसे भी साझा कर ही दूं क्या सर्वोच्च न्यायाल्य के माननीय न्यायाधीशों ने अपनी समस्या को माननीय राष्ट्रपति जी से साझा की, या एटार्नी जनरल, रजिस्टार सुप्रीमकोर्ट, को बताना उचित समझा, जजों के यहां सरकार और विपक्ष के नेता किस विषय पर चर्चा करने गए, जजों ने परिस्थिति जन्य त्यागपत्र देने का रास्ता क्यों नहीं चुना, इनके द्वारा की गई प्रेस कांफ्रेंस किसकी अनुमति से हुई, इससे न्यायपालिका के प्रति जनसाधारण और नागरिकों के बीच किस तरह की वैचारिक टूटन आयेगी, क्या न्यायपालिका के विभागीय मसले अब खुले आसमां में मीडिया के द्वारा सुलझाए जाएगें, क्या न्यायाधीशों के ऊपर बैठे अधिकारी अब विश्वासयोग्य और न्याय संगत नहीं रहे, क्या वो अब विधायिका और कार्यपालिका के एजेंट बन चुके हैं,आदि बहुत से प्रश्न अपने उत्तर की तलाश करते रहे। अब सवाल यह है कि ऐसी स्थिति निर्मित हुई क्यों, इस विभीषणगिरी की रीड़ कहां से प्रारंभ होती है।
जस्टिस दीपक मिश्र पहले भी कई आदेशों को लेकर मीडिया और न्यायपालिका में लाइमलाइट में रहे जैसे निर्भया कांड के दोषियों की सजा को बरकरार रहना, चाइल्ड पोर्नोंग्राफी वेबसाइट को भारत में वैन करना, सबरी माला मंदिर में महिलाओं के लिए खोलना, सिनेमाहाल में राष्ट्रगान अनिवार्य करना, एफ आई आ की काफी को वेवसाइट में चौबीस घंटे में अपलोड़ करना, अपराधिक मानहानि की संवैधानिक मानता, मेमन की फांसी को बरकरार रखना, आरक्षण को मायावती के शासन काल में रोक लगाना, आदि इतना ही नहीं जस्टिस मार्कंडेय काटजू, टीएस ठाकुर, करन्न, प्रतिभारानी जैसे जस्टिस भी अपने कार्यकाल में विवादों में रहे। इस बार की विभीषण गिरी का प्रारंभ जज ब्रजगोपाल लोया की संदिग्ध हालत में मौत के मामले की जांच को लेकर हुआ, किंतु इसके अलावा भी कालेजियम सिस्टम में पारदर्शिता, चीफ जस्टिस और अन्य जस्टिसों के बीच विभागीय मतभेद,  मामलों को अन्य जस्टिसों के बेंच में स्थानांतरित करना, और सबसे महत्वपूर्ण बात न्यायपालिका और सरकार दोनों ही इस बात के लिए वैचारिक युद्धरत हैं कि जजों की नियुक्ति उनके पास ही रहे। सरकार, और सुप्रीमकोर्ट दोनों ही इस मामले में खुद को ड्राइविंग सीट में रखना चाहते हैं। इस विषयों में कोर्ट और संविधान दोनों की नियमावलियां चुप्पी साधे हुई हैं। ये दोनो संवैधानिक समूह अभी तक तय नहीं कर पा रहे कि आखिर कैसे लोगों को जज बनाया जाए, उनकी योग्यता और अनुभव के मापदंड क्या होगें, मेमोरेंडम आफ प्रोसीजर्स की कमी के चलते यह मामला अदालत से खुले आसमां में आकर दिखने लगा।
वास्तविकता में देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट में ही चीफ जस्टिस के अलावा एकतिस पदों में छ पद खाली है और पांच जज इस मार्च तक सेवानिवृत हो जाएगें। जब यह हाल सुप्रीम कोर्ट का है तो अन्य राज्यों की न्यायपालिका की तो इससे ज्यादा दुर्गति है। सुप्रीम कोर्ट में आठ राज्यों के जस्टिसों का कोई प्रतिनिधित्व भी नहीं हो पाया, नियुक्ति मेमोरेंडम आफ प्रोसीजर्स के फाइनल ना होने की वजह से नई नियुक्तियां ठंडे बस्ते में सो रही है और तीन करोड़ मामले उसके वादी प्रतिवादी न्यायपालिका के मंद्रिर में  प्रसाद पाने के लिए मुंहबाए खडे हुए हैं। चयन की बात करें तो जजों का चयन एक समान प्रक्रिया से होता है वह है वरिष्ठता और योग्यता के आधार पर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों, हाईकोर्ट जजों और वकीलों को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया जाता है। इसके लिए अखिलभारतीय वरिष्ठता, और उम्र को प्रमुख माना गया है। साथ ही साथ महिला जजों का प्रतिनिधित्व भी ध्यान में रखकर नियुक्ति की जाती है। उधर हाई कोर्ट में जजों को अपने गृह हाई कोर्ट के अलावा नियुक्ति में लाने के लिए उसी कोर्त के वरिष्ठ जजों की मंजूरी आवश्यक है यही कालेजियम सिस्टम है। केस के वितरण के लिए सुप्रीम कोर्ट की बारह बेंच में चीफ जस्टिस से पहली बेंच प्रारंभ होकर वरीयताक्रम के आधार पर बारहवीं बेंच तक केस वितरित किये जाते हैं। राज्यों और संवेदनशील मुद्दों की सुनवाई चीफ जस्टिस की बेंच को सौंपी जाती है। पिछले पांच सालों मेंअधिक्तर मामले इसी बेंच के द्वारा सुलझाए गए। अन्य बेंच तक मामले क्यों नहीं गए यह प्रश्न चिंन्ह खडा करता है।
अक्टूबर में जब दीपक मिश्रा चीफ जस्टिस की सेवा निवृति है इसके पहले इस तरह के आरोप प्रत्यारोप की सिटकिनी लगाकर मीडिया में कूदने वाले विभीषणगीर जस्टिसेस ने उनकी छवि को दागदार बता दिया है। इसके अलावा जस्टिस दीपक मिश्र के द्वारा लिया गया केंद्रीय विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलर्स के भ्रष्ट्राचार के मामले को सुलझाने के लिए पहले जस्टिस गोयल और जस्टिस ललित की बेंच से अपने बेंच में ले जाया गया और निर्णय सुनाने की बजाय जस्टिस अरुण मिश्र को यह केस ट्रांसफर कर दिया और वहां से इन भ्रष्टाचार आरोपी वाइस चांसलरों के खिलाफ केस खारिच कर दिया गया। इस तरह की अंदरूरी खींचातानी,शिक्षा के मंदिरों के पीछे चल रहे दोगलेपन को छिपाने की कोशिश, जस्टिसों का भी पक्ष और विपक्ष राजनैतिक पार्टियों की विचारधारा के समर्थन से यह स्तिथि पैदा हुई है। जस्टिसेस का विचारधारा के प्रति झुकाव, विचारधारात्मक पार्टियों से संबंधित केसेस के प्रति छद्म पारदर्शिता का दिखावा, और फिर मेमोरेंडम आफ प्रोसीजर्स को लागू करने में सहयोग करने की बजाय , अपने सुप्रीम न्याय, कार्य और विधायिका के केद्र व्यक्ति की जानकारी के बिना इस तरह मीडिया से सीधे रूबरू होना मुझे तो असंवैधानिक और अप्रत्याशित लगा। न्यायपालिका की नियुक्तियों के लिए न्यायपालिका को पूरे डेकोरम सहित बातचीत करके मामले के परिणामों को सबसे सामने रखने की उम्मीद हम सबको है। यह भी सच है गाहे बगाहे विधायिका का अप्रत्याशित दखल न्यायपालिका में देखा जाता रहाहै किंतु संवैधानिक परिवर्तनों के माध्यम से ऐसे कानून बनाना होगा जिससे तीनों पालिकाओं के बीच में समान्जस्य भी बना रहे और एक दूसरे के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा भी हो।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

बसंत के बहाने निराला की याद

बसंत के बहाने निराला की याद
जब फूलों  पर बहार आजाये, गेहूं की  बालियां नृत्य कर्ने लगे, आमों के पेडों में बौर करलव करने लगे, तितलियां फूलों पर मोहित होले लगे तब मानिये कि बसंत आ गया है। माघ का महीना आये और पंचमी के दिन उसका अर्ध्य पूर्ण हो तो मानिये बसंत है। ऋषियों की पंचमी का उद्धरण बसंत में ही उल्लेख होता है। सूर्य से लेकर धरा तक, मनुष्य से लेकर पशु पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। मां सरस्वती का जन्मदिवस के रूप में भी यह दिवस मुख्य रूप से मनाया जाता है। हर कला का साधक इस दिन को अपने आराध्य का दिन मानता है। इसी दिन पृथ्वीराज चौहान की आंखें मोहम्मद गौरी ने फोड़ा था।यह घटना ग्यारह सौ बानवे ईश्वी ही है। और इसी दिन ही अमर विभूति सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म दिन भी आता है। इस दिन जहां एक ओर मदनोत्सव  मनाया जाता है भगवान श्री कृष्ण और काम देव की पूजा होती है। कामशास्त्र में सुवसंतक नाम के उत्सव की चर्चा इसी समय के लिये किया है। अर्थात इसी दिन बसंत पृथ्वी पर अवतरित हुआ था। सरस्वतीकंठाभरण में यह लिखा है कि यह बसंतवार का दिन है। इसी दिन काम देव के पंचशर -शब्द, स्पर्श,रूप, रस, और गंध को आमंत्रित किया जाता है। चैंत्र कॄष्ण पंचमी को बसंतोस्तव का अंतिम दिन रंग पंचमी के रूप में मनाया जाता है।
मां सरस्वती सृजन की अधिष्ठात्री देवी है। पुराणों में लिखा है कि बसंत को ऋतु राज कहा गया। देवो के अलावा साहित्य महामानव,छंदशास्त्री, महाप्राण कवि निराला के जनमदिन को हम सब बसंत पंचमी के दिन ही तो मनाते हैं।डा रामविलास शर्मा ने लिखा कि जब निराला को पता चला दुरालेलाल भार्गव बसंत पंचमी को अपना जन्मदिन मनाते हैं तो उन्होने निश्चय किया कि वो भी अपनी आराध्या के उत्सव के दिन अपना जन्म दिवस मनायेगें। बसंत उनके गीतों छंदों में झूमता है। अवतरित होकर बसंत अपना वरद हस्त उनकी रचनाओं में रखने में सफल होता है। वो लिखते हैं कि - फूटे रंग बासंती गुलाबी/ लाल पलास, लिए सुख,स्वाबी/  नील स्वेतशतदल. सर के जल/ चमके है केशर पंचानन में।" रक्त संचार में भी बसंत का आवेश समाजाता है। कबीर हो नानक हों सूर हो मीरा हो किसी ना किसी रूप में बसंत का वर्णन अपने शब्दों में करके मां सरस्वती का आराधन किया है। वो बसंत ही था जब निराला की कविता तुलसी दासमें रत्नावली को शारदा सरस्वती के रूप में पल्लवित किया। निराला की मां वाणी वंदना में देवी सरस्वती से भारत की स्वतंत्रता को साकार और संस्कार युक्त बनाने का वर मांगते हैं। वो मुक्ति की इच्छा के साथ प्रार्थना कुछ ऐसे करते हैं- नव गति, नव लय, ताल, छंद नव,/ नवल कंठ, न्व जलद मंद्र रव/ नव नभ के नव विहग वॄंद को। नव पर नव स्वर दे।" "भारति, जय,विजय करे,कनक शस्य कमल धरे"।
बसंत ने जो अमर संगीत प्रकृति के माध्यम से दिया है। वो कला और सौंदर्य को और पुष्पित किया है। निराला बसंत दूत के रूप में दैदीप्तमान रहे।निराला ने जीवन भर आभाव रस पिया किंतु भाव उनके अभावों के बीच पोषित होता रहा। रविवार को जन्म होने के साथ उनका नाम सूर्यकांत रखा गया था। उनके अंदर प्रकाश पुंज, उष्मा,और तेज विद्यमान था। उनकी जीवन शैली हमेशा अभिषापों को झेलने वाली ही रही। वो अक्खड, स्वाभिमानी, परदुख कातर बन कर जीवन भर रहे। निराला एक शैली, एक छंद, एक काव्य का नाम बन गया। निराला ने जीवन को सशक्त त्रिभुज के रूप में जिया। निराला ने राम के असहाय और शक्ति के आराधन के छण को पकड़ा और राम की शक्तिपूजा की रचना की।छायावाद के के चारो स्तंभों में निराला ने ही कविता के सबसे ज्यादा और स्तरीय पाठक पैदा किये। वो भक्ति से शक्ति की बात करते हैं। वो धर्म से आध्यात्म और आध्यात्म से एकात्म की बात करतेहैं। निराला के विवाद और विवाद के बीच से निकलते निराला अपने आप को सूर्य की भांति कांतिमय बनाये रखने में सफल रहे।

अनिल अयान,सतना

उनके लिए रिबेट, हमारे लिए डिबेट

उनके लिए रिबेट, हमारे लिए डिबेट
बजट आया, किसी ने विकास कहा, किसी ने आश कहा, किसी ने विनाश कहा, किसी ने पकोड़ा कहा, किसी ने रोड़ा कहा, किसी ने कहा गरीबों के लिए सब्सिडी है, किसी ने कहा अमीरो के लिए टैक्स में रिबेट है, किसी ने कहा पेट्रोल मोदी की उम्र से आडवानी की  उम्र तक पहुंच गया, किसी ने कहा कि सेस की ऐश हो गई, किसी ने कहा, यह उद्योगपतियों का बजट रहा, किसी ने कहा कि टैक्स के ऊपर टैक्स लगाने की परंपरा की शुरुआत हो गई। मध्यम वर्ग के लिए क्या आया सिर्फ डिबेट, नौकरी पेशे वालों के हाथों में क्या आया, चातक के लिए स्वाति की बूंदे, सरकार के लिए तो जनता अब प्रयोग की सामग्री बन गई है। टीवी चैनलों में मध्यम वर्ग को बजट ने क्या दिया यह चर्चा का विषय बना कर बहसें जारी रखी गई। बहसों से परिणाम उसी तरह निकला जैसे योजनाओं का परिणाम निकलता है।
योजनाएं सुनने में कितनी अच्छी लगती हैं, परन्तु जमीनी स्तर पर काम करने के लिए कर्मचारियों के छक्के छूट जाते हैं। पिछले दो सालों में प्रधान मंत्री जी की दो योजनाएं सभी लोगों के लिए जारी की गई। सभी के खातों से इसका प्रीमियम अप्रैल के महीने में काट लिया गया। अब इस बार आ गया अभ्युदय योजना, और मोदी केयर योजना का प्रचार प्रसार करना, बजट कुछ खास ना हो तो उसके ऊपर योजनाओं की नक्कासी कर दी जाती है। घोषणाएं तो ऐसे की जाती है जैसे साल भर में देश की अर्थव्यवस्था लाइन में आजाएगी। मध्य प्रदेश में तो सेस की मार उत्पादों की नाक में नकेल डाल दी है। आयुष्मान के नाम पर गरीबों के भले करने की बात कहा तक अपनी हकीकत की जमीन पर उतर सकती है यह देखना और भोगना है। यह जुमला सन चौदह के चुनावी घोषणा पत्र में था और चार साल लग गए। ओबामाकेयर की नकल मार कर मोदी जी ने इस ब्रांड को मार्केट में उतार दिया। जनता से प्रीमियम लेकर इंस्योरेंश सेक्टर में लगा दिया जाएगा। ढाई करोड़ लोगों के स्वास्थय की चिंता अब सरकार करेगी।
ओबामा ने स्वास्थ्य के साथ खाने और नाश्ते तक की स्कीम को इस केयर में जोड़ाथा, उसके लिए विभिन्न योजनाएं बनाई गई थी। परन्तु मोदी केयर में ऐसा कुछ भी नहीं बताया गया। सरकारी अस्पतालों की स्थिति और डाक्टर्स की स्थिति यह है कि हर डाक्टर्स का खुद का मल्टी स्पेशियलिटी हास्पीटल, और नर्सिंग होम्स हैं। वो हमारी केयर करेंगें कि  हमारे प्रीमियम से खुद के परिवार का वेल्फेयर करेंगेम। ओबामा केयर के तहत इंश्योरेंश कंपनियां व्यक्ति की बीमारी के लिए मुआवजा के लिए मना नहीं कर सकती थी। मोदी केयर में तो निजी अस्पताल, और इंश्योरेंश कंपनियों की चांदी है। डेढ लाख केंद्रों को खोलने का लक्ष्य है। पर लक्ष्य को पाने के लिए रास्ता और फंड कहां से जुगाड़ा जाएगा वह निश्चित नहीं है। इस योजना में बीमा कंपनियों की वल्ले बल्ले है। डाक्टर, हास्पीटल, और बीमा कंपनियों से जुडे हर व्यक्ति के जेब गरम रहेगी। इसको गर्म करने के लिए मध्यम वर्ग की जेब को लूटा जाएगा। गरीब को लाइफ इंश्योरेंश में कोई रुचि नहीं होती। अमीरों का काला धन इन योजनाओं की शान होती है। और बचा मध्यम वर्ग जो अपनी मौत और अस्वस्थ होने के डर और परिवार के भविष्य की चिंता के चलते इन मामलों मेंभी हाथ पैर मारेगा। बजट के प्रकोप को कम करने के लिए यह योजना मलहम का काम करेगी। दूर से देखने में तो यह योजना गरीबों को पांच लाख रुपये का इलाज।  अन्य वर्गों को आठ से दस लाख तक का इलाज मुफ्त में कराएगा। परन्तु पिछली हकीकत तो भयावह लगती है।
प्रायोगिक रूप से देखें तो समझ में आएगा कि छ सात महीने इसको लागू करने में लगेगा, फिर  कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने में लगेगा,  उसके बाद,  परिवारों को जोड़ना, उनका डाटा और रिकार्ड को मेंटेन करना, फिर उसके बाद हास्पीटल्स को इंश्योरेंश कंपनियों को जोडना एक लंबे अवधि का काम है। स्वास्थ्य मंत्री जी का यह कहना कि लोग हेल्थ इंश्योरेंस की बातों को जानते हैं हमारे पास इससे  भी बेहतर हेल्थ माडल्स मौजूद है। जिसमें वेलनेस सेंटर खोल कर इन योजनाओं को घर घर तक पहुंचाने की योजना है। इस प्रकार की लोकलुभावनी योजना का कुछ फायदा वाकयै जनता को होना है या इस प्रकार की योजना सरकार अपने चुनावी फायदे, फंड और अपने कामों की नाकामियों को छुपाने के लिए जारी की है यह तो आने वाला वक्त बताएगा। इस योजना की तरह, पहले भी खाद सुरक्षा गारंटी योजना, मनरेगा, अटल पेंशन योजना, और भी अन्य ढेरों योजनाएं सरकार के द्वारा लागू की गई परन्तु गारंटी केयर की कम और वेल्फेयर की ज्यादा समझ में आई। इन योजनाओं में तो प्रीमियम बैंक सेक्टर तुरंत काट लेते हैं फंड कम होने पर भी माइनस बैलेंश दिखाकर काट लिया जाता है। और जब रिफंड का नंबर आता है तो कागजात की इतनी मांग की जाती है कि प्रीमियम देने वाला मध्यम वर्गीय मुखिया माथा पकड़ कर घुटने टेक लेता है। वित्त मंत्री जी जितनी मासूमियत से कैमरे के सामने घोषणा करते हैं और जनता के फायदे का वचन देते हैं। भुगतान के समय पर इन योजनाओं की नियम व शर्तें अपना रूप और रंग दोनों बदल लेते हैं। प्रारंभ में कुछ और भुगतान के समय पर कुछ और नजर आते हैं।
इस योजना में भी दस से पंद्रह हजार करोड़ खर्च करने का अनुमान सरकार ने बताया,  दो हजार उन्नीस में लोक सभा चुनाव है, स्वास्थ्य इफ्रास्ट्रक्चर उतना सुदृण नहीं है, सरकारी अस्पताल की तुलना प्राइवेट संस्थानों से की नहीं जा सकती, डाक्टर्स काम के प्रेशर की वजह से आत्महत्याएं कर रहे हैं। कुल मिलाकर सरकार अपने दिन अच्छे करने के चक्कर में आने वाले चुनावों का वोट बैंक तैयार कर रही है। और इस तैयारी का खर्च जनता से प्रीमियम जनता की बचत और सैलेरी खातों, सेस जैसे उपकरों के उठा रही है, आखिरकार कब तक सरकारी योजनाओं की नाव में बैठकर सरकार जनता से प्रीमियम, टैक्स, टैक्स पर भी उपकर, लेकर नौकरी पेशे वाले नागरिकों को लूटती रहेगी। हम सब यह जानते हैं कि उन लाभान्वित होने वाले पचार करोड नागरिकों में बेचारे मध्यम वर्ग के लोग नहीं आएगें, उनमें जुगाडू, पहुंच वाले, पहचान वाले, बीमा कंपनियों के कर्मचारियों के रिश्तेदार, डाक्टरों और हास्पीटल में काम करने वाले लोग और उनके रिश्तेदार , और तो और सरकारी अमलों के आस पास के महानुभाव ही लाभान्वित होंगे। मध्यम वर्ग के पास मात्र दिन भर की नौकरी, महीने की दस तारीख को तनख्वाह, डर की वजह से पालिशियों की प्रीमियम, और रात में सोने से पहले  टीवी चैनलों में चल रहे राजनैतिक ड्रामे और नौटंकी की बहस ही आएगा। बल्ले बल्ले तो उन लोगों की हैं जिन्हें कभी रिबेट दिया जाता है, जिनके बैंक लोन मेंछूट दी जाती है, जिनके पास अकूट धन और सत्ता का सुख है।
अनिल अयान
९४७९४११४०७

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

आओ बच्चों तुम्हे दिखाए झांकी पटाखिस्तान की

आओ बच्चों तुम्हे दिखाए झांकी पटाखिस्तान की
इस बार की दीवाली भी नये रंग ले कर आ रही है। नवंबर दो हजार सोलह के आदेश जिसके तहत दिल्ली एनसीआर में पटाखों की बिक्री और भंडारण पर रोक लगाने पर आगे इस वर्ष भी जारी रखा। पटाखो के विक्रय पर रोक, पटाखों के फोड कर उत्साह जाहिर करने पर रोक, प्रदूषण के हवाले को ध्यान में रखकर इस रोक बरकरार रखा गया है। कभी कभी इन रोकों को अन्य माध्यमों से देखने का प्रयास नहीं किया जाता। न जाने कितने सवालात अंतर्मन में उठ जाते हैं। कभी दही हांडी को लेकर आदेश आ जाता है। कभी दुर्गाप्रतिमाओं और गणपति विसर्जन पर आदेश जारी कर दिये जाते हैं। कभी विदेशी पटाखों पर रोक कभी विदेशी सामानों पर रोक लगा दी जाती है। ऐसा महसूस होता है। किसी दिन प्रदूषण का हवाला देकर विभिन्न अवसरों पर आयोजित होने वाली यज्ञ और हवन पर भी रोक लगा दी जाएगी। दियों और मोमबत्तियों को जलाने में भी रोक लगा दी जाएगी। छमा सहित महसूस होता है कि किसी दिन न्यायालय द्वारा अंतिम संस्कार में जलने वाली लकडी की चिताओं को जलाने में रोक लगा दी जाएगी। क्या कभी जीव जंतुओं की बलि प्रथा पर न्यायालय रोक नहीं लगाने की सोचता। बच्चों का उत्साह जिस तरह पटाखों फुलझडियों के लिए चरम पर होता है उसको रोकना कितना सही है यह समझ के परे हैं। इतना ही नहीं व्यवसाइयों के व्यवसाय पर भी यही आलम देखने को मिल रहा है। अबतक कुल पटाखे का कारोबार लगभग सातहजार करोड रुपये का है। इसमें दीवाली पर लगभग पांच हजार करोड का कारोबार होता है, इसमें चीनी पटाखों का कारोबार दो हजार पंद्रह सोलह में नौ सौ करोड, दो हजार सोलह में पंद्रह सौ करोड और आगामी दो हजार सत्रह में पच्चीस सौ करोड का कारोबार करने की आशा रही है। इस रोक की वजह से तीस प्रतिशत लगभग नुकसान होने के आसार नजर आ रहे हैं। यह बात समझ के परे है कि दीवाली के अलावा भी हम विभिन्न अवसरों, उत्सवों में राजनैतिक, पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक अवसरों पर फुलझडियों,बंबों, पटाखों का प्रयोग किया जाता है। इसके चलते कितना प्रदूषण होता है इसका मूल्यांकन करके इन अवसरों पर रोक क्यों नहीं लगाया जाता है। यदि प्रतिबंध इतना महत्वपूर्ण है तो हर जगह प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जाता है।
हमारी सरकार बार बार यह अपील करती है कि विदेशी पटाखों और सजावटी लाइटों का उपयोग ना करें। देशी उत्पादों का प्रयोग करके देश के विकास में योगदान दें। अब यह जानने का विषय है कि हमारे देश में देशी पटाखों की स्थिति क्या है। विक्रय मूल्य कितना है। क्या आम जन उसे खरीद सकते हैं। हम दीवाली की बात करते हैं ऐसा कोई त्योहार नहीं है जिसमें हमारे देश में चीनी और जापान का सामान आयातित किया जाता है। हमारा बाजार चीन के सामानों के दम पर फायदे का गुमान भरता है। क्योंकि चीनी उत्पादोंमें तीस से पचास और सत्तर प्रतिशत तक का फायदा मिलता है और तो और गारंटी का कोई टेशन नहीं होता है। हम क्या बडे बडे मीडिया से जुडे हुए एमएलए और एमपी तक , अभिनेता और अभिनेत्रियां, बडे बडे बिजनेशमैन, और खिलाडी विदेशी माल और उत्पाद का प्रचार प्रसार करने के लिए ब्रांड एम्बेस्डर बनते हैं। उनको इतना फायदा होता है, साइनिंग एमाउंट मिलता है इसका कोई जवाब नहीं है। पटाखों की बात की जाए तो विदेशी पटाखों के परे देशी पटाखों के इस्तेमाल पर क्या प्रदूषण नहीं होगा। भले ही हिंदूवादी संगढनों ने इसे वामपंथ और दक्षिण पंथ के बीच का मुद्दा बनाकर संप्रदायिक बहस का रास्ता खोलने का प्रयास किया है। किंतु सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर कोई भी धार्मिक विवेचना करने से मना कर दिया। नई दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने दो साल पहले आड और इवेन नंबरों की कारों को अल्टरनेट दिन में चलने का नियम भी लागू कर पर्यावरण को बचाने का प्रयास करने का स्वांग रचा था परन्तु उसको दोबारा इस्तेमाल नहीं लाया गया। इस फार्मूले को आगामी रूप से जमींजोद कर दिया गया। पटाखों की एम आर पी भी इस बार जीएसटी के चलते दस से पंद्रह प्रतिशत तक इजाफा किया गया है। इसके चलते मुनाफे के साथ टैक्स की बढोत्तरी के आसार पर भी सरकार के मुख पर ताला लगाहुआ है। इसके अलावा दूसरा तर्क देंखें तो क्या प्रदूषण का स्तर डीजल गाडियों के चलने में विशेषकर एक हजार सीसी से अधिक छमता वाले वाहनों के प्रयोग से बढता नहीं है। इसका भी जवाब प्रदूषण बोर्ड के पास नहींहै।
मुझे तो महसूस होता है कि हम ज्यादा तटस्थ नहीं हैं। हमारा कानून तटस्थ नहीं है। एक राज्य के लिए अलग कानून है अन्य राज्यों के लिए अलग कानून है। महानगरों के लिए कानून को सख्त कर दिया जाता है और अन्य नगरों के लिए व्यवसाइयों के साथ तालमेल बिठाकर हम नियम कायदों मेंढील दे देते हैं।  प्रदूषण बोर्ड के अनुसार दिल्ली को छ सात दिन प्रदूषण को कम करने के बाद  हवा को सांस लेने लायक बनाने की कवायद यह है। अब यह बताइये कि इस कवायद में अन्य राज्यों को क्यों नहीं शामिल किया गया है। दिल्ली में भाजपा विरोधी पार्टी का शासन है तो यह कवायद दौड में बदल दी गई। अन्य राज्यों में इस पार्टी की कृपा दृष्टि के चलते कवायद को पैदल दौड मेंबदल दिया गया। इतना ही नहीं देशी विदेशी पटाखों पर बहुत बहस की जातीहै देशी पटाखों से आवाज और धुंआ कई गुना ज्यादा निकलता है। देशी दियों को बनाने वाले भट्टे आज भी पारंपरिक तरीकों से इस्तेमाल किए जाते है। क्या इसमें प्रदूषण नहीं फैलता है। क्या इनका व्यवसायिकीकरण क्यों नहीं किया गया। इनको नई तकनीकियों का प्रशिक्षण क्यों नहीं दिया गया। ताकि ये कम लागत में अच्छे उत्पाद तैयार कर सके। हम सब देशी उत्पाद तो उपयोग करे किंतु क्या ये उत्पाद सुलभ सहज और आसानी से हर वर्ग के लिए उपलब्ध हैं। इनका जवाब किसी के पास नहीं है। मेक इन इंडिया में इस समस्या का समाधान क्यों नहीं खोजा गया है। हमारे विद्युत उत्पादों के पास इस तरह के उत्पाद क्यों नहीं पैदा किए गये जिसमें कि हम सस्ते दर से कम बिजली खर्च वाली सजावटी लाइटों का प्रयोग कर सके। पटाखा कंपनियों से पूंछिये कि क्यों उनका व्यवसाय चीनी पटाखे और बंबों के आयात होने पर प्रभावित हुआ है? इसका समाधान हमारी सरकार और न्याय व्यवस्था के पास नही है। हम देश में बार बार देशी समान उपयोग करने का राग अलापते हैं किंतु विदेशी आयात पर सरकार खुद रोक नहीं लगाती है। देशी उद्योंगों को विश्वस्तर की तकनीकि प्रशिक्षण  प्रदान नहीं करती है और दोगली दोमुही बात करके सबको खुश करने की कोशिश में लिप्त होती है। प्रदूषण को कम करना है तो पटाखों फुलझडियों और बंबों में भी वर्गीकरण करके निम्नतम प्रदूषण करने वाले उत्पाद को त्योहार की खुशी के लिए प्रतिबंध से मुक्त किया जा सकता है। ध्वनिप्रदूषण, जल प्रदूषण, और वायु प्रदूषण के मानकों की सीमा के चलते हमे दूसरे रास्तों पर भी विचार करना चाहिए। यदि नियम कायदों का आदेश हो तो हर राज्य में एक समानपालन होना चाहिए चाहे वो किसी भी राजनैतिक पार्टी से ताल्लुकात रखे। विशेषकर मुद्दा जब धार्मिक, सामाजिक, और पर्यावरण पर जाकर केंद्रित हो जाए। हर वस्तु को बंद करना किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। यही नैतिक आधार होना चाहिए।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

नोटों-वोटों की दीवाली में छिपा राजनैतिक डर

नोटों-वोटों की दीवाली में छिपा राजनैतिक डर
सन दो हजार चौदह के चुनाव में मोदी सरकार का चुनावी मुद्दा अगर काला धन था तो दूसरा मुद्दा जीएसटी था, इसके साथ दुश्मनों को धूलचटाने की बात तो हम सबको भूली ना होगी। इसके साथ एक देश एक टैक्स का नारा देकर जिस तरह जीएसटी की शुरुआत हुई वो काबिले तारीफ थी। इस काबिले तारीफ काम को भाजपा ने मूल मंत्र मान कर देश में खूब प्रचार प्रसार किया। दिवाली के पहले तोहफा दे कर माननीय ने गुजरात की चांदी कर दी। और अन्य राज्यों को यह सोचने में मजबूर कर दिया कि जरूर यह दिवाली नहीं गुजरात के चुनाव का प्री गिफ्ट हैं। खाखरा और गुजराती पांपड जैसे उत्पाद में तो जिस तरह से जीएसटी में कटौती किया गया है वह वाकायै जबरजस्त निर्णय था। एक तरफ राहुल गांधी ने नवसर्जन यात्रा में जामनगर और गुजरात को फोकस करके व्यापारियों का कंधा थामा है वह भी भाजपा के लिये चिंता का विषय बना हुआ है। इसका परिणाम भी कहीं ना कहीं यह प्री गिफ्ट है। अरुण शौरी , यशवंत सिन्हा, और शत्रुधन सिन्हा जैसे मुखर नेताओं ने इन ढाई कदम वाले व्यक्तियों को केंद्र में रखकर कठघरे में खडा करने का कोई मौका हाथ से नहीं छोडे।
भाजपा की मजबूरी है कि  इन तीनों महारथियों को निंदक के रूप रखे हुए हैं।  सरकार को नोट बंदी में मनी लांडरिंग  स्कीम बताया इन न्होने। अरुण शोरी ने  जीएसटी मामले में कांग्रेसियों जैसी राय रखी। अरुण जेटली ने तो उन्हें यहां तक कह दिया कि पी चितंबरम के पीछे पीछे नहीं चलना चाहिये। यशवंत और शत्रुघन सिन्हा ने तो सरकार को हर कदम में आइना दिखाया है। अपने ही घर में सरकार से बगावत के लक्षण इनमें दिखने लगे हैं। यह बात अलग है कि इनकी बातें भी अधिक्तर काम की हो जाती है।  शिवसेना ने तो इस मुद्दे में कूद कर यहां तक बयान बाजी कर दी कि यह अब व्यापारियों का भाजपा के अंदर डर का परिणाम है। पेट्रोल की कीमतों में बढोत्तरी और जीएसटी दरों में बढोत्तरी भी गुस्से का प्रमुख वजह मानी गई। जीएसटी की मूल समस्या साफ्टवेयर भी है। इन्फोसिस को इसका प्रयोग कर पुष्टि करने से पहले ही सरकार ने रातो रात एक कर लागू तो कर दिया अब यथार्थ को भोग रही है। नोट बंदी के समय पर  दो लाख तक का सोना खरीदने के लिये पहले पैन की अनिवार्यता और अब उसके नियम में बदलाव करके जरूरत को खत्म करना कहां की बुद्धिमत्ता है यह समझ के परे है। उस समय  नोटबंदी के प्रभाव से काले धन को सोने में बदलने के लिये यह कदम उठाया गया था। क्या अब वह काला धन इस निर्णय को वापिस लेने से रुक जाएगा। अब तो ऐसा लग रहा है कि काले धन को पीला करने का रास्ता खोल दिया गया है। छ अक्टूबर के पहले वित्त मंत्री यह कह  रहे थे कि जीएसटी की वर्तमान व्यवस्था में कुछ गलत है। दीवाली के एक सप्ताह पहले ऐसा क्या हुआ कि इस इसमें खामी नजर आने लगी। इसका जवाब किसी के पास नहीं है। जिस ईबिल के लिए इतनी मसक्क्त करनी पडी उसको अभी फिलहाल टाल दिया गयाहै। ई वे बिल की व्यवस्था लागू करने के बाद ही जी एसटी का असली प्रभाव समझ में आएगा।
जनवरी में खत्म होने वाली गुजरात विधानसभा का असली तोहफा तो भाजपा को क्या मिलेगा यह तो आने वाला दो हजार अठारह साल बताएगा। नोटबंदी, जीएसटी, और मंहगाई वो जहरीले नाग हैं जो निगल चुके हैं मंहगाई लगातार बढ रही है। चुनाव के चलते  जिस तरह से भाजपा सकते में है वह जीएसटी के सूत्र को बदलाव करने के अलावा कोई रास्ता मुहैया नहीं कराता है। सूरत अहमदाबाद, जैसे औद्योगिक शहर के वोट बैंक भाजपा के लिये ज्यादा महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनके जैसे कई शहर विधानसभा में समीकरण बदल सकते हैं। छॊटे और मध्यम उद्योगों के प्रति भाजपा की नीतियां जिस तरह विरोधी होती जा रही है वो भी कहीं ना कहीं पर डर का प्रमुख कारण है। विधानसभा चुनाव के फायदे के लिए कई सत्ताइस प्रकार के उत्पादों में परिवर्तन किया गया है। दूसरी तरफ पेट्रोलियम  बिजली और रियल स्टेट पर जीएसटी का कोई रोडमैप सरकार के पास नहीं है।
खेतीकिसानी वाले उत्पादों पर जीएसटी को लागू करना कपडा उद्योग को लाभ ना देना भी सरकार की कमजोरी है जो विधान सभा चुनाव में मुख्य मुद्दा बनने वाला है। जब अरुण शौरी कहते हैं कि केंद्र में गुजरात के ढाई लोगों की सरकार है तो गुजरात से मोदी सरकार और मोदी शाह की प्रीति जग जाहिर हो जाती है। गुजरात के स्टेट  ब्रेकफास्ट में जीएसटी को अठारह से पांच प्रतिशत तक लाना भी इसी गुजरात एफिनिटी का उदाहरण है। एक तरफ पटाखों को जलाने से रोकना, पटाखों पर जीएसटी को अट्ठाइस प्रतिशत करना और दूसरी तरफ दीवाली के पहले ही  जीएसटी की दरों को कम करके दीवाली का उपहार देने का ढिंढोरा पीटना । जनता सब जानती है इन सब शतरंज की चालों को। सन एकसठ की फिल्म नजराना का गीत एक वो भी दीवाली थी और एक ये भी दीवाली है उजडा हुआ गुलशन है रोता हुआ माली है। कितना मौजूं है हम सब समझ सकते हैं।
गुजरात को केंद्र मान कर जिस तरह के मूल चूल परिवर्तन किये गए हैं जीएसटी में वह तो पूराने जुमलों के प्रभाव पर पानी फेरने वाले है। पहले जो भी वायदे किये गए वो चूल्हे में चले गए। एक बार फिल चुनावी बिगुल में आम जनता को छला गया और व्यापारियों को लाभ देकर वोट बैंक को बचाने और वोट बैंक में छिपे काले धन को सफेद करने का प्रयास किया जा रहा है। नोटबंदी के बाद जीएसटी का प्रभाव सरकार और भाजपा के लिए अपेंडिक्स बन गई है। ऊपर के गाने में माली के पास ना बगीचे में आने वाली तितलियों  के लिए खाना तक नहीं है। दीवाली के जशन में पटाखों की खुशी को ग्रहण तो लगाया जा सकता है किंतु चीनी सामानों को प्रचार प्रसार करने वाले आइकान के लिए कोई प्रतिबंध सरकार के पास नहीं है। ना ही कोई दूसरा विकल्प देशज रूप से हैं। चुनावी भाषणॊं के आईकान बन चुके हमारे प्रधानमंत्री जी विकास को इतना दौडाए कि अब वह बौरा गया है। चुनाव के लिए रातोरात किए गए एक टैक्स नीतियों को परिवर्तन कर दिया गया है। नुकसान जो व्यापारियों को हुआ वह भी अब तक अंधेरे में छिपा हुआ है। सरकार के पास इन सब के लिए कोई शब्द नहीं है। परन्तु इस बात को सुनकर मन गदगद हो जाता है कि सरकार अब कृषि प्रधान देश को व्यापारी प्रधान देश मानकर उनकी दीवाली मनाने के लिए चुनावी आतुरता जिस तरह से आम जनता के सामने दिखा दी है वह वाकायै यह शाबित करता है कि दीवाली में धन वैभव उलूक वाहन के जरिए ही आती है। चाहे वह उलूक नीति ही क्यों ना हो।
अनिल अयान ,सतना
९४७९४११४०७

बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

आदिकवि का स्मरण-छण

आदिकवि का स्मरण-छण
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वम्गमः शास्वतीः समाः।
 यत्क्रोंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितः।
संस्कृत का यह श्लोक हम सबने अपने पढा नहीं तो सुना होगा ही। आदि कवि के नाम से विख्यात महर्षि बाल्मीकि की जयंति हमने कल ही मनाई होगी। रामचरित मानस के परे भी जिस व्यक्ति ने राम के चरित्र का वर्णन किया वो व्यक्ति ही नहीं महर्षि  संस्कृत का प्रकांड विद्वान और आदिकवि बाल्मीकि ही थे। महर्षि कश्यप और अदिति के नौंवे पुत्र वरुण और चर्षणी के पुत्र बाल्मीकि भृगु ऋषि के भाई थे। इनका दूसरा नाम प्राचेतस भी है दीमक से ढक चुके शरीर की साधना के बाद तो इन्हें दीमदूह बाल्मीकि भी कहा जाने लगा। वो ही ऐसे महर्षि थे जिनका उल्लेख सतयु़ग, द्वापर और त्रेता युग में देखने को मिलता है राम के चरित्र के साथ उनका संबंध जितना गहरा है उतना ही गहरा उनका संबंध कृष्ण के साथ भी रहा। अगर वो राम के लिए ये कहते हैं कि
तुम त्रिकाल दर्शी मुनिनाथा,
विश्व बिद्र जिमि तुमरे हाथा।
तो कृष्ण के जीवन में महाभारतकाल में कुरुक्षेत्र के युद्ध कोजीतने के बाद जब द्रोपदी का यज्ञ सफल नहीं हो पाता तो  बाल्मीकि उसके निवेदन से आते है और अनुष्ठान पूर्ण होता है। इस घतना को कबीर ने लिखा कि
सुपच रूप धार सतगुरु जी आए।
 पांडवों के यज में शंख बजाए।
बाल्मीकि ने अंततः राम के चरित्र का वर्णन किया। राम के चरित्र कोआराध्य मान कर पूरी की पूरी रामायण उन्होने लिखी। इस रामायण में सूर्य चंद्र नक्षत्र की स्थितियों का वर्णन जिस तरह किया गया है वह तो खगोल विज्ञान के जानकार को ही करना चाहिए था। बाल्मीकि का लिखा यह श्लोक आदि कविता के रूप में प्रसिद्ध भी हुआ। हम उन्हें हिंदु दर्शन के अतिरिक्त भी देख सकते हैं। हमें यह पता होना चाहिए कि आज के समय में अगर तुलसी बाबा को सब लोग जानते हैं और बाल्मीकि को तुलनात्मक कम लोग जानतेहैं तो उसके पीछे यही कुनबे बाजी जिम्मेवार है। राम को केंद्रित करके दोनों ने अपने विचार लिखे किंतु रामचरित मानस घर घर की पूजा हो गई। बाल्मीकि रामायण के तथ्य ज्यादा परंपरागत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संबंधित है।
वनवास में राम का बाल्मीकि से निर्देशन लेना और सीता के परित्याग के बाद बाल्मीकि का सीता को प्रश्रय देना लवकुश का पालन पोषण ज्ञानी बनाना भी बाल्मीकि के तेज का ही प्रभाव था। वर्तमान में जिस तरह के आचार विचार चल रहे हैं उसक चलते कबीर, रहीम, तुलसी, बाल्मीकि, और अन्य ऋषि मुनियों को कुनबों में बांट दिया गया है। किसी कवि और कलमकार का एक ही धर्म हैं वह है मानव धर्म और मानवधर्म की सेवा करना। आजकल तो इन साधू संतो और ऋषि मुनियों की जयंतियां भी इनके समाज के लोग मनाते हैं जैसे कबीर के लिये कबीर पंथी, बाल्मीकि के लिए बाल्मीकि समुदाय के लोग इनको अपने कुनबे में उठाए घूमते फिरते रहते हैं। अब सोचने वाला विषय यह है कि इस प्रकार के आयोजनों में उसी समुदाय के लोगों के द्वारा उत्तराधिकार स्थापित करना और अन्य व्यक्तियों की प्रतिभागिता से परहेज करना न्यायसंगत नहीं है। कवि लेखकम, संत पीर फकीर, औलिया अगर इस गुटबाजी से परे रखकर आस्था से जुडे हों तो लाभप्रद होते हैं। अन्यथा संकीर्ण मानसिकता के काल कपाल क्रिया में विलुप्त होते चले जातेहैं। इतने बडे कवि का आयोजन उतना ही सीमित होता है। सीमित हुआ। एक पक्ष पर बात करके उसके रचनाकर्म को एक पक्षीय बना दिया जाता है। यह वैचारिक स्वतंत्रता का हनन हैं। हम अगर इस संस्कृति के वाहक है तो हमें यह अधिकार है हम आदिकवि और अन्य पुरातन से आद्यतन कलमकार के बारे में किसी नेपथ्य के पक्ष को भी उजागर करें। यही समयपरक सार्थकता होगी।

अनिल अयान ,सतना

शनिवार, 2 सितंबर 2017

शिक्षक खडा बाजार में सबकी मांगे खैर

शिक्षक खडा बाजार में सबकी मांगे खैर
पाँच सितंबर की तारीख यानि शिक्षक दिवस, डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को पूरा देश शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है। एक दिन के लिए शिक्षक को इस बात का भान कराया जाता है कि वह ही समाज का सबसे सम्माननीय व्यक्तित्व है। अन्य सारे व्यक्ति उसके सम्मान के अधीनस्थ हैं। पांच सितंबर के पहले और बाद में शिक्षक का पद, कद, और हद क्या है वह हम सब बखूबी जानते हैं। ऐसा महसूस होता है कि शिक्षक जैसा दरिद्र प्राणी इस समाज में कोई नहीं है। एक मजदूर को भी उससे ज्यादा श्रम का भुगतान प्राप्त होता है। शिक्षक से समाज से लेकर सरकार और प्रशासन तक आदर्शवादी व्यक्तित्व की उम्मीद करता है और यह माना जाता है कि शिक्षक जैसा आदर्श स्वर्गलोक से आया है। इस लोक में प्रकट हुआ है सब की अपेक्षाएं भी वह अपनी जादू की छडी से पूरी कर देगा। उसके पास जैसे अलादीन का चिराग है जिससे बच्चे के अभिभावकों की अपेक्षाओं में भी खरा उतरेगा। विद्यालय प्रबंधन की उम्मीदों का सितारा होगा। समाज की आशाओं का चितेरा होगा। अपने परिवार और सगे संबंधिओं के साथ रिश्तों में भी शिखर में होगा। आखिरकार शिक्षक को इतना महत्वपूर्ण पद दे कैसे दिया जाता है? लेकिन एक बात तो तय है कि सभी लोग शिक्षक से यही उम्मीद करते हैं कि वो किसी से कुछ उम्मीद ना रखे। यह गल्ती से भी शिक्षक ने इसके बारे में सोच लिया तो उसे समाज का दलिद्र और लालची मानव समझ लिया जाता है।
वर्तमान में शिक्षक का कद कई रूपों में हम सब देख सकते हैं। कभी वो शिक्षक होता है। कभी शिक्षाकर्मी बन जाता है। कभी संविदा अनियतकालिक शिक्षक बन जाता है। कभी गुरु जी बन जाता है। कभी अतिथि शिक्षक बन जाता है। समाज में स्वास्थ्य से लेकर जनगणना तक, समग्र आई डी से लेकर आधार कार्ड तक के आंकडों को इकट्ठा करने में शिक्षकों को निपुण माना जाता है। शिक्षक को और तो और इन कामों को पूरा न कर पाने पर सरकार इनकी वेतन वृद्धि रोक लेती है या मुख्यालय में अटैच कर देती है। शिक्षक को एक बार खराब परीक्षा परिणामों के लिए वेतन वृद्धि रोकने की सजा मिले तो समझ में आता है किंतु इन कामों के वेतन वृद्धि रोकना समझ के परे हैं। अरे भाई जब समय से वेतन जब सरकार नही तब तो उसकी ब्याज नहीं देती है। परन्तु वेतन वृद्धि रोकने के लिए हमारे आलाअफसर आगे- आगे लुतुर-लुतुर करने लगते हैं। आज के समय पर प्रायोगिक रूप से शासकीय विद्यालयों के शिक्षकों को सीएम आनलाइन का जवाब देने, छात्रवृत्ति से लेकर, समग्र आईडी के कलेक्शन, प्रतिभा पर्व मनाने, और शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन का प्रभार का भार ढोने से फुरसत नहीं मिलती है, बचे कुचे समय में से अधिक्तर समय वोटर लिस्ट में नाम हटाने और नये जोडने का काम करना पडता है और अंततः कक्षाओं में जाकर पढाने का समय मिलता है। इसके बाद फिर अपेक्षा की जाती है कि इनका परीक्षा परिणाम प्राइवेट विद्यालयों के परीक्षा परिणामों से बेहतर आए। यह भी एक अतिशयोक्ति से कमतर कुछ भी नहीं है।
शिक्षक दिवस में शिक्षकों के काम में समान वेतन समान काम की बात नहीं की जाती है। उनके विषय उन्नयन पर कोई काम नहीं किया जाता है। सम्मान समारोहों में सम्मानित शिक्षकों की उम्र देखकर और अनुभव देखकर सूचियाँ तैयार की जाती है। यदि एक लेक्चर एक विद्यालय में पढाता है तो उसे राजपत्रित अधिकारी का दर्जा प्राप्त है किंतु उसी विद्यालय में संविदा शिक्षक वर्ग एक के शिक्षक को राजपत्रित अधिकारी से कोसों दूर रखा जाता है। एक दूसरे उदाहरण में अगर हम प्राथमिक और पूर्वमाध्यमिक विद्यालयों में नजर डालें तो विद्यालय में बच्चों और शिक्षक-शिक्षिकाओं के अनुपात की कहानी कुछ और ही होती है। आओ मिल बांचे कार्यक्रम में जन प्रतिनिधि इन विद्यालयों में जाकर अपना ज्ञान बच्चों को प्रदान जरूर करते हैं। किंतु एक दिन में क्या होता है। इन विद्यालयों में अधिक्तर समय मध्यान भोजन की तैयारी करवाने, भोजन करवाने, और उसके बाद बचे कुचे फंड पर हाथ मारने के लिए रखा जाता है। इन विद्यालयों में कितने दिन किताबों को पलटा जाता होगा यह तो यहां का स्टाफ बखूबी जानता है। गुरु जी का कद पुराने जमाने में सबसे ज्यादा हुआ करता था किंतु वर्तमान में शिक्षा गांरटी शालाओं के लिए इनका उपयोग सरकार करती है। इनकों पूरी तरह से निम्न श्रेणी शिक्षकों की कैटेगरी में रखा जाता है। यह समझ के परे है कि शिक्षा की गारंटी कैसे ली जा सकतीहै। साक्षरता को प्रचारित करना समझ में आता है किंतु शिक्षा की गारंटी लेने वाली शालाओं का विषय गत गहराई हम सब खुद समझ सकते हैं।
प्राइवेट विद्यालयों का यह है कि शासन किसी भी जगह पर किसी भी नगर पर कितने भी विद्यालयों को मान्यता दे देता है। विद्यालय के पास उचित जरूरी संसाधन हैं या नहीं, विषय के शिक्षक प्रशिक्षित हैं कि नहीं है। इससे ज्यादा कोई फर्क नहीं पडता है। एक कालोनी में कुकुरमुत्ते की तरह विद्यालय मिल जाते हैं। बिना किसी गुणवत्ता को जाने इन शिक्षा की दुकानों में शिक्षक जैसे नये युवा मिल जाते हैं जिनक प्रशिक्षण से ज्यादा कोई वास्ता नहीं होता है। एक दो किलोमीटर के दायरे में हर गली कोने में दो चार स्कूल मिल ही जाते हैं। मान्यता माध्यमिक शिक्षा मंडल की होती है  किंतु किताबें सीबीएसई पैटर्न की प्राइवेट पब्लिकेशन की विद्यालयों में चलाई जातीहै। इससे शिक्षा विभाग को कोई लेना देना नहीं होता है। उडनदस्ता में जाने वाले अधिकारी अपनी जेब गरम करके मामले को रफा दफा करने की आदत से मजबूर होते हैं।इन विद्यालयों को शिक्षक रूपी प्राणी मात्र पढा लिखा गुलाम नजर आता है। वो झाडू लगाने का काम बस नहीं करता है। विद्यालय का बस चले तो वह काम भी  शिक्षक  से करवा ले।शिक्षक का कद जितना बढा चढा कर इस दिन दिखाया जाता है। वास्तविकता में शिक्षक की हद अन्य दिनों में विद्यालयों में देखी जा सकती है। शिक्षक के ना कोई भविषय निधि होती है। ना पेंशन का प्रावधान होता है। ना चिकित्सा की कोई व्यव्स्था होती है और ना ही सुरक्षित नौकरी होती है।जब मैनेजमेट का मूड बदला, शिक्षक ने किसी बात से इंकार किया तो मैनेजमेंट ने दूसरा रास्ता खोज कर बाहर का रास्ता इन शिक्षकों को दिखा देता है। सरकार को इन प्राइवेट किस्म के शिक्षकों से कोई वास्ता नहीं होता है।इन शिक्षकों का कोई माई बाप या कोई संगढन नहीं होता है। यदि संगढन बने तो वो भी मात्र कुछ समय तक के लिए जब तक कि पदाशीन दायित्वधारियों के स्वार्थ सिद्ध हो रहे हैं। इन शिक्षकों पर स्कूल प्रबंधन का हाथ जब तक हैं तब तक इनकी नौकरी हैं इसलिये इनमें बहुत से शिक्षक तो मख्खनबाजी में तल्लीन रहते हैं। शिक्षकों पर जिस ट्यूशन को लेकर लांछन लगाए जाते हैं उस बारे में यह कहना ज्यादा सही रहता है कि आज के समय में ट्यूशन एक सोशल स्टेटस सिंबल बन गया है। जितना मंहगा ट्यूशन उतना ऊँचा स्टेटस सिंबल, शिक्षक जितना कहे कि उसके पास टाइम नहीं है अभिभावक अपने बच्चों को उनके घर तक में छॊडने को तैयार रहते हैं। शिक्षा के बाजार में खडा शिक्षक दूसरों के खैर तब भी मांगता है।
शिक्षक दिवस के बहाने इतनी सारी बातें विभिन्न बिंदुंओं में हो गई हैं कि लगता है कि शिक्षक जैसे अवतरित मानव के लिए एक दिन क्यों।स्व. राधाकॄष्णन जी अगर यह लिख गये होते  कि राष्ट्रपति बनने से पूर्व और पश्चात उन्हें शिक्षण पेशा कैसा लगता है तो हम सब शिक्षकों के कलेजे में ठंडक मिल गई होती कि उनके जन्मदिन में शिक्षकों को क्यों बलि का बकरा बनाया गया। वास्तविक शिक्षक दिवस शिक्षकों के लिए तो तब होगा जब शिक्षक दिवस के दिन शिक्षकों को कुछ भविष्य गत लाभ हो। उसका शिक्षण पेशा सुरक्षित हो। उसका परिवार सम्मान से जीवन यापन कर सके। शिक्षक को सम्मान स्वरूप उसके स्तर के अनुरूप वेतन मिले, उसकी भविष्य निशि उसके पास सेवानिवृति होने के बाद शिक्षा विभाग समय से पहुंचा दे। शिक्षकों की पेंशन उन्हें और उनके परिवार वालों को मिले। शिक्षकों को सिर्फ पढाने और भविष्य सुधारने का काम सौंपा जाए। शिक्षकों को पढा लिखा गुलाम, और समाज का लगुआ या बरेदी ना समझा जाए। शिक्षकों को सम्मान से समाज में रहने कहने और ज्ञान को स्थापित करने का अवसर दिया जाए। शिक्षा के उद्योगें में उसको कोल्हू का बैल ना समझा जाए। विद्यालय और अभिभावकों के बीच की कडी के रूप में शिक्षकॊं को स्थापित किया जाए। शिक्षक आज भी पारस की तरह है चाहे वो मणि हो या पत्थर।आज आवश्यकता है समाज में इन पारस को पहचानने की और उचित सम्मान देने की।
अनिल अयान
सतना
९४७९४११४०७