शनिवार, 2 सितंबर 2017

शिक्षक खडा बाजार में सबकी मांगे खैर

शिक्षक खडा बाजार में सबकी मांगे खैर
पाँच सितंबर की तारीख यानि शिक्षक दिवस, डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को पूरा देश शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है। एक दिन के लिए शिक्षक को इस बात का भान कराया जाता है कि वह ही समाज का सबसे सम्माननीय व्यक्तित्व है। अन्य सारे व्यक्ति उसके सम्मान के अधीनस्थ हैं। पांच सितंबर के पहले और बाद में शिक्षक का पद, कद, और हद क्या है वह हम सब बखूबी जानते हैं। ऐसा महसूस होता है कि शिक्षक जैसा दरिद्र प्राणी इस समाज में कोई नहीं है। एक मजदूर को भी उससे ज्यादा श्रम का भुगतान प्राप्त होता है। शिक्षक से समाज से लेकर सरकार और प्रशासन तक आदर्शवादी व्यक्तित्व की उम्मीद करता है और यह माना जाता है कि शिक्षक जैसा आदर्श स्वर्गलोक से आया है। इस लोक में प्रकट हुआ है सब की अपेक्षाएं भी वह अपनी जादू की छडी से पूरी कर देगा। उसके पास जैसे अलादीन का चिराग है जिससे बच्चे के अभिभावकों की अपेक्षाओं में भी खरा उतरेगा। विद्यालय प्रबंधन की उम्मीदों का सितारा होगा। समाज की आशाओं का चितेरा होगा। अपने परिवार और सगे संबंधिओं के साथ रिश्तों में भी शिखर में होगा। आखिरकार शिक्षक को इतना महत्वपूर्ण पद दे कैसे दिया जाता है? लेकिन एक बात तो तय है कि सभी लोग शिक्षक से यही उम्मीद करते हैं कि वो किसी से कुछ उम्मीद ना रखे। यह गल्ती से भी शिक्षक ने इसके बारे में सोच लिया तो उसे समाज का दलिद्र और लालची मानव समझ लिया जाता है।
वर्तमान में शिक्षक का कद कई रूपों में हम सब देख सकते हैं। कभी वो शिक्षक होता है। कभी शिक्षाकर्मी बन जाता है। कभी संविदा अनियतकालिक शिक्षक बन जाता है। कभी गुरु जी बन जाता है। कभी अतिथि शिक्षक बन जाता है। समाज में स्वास्थ्य से लेकर जनगणना तक, समग्र आई डी से लेकर आधार कार्ड तक के आंकडों को इकट्ठा करने में शिक्षकों को निपुण माना जाता है। शिक्षक को और तो और इन कामों को पूरा न कर पाने पर सरकार इनकी वेतन वृद्धि रोक लेती है या मुख्यालय में अटैच कर देती है। शिक्षक को एक बार खराब परीक्षा परिणामों के लिए वेतन वृद्धि रोकने की सजा मिले तो समझ में आता है किंतु इन कामों के वेतन वृद्धि रोकना समझ के परे हैं। अरे भाई जब समय से वेतन जब सरकार नही तब तो उसकी ब्याज नहीं देती है। परन्तु वेतन वृद्धि रोकने के लिए हमारे आलाअफसर आगे- आगे लुतुर-लुतुर करने लगते हैं। आज के समय पर प्रायोगिक रूप से शासकीय विद्यालयों के शिक्षकों को सीएम आनलाइन का जवाब देने, छात्रवृत्ति से लेकर, समग्र आईडी के कलेक्शन, प्रतिभा पर्व मनाने, और शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन का प्रभार का भार ढोने से फुरसत नहीं मिलती है, बचे कुचे समय में से अधिक्तर समय वोटर लिस्ट में नाम हटाने और नये जोडने का काम करना पडता है और अंततः कक्षाओं में जाकर पढाने का समय मिलता है। इसके बाद फिर अपेक्षा की जाती है कि इनका परीक्षा परिणाम प्राइवेट विद्यालयों के परीक्षा परिणामों से बेहतर आए। यह भी एक अतिशयोक्ति से कमतर कुछ भी नहीं है।
शिक्षक दिवस में शिक्षकों के काम में समान वेतन समान काम की बात नहीं की जाती है। उनके विषय उन्नयन पर कोई काम नहीं किया जाता है। सम्मान समारोहों में सम्मानित शिक्षकों की उम्र देखकर और अनुभव देखकर सूचियाँ तैयार की जाती है। यदि एक लेक्चर एक विद्यालय में पढाता है तो उसे राजपत्रित अधिकारी का दर्जा प्राप्त है किंतु उसी विद्यालय में संविदा शिक्षक वर्ग एक के शिक्षक को राजपत्रित अधिकारी से कोसों दूर रखा जाता है। एक दूसरे उदाहरण में अगर हम प्राथमिक और पूर्वमाध्यमिक विद्यालयों में नजर डालें तो विद्यालय में बच्चों और शिक्षक-शिक्षिकाओं के अनुपात की कहानी कुछ और ही होती है। आओ मिल बांचे कार्यक्रम में जन प्रतिनिधि इन विद्यालयों में जाकर अपना ज्ञान बच्चों को प्रदान जरूर करते हैं। किंतु एक दिन में क्या होता है। इन विद्यालयों में अधिक्तर समय मध्यान भोजन की तैयारी करवाने, भोजन करवाने, और उसके बाद बचे कुचे फंड पर हाथ मारने के लिए रखा जाता है। इन विद्यालयों में कितने दिन किताबों को पलटा जाता होगा यह तो यहां का स्टाफ बखूबी जानता है। गुरु जी का कद पुराने जमाने में सबसे ज्यादा हुआ करता था किंतु वर्तमान में शिक्षा गांरटी शालाओं के लिए इनका उपयोग सरकार करती है। इनकों पूरी तरह से निम्न श्रेणी शिक्षकों की कैटेगरी में रखा जाता है। यह समझ के परे है कि शिक्षा की गारंटी कैसे ली जा सकतीहै। साक्षरता को प्रचारित करना समझ में आता है किंतु शिक्षा की गारंटी लेने वाली शालाओं का विषय गत गहराई हम सब खुद समझ सकते हैं।
प्राइवेट विद्यालयों का यह है कि शासन किसी भी जगह पर किसी भी नगर पर कितने भी विद्यालयों को मान्यता दे देता है। विद्यालय के पास उचित जरूरी संसाधन हैं या नहीं, विषय के शिक्षक प्रशिक्षित हैं कि नहीं है। इससे ज्यादा कोई फर्क नहीं पडता है। एक कालोनी में कुकुरमुत्ते की तरह विद्यालय मिल जाते हैं। बिना किसी गुणवत्ता को जाने इन शिक्षा की दुकानों में शिक्षक जैसे नये युवा मिल जाते हैं जिनक प्रशिक्षण से ज्यादा कोई वास्ता नहीं होता है। एक दो किलोमीटर के दायरे में हर गली कोने में दो चार स्कूल मिल ही जाते हैं। मान्यता माध्यमिक शिक्षा मंडल की होती है  किंतु किताबें सीबीएसई पैटर्न की प्राइवेट पब्लिकेशन की विद्यालयों में चलाई जातीहै। इससे शिक्षा विभाग को कोई लेना देना नहीं होता है। उडनदस्ता में जाने वाले अधिकारी अपनी जेब गरम करके मामले को रफा दफा करने की आदत से मजबूर होते हैं।इन विद्यालयों को शिक्षक रूपी प्राणी मात्र पढा लिखा गुलाम नजर आता है। वो झाडू लगाने का काम बस नहीं करता है। विद्यालय का बस चले तो वह काम भी  शिक्षक  से करवा ले।शिक्षक का कद जितना बढा चढा कर इस दिन दिखाया जाता है। वास्तविकता में शिक्षक की हद अन्य दिनों में विद्यालयों में देखी जा सकती है। शिक्षक के ना कोई भविषय निधि होती है। ना पेंशन का प्रावधान होता है। ना चिकित्सा की कोई व्यव्स्था होती है और ना ही सुरक्षित नौकरी होती है।जब मैनेजमेट का मूड बदला, शिक्षक ने किसी बात से इंकार किया तो मैनेजमेंट ने दूसरा रास्ता खोज कर बाहर का रास्ता इन शिक्षकों को दिखा देता है। सरकार को इन प्राइवेट किस्म के शिक्षकों से कोई वास्ता नहीं होता है।इन शिक्षकों का कोई माई बाप या कोई संगढन नहीं होता है। यदि संगढन बने तो वो भी मात्र कुछ समय तक के लिए जब तक कि पदाशीन दायित्वधारियों के स्वार्थ सिद्ध हो रहे हैं। इन शिक्षकों पर स्कूल प्रबंधन का हाथ जब तक हैं तब तक इनकी नौकरी हैं इसलिये इनमें बहुत से शिक्षक तो मख्खनबाजी में तल्लीन रहते हैं। शिक्षकों पर जिस ट्यूशन को लेकर लांछन लगाए जाते हैं उस बारे में यह कहना ज्यादा सही रहता है कि आज के समय में ट्यूशन एक सोशल स्टेटस सिंबल बन गया है। जितना मंहगा ट्यूशन उतना ऊँचा स्टेटस सिंबल, शिक्षक जितना कहे कि उसके पास टाइम नहीं है अभिभावक अपने बच्चों को उनके घर तक में छॊडने को तैयार रहते हैं। शिक्षा के बाजार में खडा शिक्षक दूसरों के खैर तब भी मांगता है।
शिक्षक दिवस के बहाने इतनी सारी बातें विभिन्न बिंदुंओं में हो गई हैं कि लगता है कि शिक्षक जैसे अवतरित मानव के लिए एक दिन क्यों।स्व. राधाकॄष्णन जी अगर यह लिख गये होते  कि राष्ट्रपति बनने से पूर्व और पश्चात उन्हें शिक्षण पेशा कैसा लगता है तो हम सब शिक्षकों के कलेजे में ठंडक मिल गई होती कि उनके जन्मदिन में शिक्षकों को क्यों बलि का बकरा बनाया गया। वास्तविक शिक्षक दिवस शिक्षकों के लिए तो तब होगा जब शिक्षक दिवस के दिन शिक्षकों को कुछ भविष्य गत लाभ हो। उसका शिक्षण पेशा सुरक्षित हो। उसका परिवार सम्मान से जीवन यापन कर सके। शिक्षक को सम्मान स्वरूप उसके स्तर के अनुरूप वेतन मिले, उसकी भविष्य निशि उसके पास सेवानिवृति होने के बाद शिक्षा विभाग समय से पहुंचा दे। शिक्षकों की पेंशन उन्हें और उनके परिवार वालों को मिले। शिक्षकों को सिर्फ पढाने और भविष्य सुधारने का काम सौंपा जाए। शिक्षकों को पढा लिखा गुलाम, और समाज का लगुआ या बरेदी ना समझा जाए। शिक्षकों को सम्मान से समाज में रहने कहने और ज्ञान को स्थापित करने का अवसर दिया जाए। शिक्षा के उद्योगें में उसको कोल्हू का बैल ना समझा जाए। विद्यालय और अभिभावकों के बीच की कडी के रूप में शिक्षकॊं को स्थापित किया जाए। शिक्षक आज भी पारस की तरह है चाहे वो मणि हो या पत्थर।आज आवश्यकता है समाज में इन पारस को पहचानने की और उचित सम्मान देने की।
अनिल अयान
सतना
९४७९४११४०७

शनिवार, 26 अगस्त 2017

देश के लिये सिर दर्द बना बाबावाद

देश के लिये सिर दर्द बना बाबावाद
भारत को हरि भूमि कहा जाता है। यहां लोग साधू संतों महात्माओं को जी भर के पूजते हैं। जी भर के पूजने के चक्कर में इन बाबाओं और साधू संतों के हाथों में अपने घर की इज्जत को भी सौंप देते हैं। दान दक्षिणा का तो कोई पैमाना ही नहीं होता। बाबाओं के तथाकथित भक्तों को वोट बैंक बनाकर राजनैतिक पार्टियां भी मजे लूटती हैं। सरकार की तरफ से भी इनकी खूब खातिर दारी होती है। इसी लिये तो सरकार भी मौनी बाबा बन जाती है जब इन बाबाओं और साधू संतों को न्यायालय और जेल  की राह दिखाई जाती है। अपराधों की फेहरिस्त बढने के बावजूद सरकार और प्रशासन मौन हो जाता है। इससे बडे सम्मान की बात इन बाबाओं के लिये क्या हो सकता है। इन बाबाओं को पहले पाला पोशा जाता है। कुकुरमुत्तों की तरह जब इनके सम्राज्य का विकास हो जाता है तब इनकी फसल को काटने में सरकार और प्रशासन को पसीना आ जाता है। विगत बाबा और साध्वियों ने तो देश में भयंकर उत्पात मचाया है। हर जाति के लोग तो साधू और संत बन जाते हैं। और अपना दरबार लगा लेते हैं। हमारे भक्त तो अंधभक्त होते हैं जहां देखा कि पंडाल लगा है और प्रवचन चल रहा है वहीं जाकर शामिल हो गये। इनके दरबार में तो सिनेमा और हस्तियों का जमावडा लगने लगता है। इन्हीं दरबारों से आश्रमों को चंदा मिलता है। आश्रमों में मुफ्त की रोटी खाने और राम राम गाने के लिये ये लोग बाबाओं के पक्के चेले बन जाते हैं। और फिर धीरे धीरे बाबा और उनके डेरे विवादित होते चले जाते हैं। चेलों और चेलियों की सेवा में बाबा मलाई चाटते रहते हैं। इसके चलते बाबाओं का बाबावाद चरम सीमा पर होता है।
इस समय पर राम रहीम,आसाराम, रामपाल, राधे मां जैसे लोग इसी का उदाहरण है। हमारी अंध भक्ति और अंधभक्ति का समर्पण का परिणाम होता है कि ये बाबा ज्ञान देने के साथ साथ अस्मिता लेने का भी काम करते हैं। यह हाल पूरे देश में चल रहा है। जहां जहां मठ और आश्रम बने हैं वहां वहां जिस्म का खेल खुले आम कोड वर्ड के जरिये चरम पर हैं। यह हाल सिर्फ हिंदुओं के डेरे का बस नहीं है। बल्कि हर धर्मों में अपना अपना रंग दिखाता यह अपराध फलता फूलता है। हमारे देश में हिंदू बाहुल्य देश होने की वजह से बाबाओं का प्रचार प्रसार होजाता है जबकि मौलवियों , काजियों, पारसियों, फादरों को मीडिया का कैमरा भुला देता है। इन बाबाओं के खाते में मर्डर केश, भक्तों को नपुंसक बनाने का केश, मीडिया को खरीदने का केश, सत्तापक्ष के नेताओं को राजनीति में धन धान्य की मदद करने का मुद्दा घेरे रहताहै। इनका परिधान भी चर्चा का विषय बना होता है। इन बाबाओं को जेल में विशेष परिधान भी तो चर्चा का विषय बना होता है।
इन बाबाओं और साधुओं का हिंदु धर्म संस्कृति के साथ कोई लगाव नहीं होता। इनके अनुयायी भक्त कम और उपद्रवी ज्यादा होतेहैं। जो लोग इनके भक्त होते है सजा होने के बाद लोग इनके नाम से अपना मुंह छिपाते फिरते है। सरकारें चाहे कहीं की भी हो, किसी भी पार्टी की हो बाबाओं को उनके प्रभाव से समाप्त करने के लिये पसीने छूट जाते हैं। उनके उपद्रवी  सरकार तो सरकार पुलिस तक के पसीने छूट जाते हैं। सेना को युद्ध का प्रशिक्षण दिया जाता है। उन्हें भी बाबाओं के लिये जब ड्यूटी में बुलाया जाता होगा तो उनका भी आत्म सम्मान कहीं ना कहीं झुक जाता होगा। पडोसी देश इस बात पे हंसते हैं कि भारत भी अपनी बाह्य सुरक्षा को भुला कर आंतरिक सुरक्षा के लिये परेशान है। हां यह तो तय है कि ये बाबा उन बाबाओं और साधुओं से कुछ अलग होते हैं जो नागा होजाते हैं। जो  गंगा और यमुना के तीर में भभूत लगाये दिन रात तपस्या में लीन रहते हैं। जिनकों किसी मठ, किसी आश्रम, किसी डेरे की आवश्यकता नहीं होता। जिनका प्रवचन से कोई लेना देना नहीं है। भारत ऐसे बाबाओं के लिये जाना जाता है। ये बाबा तो ढपोरशंखी हैं। और हमारे देश के राजनीतिज्ञ  इन्हीं ढपोरशंखियों के चरणों में गिर कर अपनी सत्ता के लिये भीख मांगते हैं। इसके लिये जितना ये बाबा जिम्मेवार हैं। उससे कहीं ज्यादा हमारी अंधभक्ति भी दोषी है। हमारी अंध भक्ति हमें विवेकहीन बना देती है। हम अपने गलत कामों को छिपाने के लिये और काला धन बचाने के लिये ये बाबा ही एक मात्र चारा नजर आता है।
धर्म और संस्कृति वह साधन बन चुका है कि जो चाहे वो इसके अंदर प्रवेश करके इसका दोहन कर सकता है। खुद को भगवान मानने का दंभ पालने वाले ये लोग देश की आस्था को बेचने वाले होते हैं। हमारा देश इन्हें पूजता है और सिर आखों में बैठाता है। अंततः इन्हीं के द्वारा देश की इज्जत को सरे राह नीलाम कर दी जाती है। सरकारें तक इन बाबाओं के भक्तजनों में सुमार होते हैं। इस वजह से देश जलता है, लोग मरते हैं, कत्ल होते हैं पर हमारे देश के मंत्री और प्रशासन मौन धारण करके मूक दर्शक बन जाते हैं। यही मौन इन ढोंगियों को सातवें आसमान में बैठाने के लिये एक वरदान के समान होता है। और यही वरदान मानवता के लिये श्राप बन जाता है। इसका दंश हम सब आम जन भोगते हैं। इस सिरदर्द का इलाज भी हम ही हैं और दवा भी हम ही है। बस हमें इस सिरदरद को पालने से रोकना होगा।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७


रविवार, 6 अगस्त 2017

पनामा भूचाल में धरासाई शरीफ

पनामा भूचाल में धरासाई शरीफ
भारत की तीन चिंतायें और बढ गई है पनामा पेपर्स में नवाज शरीफ की ताजपोशी खत्म होने से भारत की तीन चिंतायें और बढ गई है। पहली पाक सेना का मेजर बाजवा की अगुआई में मजबूती। दूसरी भारत विरोधी आतंकी संगढनों को बढाने वाली छूट और तीसरी भारत के काश्मीर में पाक सेना का बढता हस्ताक्षेप। शाहिद अब्बासी भले ही पाकिस्ता के अंतरिम प्रधानमंत्री बन गये हैं किंतु निर्धारित समय के बाद तो पाक प्रधानमंत्री पद पर कोई और शक्श बैठेगा। जो भारत के साथ मजबूत रिश्तों को टोडने का प्रयास करेगा। पाकिस्तान में शरीफ को भारत का हमदर्द माना गया। लाहौर निमंत्रण से पाक सेना और सैनिक सकते में थे।  यह सभी को पता है कि पाकिस्ता की विदेश नीति रावलपिंडी में तैयार की जाती है विदेश मंत्रालय तो इसे अमल में लाता है। नवाज शरीफ के प्रयासो को कट्टरपंथी ताकतों के द्वारा और पाकिस्तानी सेना के द्वारा हमेशा ही खत्म किया जाता रहा है। पनामा पेपर्स तो मात्र बहाना था जिसके चलते पाकिस्तान की सत्ता डगमगा गई। ऐसा पहला मौका नहीं था जब शरीफ की शराफत को पाकिस्तानियों ने आडे हाथों किया हो। दो बार इसके पूर्व भी पाकिस्तान ने शरीफ की शराफत के चलते कुर्सी से उतार कर जमीं में बैठा दिया था। हालांकि शरीफ इसके लिये पहले से तैयार थे। पनामा तो उनका तीसरा अनुभव था। उनके बाल यूं ही धूप में सफेद नहीं हुये थे। उन्हें यह पदवी राजनैतिक विरासत में अता हुयी थी। हां इस बार ना को कोई जनता थी ना कोई परवेज थे था तो न्यायालय के जज और उनका फैसला।
बीते साल ब्रिटेन में पनामा की ला फर्म के सवाकरोड टैक्स डाक्यूमेंट्स लीक हो गये थे जिसमें पुतिन, नवाज शरीफ, शी जिनपिंग और मैसी ने कैसे अपनी बडी दौलत टैक्स हैवन देशों में जमा की थी। वो बस नहीं एक सौ चालीस नेताओं और सैकडों के सेलीब्रेटीज के खातों के नाम खाते एमाउंट और इन्वेस्टमेंट के बारे में जानकारी थी। टैक्स हैवन वो देश हैं जहां पर इनवेस्टमेंट करने के बाद व्यक्ति की पहचान का खुलाशा नहीं किया जाता है। इसमें विश्व की चार लाख सीक्रेट इंटरनेशनल कंपनीज के भी आंकडे थे। सन सतहत्तर में बनी मोसेक फोंसेक कंपनी के हेड क्वार्टर पनामा में होने की वजह से इस कंपनी से अधिक्तर पेपर्स गायब हुये। ऐसा नहीं है कि इसमें सिर्फ पुतिन से लेकर शरीफ बस शामिल हैं। इसमें भारतीय नाम भी शामिल हैं। पांच सौ से ज्यादा नाम भारतीय है। मोदी सरकार ने सेंट्रल बोर्ड आफ डायरेक्ट टैक्सेस को यह जिम्मा सौंपा जिसके चलते आयकर विभाग ने इस पर नोटिस भी भेजी थी। अभी तक इन पेपर्स के रसूखदारों पर निर्णय अधूरा है। एक तरफ सरकार ब्लैक मनी अर्थात काला धन वापिस लाने के लिये प्रतिबद्धता शामिल करती है। अब देखना है कि पनामा पेपर्स से कितने चेहरे सामने आते हैं। पाकिस्तान के प्रधान का इस तरह से देश के न्यायालय के द्वारा कुर्सी से नीचे भेजने का संकेता पनामा की महत्ता को भी विश्व में और बढा देता है। अन्य संबंधित देशों में भी इस निर्णय का प्रभाव देखने को मिलेगा।
पाकिस्तान की इस अस्थिरता का भारत पर क्या प्रभाव पडेगा यह देखने और जानने का विषय है।राजनैतिक अस्थिरता के इस दौर में पाकिस्तान की सेना किस ओर करवट लेती है यह भी भारत के लिये भविष्य के गर्त में छिपा प्रश्न है। पिछले साल से शरीफ की शराफत पर जिस तरह से शवाल उठाये जा रहे थे उससे तो यह तय हो चुका था कि एक ना एक दिन शरीफ को जमीं में आना पडेगा और इस बार कोई मुशर्रफ नहीं होगें इस बार उनका कोर्ट ही उन्हें गुनहगार कुबूल कर लेगा। राजनीतिक अस्थिरता के चलते सेना के हौसले और बढेंगें। आतंकी संगठनों को राजनीतिक बंधनों से मुक्ति मिलेगी। पठानकोट और ऊडी हमलों के बाद जिस तरह की तल्खी बढी थी वह और ज्यादा गहरी होती चली जायेगी। इस सब रूझानों के चलते पाक सेना के साये में भारत पाक के रिश्ते सुधारने की बजाय बिगाडने की स्थिति ज्यादा निर्मित होगी। कहा जाता है कि कट्टरता के पैमाने में शाहिद अब्बासी जो पेट्रोलियम मंत्रालय सम्हाल रहे थे वो आगामी डेढ महीने में इस रिश्ते को और आग के हवाले करने के लिये दिन रात एक कर देगें। उसके बाद शरीफ के भाई शहबाज शरीफ के चुनाव लडकर पाकिस्तान की कुर्सी में काबिज होने की खबर है। पाकिस्तान की जनता और सेना नहीं चाहती है कि सन अठारह के चुनाव में भारत की तरफ झुकने वाला व्यक्ति सत्ता में काबिज हो।  भविष्य में माहौल कुछ भी पैदा हो परन्तु भारत और पाकिस्तान के बीच तल्खी का दौर और बढेगा और साथ ही साथ इस दौर में दोनों देशों के बीच सैन्य संघर्ष तीव्रता के साथ अपने पैर पसारेगा।

अनिल अयान,सतना

गर्व है आजाद भारतीय होने पर

गर्व है आजाद भारतीय होने पर
वंदेमातरम सुजलाम सुफलाम मलयजशीतलाम शस्य श्यामलाम मातरम की परिकल्पना करने वाले बंकिम दा आज खुश होंगें की वंदनीय भारत माता अपने स्वतंत्रता के सात दशक पूर्ण कर चुकी है। सन १७५७ से शुरू हुआ विद्रोह जो मिदनापुर से शुरू हुआ वह  बुंदेलखंड और बघेलखंड में १८०८-१२ के समय पर अपने शिखर में था। अंततः सन अठारह सौ सत्तावन जिसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का वर्ष माना जाता है। फिर उसके बाद चाहे बंग भंग आंदोलन हो या फिर बंगाल का विभाजन, चा फिर भगत चंद्रशेखर आजाद युग रहा हो। चाहे करो या मरो वाला अगस्त आंदोलन की बात की जाये। या फिर दक्षिण पूर्व एशिया में आजाद हिंद आंदोलन और आजाद हिंद फौज की भूमिका हो। सब इस स्वतंत्रता से अटूट रूप से जुडे हैं। आज के समय में कितना जरूरी हो गया है ,समझना कि आजादी के मायने क्या है. जिस तरह के संघर्ष के चलते अंग्रेज भारत छॊड कर गये और भारत को उस समय क्या खोकर यह कीमती आजादी मिली यह हमे हर समय याद रखना होगा. आज  ७० वर्ष के ऊपर होगया है भारत अपने विकसित होने की राह सुनिश्चित कर रहा है. वैज्ञानिकता, व्यावसायिकता, वैश्वीकरण के नये आयाम गढ रहा  है. आज के समय समाज, राज्य, राष्ट्र और अन्य विदेशी मुद्दे ऐसे है जिनके चलते स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान में पानी फिरता नजर आ रहा है. ऐसा महसूस होता है कि पहले हम अंग्रेजों के गुलाम थे और आज अपने राजनेताओं के गुलाम हो गये है भारत के हर राज्य अपनी जनसंख्या बढाने में लगे हुये है. पहले जहाँ भारत की प्राकृतिक संपदा और मानव संसाधन समुचित थे यहाँ के विकास के लिये आज के समय में भारत को हर क्षेत्र में आयात ज्यादा और निर्यात कम करना पड रहा है, भारत ने जितना विकास किया और विकास दर बढाई है उतना ही भारत की मुद्रा स्फीति की दर में गिरावट हुई है. आज भारत विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आने के लिये जगदोजहद करने में लगा हुया है. आज जो भी राज्य और केंद्र की कुर्सी में बैठ रहा है वह सब अपने राजनैतिक समीकरण बनाने में लगे हुये है.आज के समय में भारत का संविधान भी सुरक्षित नहीं है.इसके साथ साथ भी खिलवाड करने , बलात्कार करने से राजनेता बाज नहीं आरहे है, आज के समय में भाषा गत मुद्दे, क्षेत्र के मुद्दे,जाति धर्म के मुद्दे इस तरह छाये हुये है कि उसके सामने देश को प्रगति और विकास के विचार विमर्श करने का मौका ही नहीं मिल पा रहा है.आज सिफ भारत को भौतिक रूप से आजादी मिल गयी है परन्तु सामाजिक,आर्थिक,सांस्कृतिक, आजादी के सामने भारत आज भी पाश्चात सभ्यता के पीछे घिघिया रहा है.
  राजनैतिक स्थिति यह है भितरघात से बचने की कोशिश में खुद भी भितरघाती बन जाते है. आजादी के बाद आज के समय मे एक सर्वहारा वर्ग से पूँछे की बाबा तुम्हे आजादी के पहले और बाद में क्या अंतर दिखाई पडता है तो चाहे किसान हो, मजदूर हो, बुजुर्ग हो, या कामगार हो वह सब यही कहेंगें कि पहले साहूकारों से, बिचौलियों से कर्जा लेकर अपना जीवनयापन करते थे आज सरकार घर आकर जबरन कर्जा दे जाती है. और फिर मार  मारकर वसूल करती है. आज पाश्चात सभ्यता का प्रभाव है कि दो पीढियाँ एक साथ टेलीविजन का मजा नही ले सकती है. आज के समय में सब कारक उठे है परन्तु आज के समय  में सिर्फ चारित्रिक अवमूल्यन इस तरह हुआ है कि ऐसा लगता है हर रिश्ते बेमानी से है. आज के समय मे आरक्षण की आग इस तरह फैली हुई है कि आज के समय में आरक्षित जातियाँ ही इसका दुरुपयोग करने में लगी हुयी है. अन्य जातियां भी आरक्षण की रेवडी चाटने के लिये आंदोलन और सरकारी नुकसान करने ली चेष्टा में लगी हुयी हैं। आज के समय बौद्धिक आजादी के नाम पर लोग अन्य जातियों धर्मों को गाली देने में अपनी शान समझते है. आज लोकतंत्र में तंत्रलोक मिलता नजर आरहा है. और पब्लिक प्रापर्टी को लोग अपने घर की जागीर समझ कर अतिक्रमण करने में उतारू होगये है. आज के समय सिनेमा और खेल दोनो सेंसर और डोपिंग टेस्ट की कगार में खडे हुये है. पूरा देश अपनी आजादी के गुमान और गुरूर में इतना मादक होगया है कि उसे ना अपने अतीत के संघर्ष की फिक्र है और ना इस बात का भान है कि भविष्य में भी कोई उसे फिर किसी तरीके से अपना उपनिवेश बना सकता और वो कुछ भी नहीं कर सकता है. आज के समय में भारत के पडोसी ही दुश्मन बने हुये है,. और तब पर भी भारत उनसे भाई चारे की बाँह फैलाये गले लगाने के लिये आतुर नजर आता है. इतने वर्ष होने के बाद भारत आज भी वैचारिक रूप से गुलाम है. बस गुलाम बनाने वाले अपना नकाब बदल लेते है.आज के समय में जरूरत है कि बेरोजगारी को कम करके आने वाली पीढी को आतंकवादी, अराजक, और डकैत बनने से रोका जाये, पलायन करने से रोका जाये. और यह प्रयास किया जाये कि नजर लग चुकी आजादी का अपने प्रयासों के सार्वभौमिक बनाया जाए नहीं तो. आज के जनप्रतिनिधि... प्रति जन निधि संचय करने में अपने आप के साथ साथ देश को भी विदेशियों के हाँथों बेंचते रहेंगें।
आजकल समय सापेक्ष जिस स्वतंत्रता की सबसे ज्यादा विध्वंसक स्थिति बनी हुई है, वह वैचारिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। समाज में हर वर्ग में इसके मायने बदले हुये नजर आ रहे हैं। हर क्षेत्र में विचारों के आदान प्रदान और इसकी स्वच्छंदतावादी नीति असफल नजर आ रही है। किसी वर्ग के लिये यह स्वतंत्रता वरदान शाबित हो रही है किसी के लिये यह अभिशाप के रूप में सामने आ रही है। इसकी वजह यह है कि उच्च और प्रतिस्पर्धी वर्ग अपने विचारों को व्यक्त करते समय अपना आप खोते नजर आते हैं।  आज के समय पर विचारों को जनता के सामने लाने से पहले लोगों के द्वारा सोचने की प्रवृति छोडी जा चुकी है। वैचारिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे ज्यादा बेडा गर्त राजनीति में हुई है। कुर्सी पा जाने का दंभ और ना पाने का क्षोभ राजनैतिक व्यक्तित्व की मिट्टी पलीत कर देता है। राजनैतिक फायदे के लिये ये लोग देश के विरोध में कुछ भी बोल देते हैं।भाषागत जूतम पैजार देखने को अधिक मिलती है।मीडिया द्वारा परोसे जा रहे समसामायिक विमर्श भी सिर्फ बहसबाजी का रूप लेकर दम टोड देते हैं। सार्थक और स्वस्थ विमर्श और चर्चा का युग जा चुका है। आज के समय में वैचारिक आजादी के मायने विचारों की लीपापोती और विचारों के माध्यम से निकले शब्दों को आक्रामक बनाकर प्रहार करने की राजनीति की जा रही है।
जब सन सैतालिस में देश आजाद हुआ उस समय की स्थिति और आज की स्थितियों के बीच जमीन आसमान का अंतर हो चुका है यह अंतर समय सापेक्ष है। आज के समय में भारतीय जनता पार्टी का सम्राज्य लगभग पूरे देश के राज्यों में फैल चुका है। और वैचारिक दृष्टिकोण भी इसी पार्टी के रंग में रोगन हो चुका है। आज के समय में राष्ट्रभक्ति की परिभाषा परिवर्तित होकर पार्टी जन्य हो चुकी है। राजनैतिक अवमूल्यन अगर गिरा है तो उसके प्रचार प्रसार को तीव्र करने के लिये समाज के पांचवें स्तंभ की भूमिका महती हो गई है। आज के समय में मीडिया के विभिन्न रूप भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं हैं। स्व तंत्र की स्थापना जिसके चलते सर्व जन हिताय की परिकल्पना लोकतंत्रीय ढांचे की नीव रखते समय की गई थी वह अब अपने परिवर्तित रूप में है। आज की राजनैतिक स्थिति यह है कि भगवाकरण में अन्य पार्टियों की अस्तित्व खतरे में। विगत तीन पंच वर्षीय में अन्य पार्टियों के पास राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर के नेतृत्व का आभाव है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को भी दलों ने अपने अपने कुनबों में कैद कर लिया है। क्षेत्रवाद के चलते देश का विभाजन कई राज्यों में हो गय है। हमारा देश टुकडों में अपना अस्तित्व खोज रहा है। भारत अपने पडोसी देशों के ही असुरक्षित है। चीन, पाकिस्तान, जैसे दुश्मन हमारी सरकार ने दोस्तों के रूप में गढा है। हमारे भितघातियों का हाल यह है कि दुश्मन देशों के साथ मिल कर हम सबकी अखंड स्वतंत्रता को खंडित कर दिया है। भारत भूमि को माता मानने वालों का कलेजा दर्द से फटा जा रहा है क्योंकि भारत आजादी के सात दशक बाद किस स्थिति में पहुंच चुका है। अंततः हम स्वतंत्र तो हैं। परन्तु स्वमेव तंत्र जन हितों की बजाय राजनैतिक हितों को सिद्ध करने में लगा हुआ है।यह हमारी आजादी के सत्तर दशकों का विधान है। परन्तु इस बात का हमें गर्व होना चाहिये कि हम स्वतंत्र भारत में पैदा हुये।
अनिल अयान

९४७९४११४०७

राजनैतिक अलाव में जलता केरल

राजनैतिक अलाव में जलता केरल
हमारे देश का सबसे पढा लिखा प्रदेश केरल माना जाता है। यहां की साक्षरता लगभग ९० प्रतिशत को छू रही है। लोग पढे लिखे होने के साथ जागरुक भी हैं। पिछले कई दशकों में यह जागरुकता होने के बावजूद राजनैतिक अलाव में केरल की आम जनता और वहां के जन प्रतिनिधियों की लाशें बिछती चली जा रही है। छ दसकों से वहां सीपीएम और संघ के बीच की स्थिति गंभीर बनी हुई है। अमन की कोई उम्मीद नजर नहीं आती है। प्रतिशोध दर प्रतिशोध जानों का दुश्मन बना हुआ है। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के जिले कन्नूर से ही तीन सौ लोगों को इस एजेंडे में स्वाहा कर दिया गया। कभी वाम पंथी पार्टियों के कार्यकर्ताओं को दुर्दांत तरीके से मौत के घाट उतारा जाता है तो उसका बदला संघ के स्वयंसेवकों को मौत के घाट उतार कर लिया जाता है। विगत तीस जुलाई को जब केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में संघ के कार्यकर्ता की हत्या कर दी गयी। तो यह मुद्दा और गर्मा गया। बीजेपी इस हत्या के पीछे सीपीएम के कार्यकर्ताओं को दोषी बताया। एक प्रेस कांफ्रेस में तो मुख्य मंत्री तक का आपा बाहर हो गया और वो मीडिया को गेट आउट कहने पर विवश हो गया। साठ के दशक से जारी हिंसा अब भी जारी यह हिंसा और वीभत्स होती जा रही है। मारने के बाद अंग भंग करने तक की खबरे आती हैं। राज्य की मीडिया भले ही इसे दोनों दलों के हिंसात्मक रवैये का परिणाम मानते हों। परन्तु राष्ट्रीय न्यूज चैनल्स इन्हें संघ के पक्ष में लेजाने का प्रयास कर रहे हैं।
घटनाक्रम में देखें तो जुलाई माह में एक तरफ सीपीएम नेता सीवी धनराज की हत्या होती है और उसी दिन रात में बीजेपी कार्यकर्ता सी के रामचंद्रन की हत्या कर दी जाती है। धनराज की बरसी में बम से हमला होता है। तो सीपीएम के कार्यकर्ता संघकार्यालय को बम के हवाले कर देते हैं। वहीं पर उपद्रव में बीस घरों को आग के हवाले कर दिया जाता है। इसके पूर्व १० अक्टूबर को पिछले सल सीपीएम नेता के मोहनन की हत्या कर दी जाती है। उसी चौबीस घंटे के अंदर बीजेपी कार्यकर्ता रीमिथ की हत्या प्रतिशोध के रूप में लिया जाता है। और तो और मही में सीपीएम सरकार के विजय जुलूस में बंब से हमला करके उपद्रव मचाने की साजिश की जाती है। अर्थात मौत का बदला मौत से ही लिया जाता है। केरल की हिंसा पर रिसर्च करने वाली युनीवर्सीटी आफ केपटाउन की लेक्चरर रुचि चतुर्वेदी का कहना है कि इस खूनी प्रतिशोध में थिय्या जाति के लोग मारे जाते है। ये कम जमीन वाले साधारण तबके के लोग हैं। इनके युवा वर्ग दोनों राजनैतिक दलों में शामिल हैं इसलिये इन युवाओं का मौत से सामना अधिक होता है। बीआरपी भास्कर अपनी रिपोर्ट में कहता है कि इन हमलों में सीपीएम और संघ दोनों के कार्यकर्ताओं की मौतें हुई है। आरोपियों को सजा का प्रावधान है। केरल के हाई कोर्ट और सेसन कोर्ट ने कई मामलों में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।  जिसमें दिसम्बर सन सोलह में सीपीएम के बीस कार्यकर्ताओं को आजीवन कारावास की सजा हुई। इसी तरह दूसरे तरफ का भी हाल रहा। राजनैतिक दल वहां अपने नेताओं के चलते आराम से राजनीति चमका रहे हैं। और कार्यकर्ता आजीवन कारावास भोग रहे हैं। कन्नूर ही सबसे ज्यादा हत्या वाला जिला बना हुआ है।
केरल की सरकार को घेरने की पूरी तैयारी भाजपा द्वारा की जा रही है। सरकार बैकफुट पर है। कानूनव्यवस्था लगभग खत्म हो चुकी है। संघ के कार्यकर्ताओं की मौतों का सिलसला थमने के लिये वहां पर भाजपा शासन प्रमुखता से लाने की तैयारी है। राष्ट्रपति शासन की लगातार मांग उठना इस बात को शाबित करता है। संघ का मानना है कि केंद्र में भाजपा के होने के बावजूद ऐसी स्थिति जिसमें कि स्वयंसेवक मारे जा रहे हो और सत्तामौन धारण किये हो वह संघ के गले नहीं उतर रही है। उधर बीजेपी को लगता है कि इस मुद्दे की पतवार का सहारा लेकर वामपंथी सरकार को कुर्सी से उतार कर खुद काबिज हुआ जा सकता है। विस्तार और संगठन की मजबूती भी इस रणनीति का हिस्सा बन चुकी है।सवाल यह है कि यह छोटा सा राज्य बडे राजनैतिक कुरुक्षेत्र का अड्डा बन चुका है। जिसमें दोनों घटकों का यह मानना है कि तुम हमारे एक मारोगे हम तुम्हारे दस मारेंगें और वीभत्स तरीके से मारेंगें। राजनैतिक झंडावरदारों के लिये कानून मौन है। कार्यकर्ताओं के लिये कानून आजीवन कारावास की सजा देता है। एक पक्ष को सजाए ज्यादा है और दूसरे पक्ष को सजायें कम। कानून का दोगला पन भी इस अलाव का मुख्य वजह है। केंद्रीय कानून मंत्री इस मामले को संजीदगी से नहीं ले रही हैं क्योंकि उनहें लगता है कि यह मुद्दा जितना गरमायेगा उतना ही भाजपा का पक्ष वहां मजबूत होगा। देश में बहुमत दलीय राजनीतिक दल के रूप में भाजपा ही आज के समय में सर्वोपरि है। परन्तु सवाल यह उठता है कि लाशों पर कुर्सी में बैठे सीपीएम की निष्क्रियता और भाजपा की कुर्सी की दौड के बीच का द्वंद नैतिक रूप से कितना सही है। मीडिया पूरी तरह से भाजपा के साथ है जिसके चलते नेसनल लेवल पर यह राज्य नेपथ्य में जा चुका है। हालांकि राजनीति में नैतिकता की उम्मीद बेमानी है। परन्तु इस कूटनीतिक तंत्र में केरल फिल हाल अपने स्वस्थ होने की असफल प्रतीक्षा कर रहा है।
अनिल अयान,सतना

शनिवार, 15 जुलाई 2017

किसी की बपौती नहीं है कविता

किसी की बपौती नहीं है कविता / कवि धर्म बनाम कविपुत्र धर्म
नाश के दुख से कभी/ दबता नहीं निर्माण का सुख/ प्रलय की निस्तब्धता से/ सृष्टि का नव गान फिर - फिर/ नीड का निर्माण फिर - फिर/ नेह का आह्वान फिर - फिर।  यह वो कविता है जो हरिवंश राय बच्चन ने अपनी कलम का दायित्व निर्वहन करते हुये लिखी थी। इस कविता तो कहा जाता है कि अन्य कविताओं की तरह उनके बेटे अभिताब बच्चन जी ने कापी राइट करा कर रखा हुआ था  और तर्पण कार्यक्रम में जब कुमार विश्वास ने साहित्यिक विश्वास के साथ इसको गाया और हरिवंश राय बच्चन जी को अपना साहित्यिक प्रणाम करके लोगों के सामने रखा साथ ही साथ उसका वीडियों यूट्यूब में अपलोड किया गया तब से  एक विवाद गहराया। अभिताब जी ने केश करके कुमार विश्वास को कानूनन नोटिस भेजा और उसका जवाब भी कुमार विश्वास ने अपने राजनैतिक अंदाज में देते हुये उसकी कमाई का बत्तीस रुपये अभिताब जी को वापिस कर दिया। क्या कविता का अपमान किया था कुमार विश्वास ने या कवि का अपमान किया गया। क्या स्व. बच्चन जी की कविता को चोरी करके अपने नाम से कुमार विश्वास ने दर्शकों के सामने रखा। अगर ऐसा नहीं था तो कापीराइट क्या साहित्यिक धर्म से बढ कर है। क्या साहित्यकार के पुत्र होने के नाते अभिताब जी का कुमार विश्वास जी के साथ कोई साहित्यिक और सामाजिक रिश्ता नहीं है। अगर है तो फिर कविता की बपौती के लिये कोर्ट का नोटिश मेरे जैसे कलमकार के गले नही उतरता।
      यह साहित्य और काव्य परंपरा के इतिहास का एक ऐसा विषय पैदा हुआ जिससे कई सवालात मन में जागृत हुए। समान्यतः यह देखा जाता है कि कवि सम्मेलनों मुशायरों  में संचालक कवि अन्य मसहूर कवि शायरों की रचनायें सम्मान के साथ पढते हैं गाते हैं और श्रोताओं तक पहुंचाते हैं। वो जिन कवियों और शायरों की कविताओं को पढते हैं बयाकदे उनका नाम तक लेते हैं। और ये वीडियों यूट्यूब में बाकायदे अपलोड किये जाते हैं ताकि वो कार्यक्रम यादगार बने। आज तक ऐसा नहीं हुआ कि इस तरह का केश किसी कवि ने दूसरे कवि पर किया हो कि तुमने एक नामी गिरामी कार्यक्रम में मेरी कविता मेरे नाम से क्यों पढी। एक कवि एक पाठक भी है और वह अगर अच्छी रचना पढता है उसे वह रचना पसंद आती है तब वह उसका प्रयोग उसके रचनाकार का उद्द्धरण देते हुये करने के लिये स्वतंत्र होता है। कमलकार की रचना तब तक वैयक्तिक है जब तक वह स्वांताह सुखाय के लिये लिख कर डायरी में कैद है। अगर वह प्रकाशित हो गई। या श्रोताओं के बीच आ गई तब से वह समाज की रचना हो जाती है। हर रचनाकार चाहता है कि उसकी रचनायें उसके नाम को मरने के बाद भी जग में अमर करती रहें।
      अब सवाल यह है कि क्या कविता कवि तो ठीक है उनके परिवार की पैतृक संपत्ति है। क्या गायत्री मंत्र श्लोक, राष्ट्र गान और राष्ट्रगीत आदि भी इसी तरह कापीराइट हो जाने चाहिये। अभिताब जी के अनुसार देखा जाये अगर ऐसे ही कापीराइट का सिस्टम चलता और उपर्युक्त मंत्रों श्लोकों के रचनाकार अगर जीवित होते और उन्होने  अगर हम सब पर केश कर दिया होता तो हम सब पाठकों और रचनाकारों की कहानी समाप्त हो चुकी होती। स्व. बच्चन जी ने यह  कभी नहीं सोचा होगा कि उनका सगा पुत्र अभिताब जी  उनके साहित्यिक पुत्र सम कुमार विश्वास के ऊपर उन्ही की रचना के प्रचार प्रसार के कारण केश कर देगें। एक पुत्र अपना पुत्र धर्म निभाने का भ्रम पाले बैठा है जिसका साहित्य से कोई वास्ता नहीं है जो बालीवुड और सरकार के ब्रांड एम्बेस्डरशिप के ना जाने कितने कांटेक्ट से जुडे हुये हैं। दूसरी तरफ उनके साहित्यिक पुत्र सम कुमार विश्वास उनकी मृत प्राय कविता को युवा और मीडिया के सामने ससम्मानपूर्वक लाकर अपने कवि धर्म को निर्वहन कर रहे है। तब भी वो गलत हो गये क्योंकि कानूनन अपने खून को अधिकार है कि वो अपने बाप के माल पर अपना अधिकार जमाये। भले ही वो कविता जैसा भावनात्मक शब्द शक्ति क्यों ना हो।  जिस कविता के भाव को लेकर कविता का गायन कुमार विश्वास ने किया वह जग हिताय था। कविता का मर्म हम समझ सकते हैं कि कविता अगर श्रृष्टि के नवगान का आह्वान कराती है तो वह नेह के प्रसार को भी आह्वानित करती है। अफसोस कि यह आह्वान उनके पुत्र नहीं समझ सके और बालीवुड की बाजारी सोच के चलते कविता को धार बनाकर एक कवि को कविता गाने के नाम पर कानून की बारीकियों के आमना सामना करना पडा। हम अगर स्व. बच्चन जी को निशा निमंत्रण और मधुशाला जैसी रचनाओं और कृतियों की वजह से जानते हैं इसमें अगर कुछ और इजाफा करने का काम कुमार विश्वास ने किया तो क्या गलत लिया।
      कुमार विश्वास ने भले ही आप राजनैतिक पार्टी में शामिल हुये हो। भले ही साहित्यिक जगत में उन्हें मंचीय कवि के रूप में जाना जाता हो। भले ही वो राजनीति में शामिल होकर विवादित रहे हो। किंतु कवि के रूप में उनकी ही प्रतिभा थी कि कवि सम्मेलनों की नीरसता को खत्म करने की सोच और साहित्यिक गीतों की परंपरा को उन्होने कालेज कैंपस और युवा मन के अंदर तक घर करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कुमार की लोकप्रियता ने कपिल के लाफ्टर शो को कवितामय कर दिया जो उस शो के इतिहास में पहली बार था। कुमार की कविता के प्रति वफादारी के चलते विभिन्न अवसरों में सिर्फ टीआरपी के पीछे अंधी दौड में दौडने वाले प्राइवेट चैनलों ने कविता को अपने दर्शकों तक पहुंचाने के लिये विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जिसमें कविता हुआ। कविता के साथ रचनाकार और रचना पर विमर्श हुआ। और साहित्य के प्रति एक नया दृष्टिकोण दर्शकों तक पहुंचा। यह सब काम करने के लिये अभिताब जी के पास वक्त ना होगा। इस सब से कुमार को अगर कुछ मूल्य मिल भी रहा है तो उनके जीविकोपार्जन के लिये नहीं है। वर्षों से चली आ रही एक कटु शिलालेख जिसमें यह कहा गया कि कविता या साहित्य पेट नहीं भरता सिर्फ प्रसिद्धि देता है, को कुमार ने मिटाने का काम किया। अगर वो अपनी कविताओं को बस उस कार्यक्रम में सुनाये तो व्यक्तिगत स्वार्थ समझ में आता है किंतु एक कविधर्म को निर्वहन करते हुये उन्होने अपने अग्रज कवि साहित्यकारों को मीडिया और दर्शकों के सामने लाने का सराहनीय काम किया है। जो साहित्यिक परंपरा का मूल भी है। मुझे लगता है कि कविता को किसी की बपौती नहीं मानना चाहिये। कवि कविता जग के लिये लिखता है। कवि के स्वर्गवासी होने के बाद कविता पर अगर उसके बेटे का अधिकार है उससे कहीं ज्यादा कवि वंश के हर रचनाकार का अधिकार है उससे कहीं ज्यादा पाठक वर्ग का अधिकार है जो हमेशा रहेगा। कवि धर्म कविपुत्र धर्म से ज्यादा श्रेष्ठ था है और रहेगा। अभिताब जी यह साहित्यिक अपरिपक्वता और कुमार विश्वास की यह साहित्यिक परिपक्वता ही थी कि इस विवाद को कोर्ट के दरवाजे तक पहुंचना पडा।"नेह का आह्वान फिर - फिर" का उत्स अगर अभिताब जी समझ जाते तो विवाद यह था ही नहीं भले वो बिग बी हो। पर इस बार एंगरी ओल्ड मैन की छवि बिग ब्रदर पर ज्यादा हावी रही। हमारा साहित्य और साहित्यिक विरादरी इस तरह की छवि का कट्टर विरोधी है।
अनिल अयान

सतनाकिसी की बपौती नहीं है कविता / कवि धर्म बनाम कविपुत्र धर्म
नाश के दुख से कभी/ दबता नहीं निर्माण का सुख/ प्रलय की निस्तब्धता से/ सृष्टि का नव गान फिर - फिर/ नीड का निर्माण फिर - फिर/ नेह का आह्वान फिर - फिर।  यह वो कविता है जो हरिवंश राय बच्चन ने अपनी कलम का दायित्व निर्वहन करते हुये लिखी थी। इस कविता तो कहा जाता है कि अन्य कविताओं की तरह उनके बेटे अभिताब बच्चन जी ने कापी राइट करा कर रखा हुआ था  और तर्पण कार्यक्रम में जब कुमार विश्वास ने साहित्यिक विश्वास के साथ इसको गाया और हरिवंश राय बच्चन जी को अपना साहित्यिक प्रणाम करके लोगों के सामने रखा साथ ही साथ उसका वीडियों यूट्यूब में अपलोड किया गया तब से  एक विवाद गहराया। अभिताब जी ने केश करके कुमार विश्वास को कानूनन नोटिस भेजा और उसका जवाब भी कुमार विश्वास ने अपने राजनैतिक अंदाज में देते हुये उसकी कमाई का बत्तीस रुपये अभिताब जी को वापिस कर दिया। क्या कविता का अपमान किया था कुमार विश्वास ने या कवि का अपमान किया गया। क्या स्व. बच्चन जी की कविता को चोरी करके अपने नाम से कुमार विश्वास ने दर्शकों के सामने रखा। अगर ऐसा नहीं था तो कापीराइट क्या साहित्यिक धर्म से बढ कर है। क्या साहित्यकार के पुत्र होने के नाते अभिताब जी का कुमार विश्वास जी के साथ कोई साहित्यिक और सामाजिक रिश्ता नहीं है। अगर है तो फिर कविता की बपौती के लिये कोर्ट का नोटिश मेरे जैसे कलमकार के गले नही उतरता।
      यह साहित्य और काव्य परंपरा के इतिहास का एक ऐसा विषय पैदा हुआ जिससे कई सवालात मन में जागृत हुए। समान्यतः यह देखा जाता है कि कवि सम्मेलनों मुशायरों  में संचालक कवि अन्य मसहूर कवि शायरों की रचनायें सम्मान के साथ पढते हैं गाते हैं और श्रोताओं तक पहुंचाते हैं। वो जिन कवियों और शायरों की कविताओं को पढते हैं बयाकदे उनका नाम तक लेते हैं। और ये वीडियों यूट्यूब में बाकायदे अपलोड किये जाते हैं ताकि वो कार्यक्रम यादगार बने। आज तक ऐसा नहीं हुआ कि इस तरह का केश किसी कवि ने दूसरे कवि पर किया हो कि तुमने एक नामी गिरामी कार्यक्रम में मेरी कविता मेरे नाम से क्यों पढी। एक कवि एक पाठक भी है और वह अगर अच्छी रचना पढता है उसे वह रचना पसंद आती है तब वह उसका प्रयोग उसके रचनाकार का उद्द्धरण देते हुये करने के लिये स्वतंत्र होता है। कमलकार की रचना तब तक वैयक्तिक है जब तक वह स्वांताह सुखाय के लिये लिख कर डायरी में कैद है। अगर वह प्रकाशित हो गई। या श्रोताओं के बीच आ गई तब से वह समाज की रचना हो जाती है। हर रचनाकार चाहता है कि उसकी रचनायें उसके नाम को मरने के बाद भी जग में अमर करती रहें।
      अब सवाल यह है कि क्या कविता कवि तो ठीक है उनके परिवार की पैतृक संपत्ति है। क्या गायत्री मंत्र श्लोक, राष्ट्र गान और राष्ट्रगीत आदि भी इसी तरह कापीराइट हो जाने चाहिये। अभिताब जी के अनुसार देखा जाये अगर ऐसे ही कापीराइट का सिस्टम चलता और उपर्युक्त मंत्रों श्लोकों के रचनाकार अगर जीवित होते और उन्होने  अगर हम सब पर केश कर दिया होता तो हम सब पाठकों और रचनाकारों की कहानी समाप्त हो चुकी होती। स्व. बच्चन जी ने यह  कभी नहीं सोचा होगा कि उनका सगा पुत्र अभिताब जी  उनके साहित्यिक पुत्र सम कुमार विश्वास के ऊपर उन्ही की रचना के प्रचार प्रसार के कारण केश कर देगें। एक पुत्र अपना पुत्र धर्म निभाने का भ्रम पाले बैठा है जिसका साहित्य से कोई वास्ता नहीं है जो बालीवुड और सरकार के ब्रांड एम्बेस्डरशिप के ना जाने कितने कांटेक्ट से जुडे हुये हैं। दूसरी तरफ उनके साहित्यिक पुत्र सम कुमार विश्वास उनकी मृत प्राय कविता को युवा और मीडिया के सामने ससम्मानपूर्वक लाकर अपने कवि धर्म को निर्वहन कर रहे है। तब भी वो गलत हो गये क्योंकि कानूनन अपने खून को अधिकार है कि वो अपने बाप के माल पर अपना अधिकार जमाये। भले ही वो कविता जैसा भावनात्मक शब्द शक्ति क्यों ना हो।  जिस कविता के भाव को लेकर कविता का गायन कुमार विश्वास ने किया वह जग हिताय था। कविता का मर्म हम समझ सकते हैं कि कविता अगर श्रृष्टि के नवगान का आह्वान कराती है तो वह नेह के प्रसार को भी आह्वानित करती है। अफसोस कि यह आह्वान उनके पुत्र नहीं समझ सके और बालीवुड की बाजारी सोच के चलते कविता को धार बनाकर एक कवि को कविता गाने के नाम पर कानून की बारीकियों के आमना सामना करना पडा। हम अगर स्व. बच्चन जी को निशा निमंत्रण और मधुशाला जैसी रचनाओं और कृतियों की वजह से जानते हैं इसमें अगर कुछ और इजाफा करने का काम कुमार विश्वास ने किया तो क्या गलत लिया।
      कुमार विश्वास ने भले ही आप राजनैतिक पार्टी में शामिल हुये हो। भले ही साहित्यिक जगत में उन्हें मंचीय कवि के रूप में जाना जाता हो। भले ही वो राजनीति में शामिल होकर विवादित रहे हो। किंतु कवि के रूप में उनकी ही प्रतिभा थी कि कवि सम्मेलनों की नीरसता को खत्म करने की सोच और साहित्यिक गीतों की परंपरा को उन्होने कालेज कैंपस और युवा मन के अंदर तक घर करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कुमार की लोकप्रियता ने कपिल के लाफ्टर शो को कवितामय कर दिया जो उस शो के इतिहास में पहली बार था। कुमार की कविता के प्रति वफादारी के चलते विभिन्न अवसरों में सिर्फ टीआरपी के पीछे अंधी दौड में दौडने वाले प्राइवेट चैनलों ने कविता को अपने दर्शकों तक पहुंचाने के लिये विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जिसमें कविता हुआ। कविता के साथ रचनाकार और रचना पर विमर्श हुआ। और साहित्य के प्रति एक नया दृष्टिकोण दर्शकों तक पहुंचा। यह सब काम करने के लिये अभिताब जी के पास वक्त ना होगा। इस सब से कुमार को अगर कुछ मूल्य मिल भी रहा है तो उनके जीविकोपार्जन के लिये नहीं है। वर्षों से चली आ रही एक कटु शिलालेख जिसमें यह कहा गया कि कविता या साहित्य पेट नहीं भरता सिर्फ प्रसिद्धि देता है, को कुमार ने मिटाने का काम किया। अगर वो अपनी कविताओं को बस उस कार्यक्रम में सुनाये तो व्यक्तिगत स्वार्थ समझ में आता है किंतु एक कविधर्म को निर्वहन करते हुये उन्होने अपने अग्रज कवि साहित्यकारों को मीडिया और दर्शकों के सामने लाने का सराहनीय काम किया है। जो साहित्यिक परंपरा का मूल भी है। मुझे लगता है कि कविता को किसी की बपौती नहीं मानना चाहिये। कवि कविता जग के लिये लिखता है। कवि के स्वर्गवासी होने के बाद कविता पर अगर उसके बेटे का अधिकार है उससे कहीं ज्यादा कवि वंश के हर रचनाकार का अधिकार है उससे कहीं ज्यादा पाठक वर्ग का अधिकार है जो हमेशा रहेगा। कवि धर्म कविपुत्र धर्म से ज्यादा श्रेष्ठ था है और रहेगा। अभिताब जी यह साहित्यिक अपरिपक्वता और कुमार विश्वास की यह साहित्यिक परिपक्वता ही थी कि इस विवाद को कोर्ट के दरवाजे तक पहुंचना पडा।"नेह का आह्वान फिर - फिर" का उत्स अगर अभिताब जी समझ जाते तो विवाद यह था ही नहीं भले वो बिग बी हो। पर इस बार एंगरी ओल्ड मैन की छवि बिग ब्रदर पर ज्यादा हावी रही। हमारा साहित्य और साहित्यिक विरादरी इस तरह की छवि का कट्टर विरोधी है।
अनिल अयान
सतना

शनिवार, 8 जुलाई 2017

बंदऊं गुरु पद पदुम परागा।


बंदऊं गुरु पद पदुम परागा।
गुरु का कोई दिन होता है क्या। गुरु तत्वज्ञान देने के लिये इस धरा में आता है और इसी तत्वज्ञान को प्राप्त करके शिष्य अपने पथ में आंगे बढकर अपनी मंजिलों को आसानी से प्राप्त कर लेता है। गुरु वेदव्यास से शुरू हुई यह परंपरा आज इस बाजारवाद के युग तक पहुंच चुकी है। पूर्णिमा में गुरु की वंदना करना भी अपने में एक वरदान से कम नहीं है। यह रीति वैदिक कालीन रही है। पुरातन गुरु को देवों से ज्यादा श्रेष्ठ स्थान दिया गया। वेद पुराणों से लेकर साहित्य के अन्य रचनाकारों ने अपने उद्धरणों में यह स्पष्ट कर दिया कि गुरु के बिन ज्ञान के सही रूप को ग्रहण करने की स्थिति में शिष्य़ कभी नहीं आपाता है। मेरे प्रिय संत कबीर ने कहा कि-सब धरती कागज करू, लेखनी सब वनराज।सात समुंद्र की मसि करु, गुरु गुण लिखा न जाए।।अगर मै इस पूरी धरती के बराबर बडा कागज बनाऊं और दुनिया के सभी वृक्षों की कलम बना लूं  सातो सामुद्रों के बराबर स्याही बना लूं तो भी गुरु के गुण को लिखना संभव नहीं है।गुरु भारतीय इतिहास में ऐसे होते थे। गुरु महिमा के लिये शिष्यों के पास शब्द कम पड जाया करते थे। गुरु का महत्व समाज से लेकर राष्ट्र तक बहुत ज्यादा होता था। राजा से लेकर वजीर तक गुरु को अपने से बढकर सम्मान देते थे। नरेंद्र को परमहंश ना मिलते तो वो स्वामी विवेकानंद नहीं बन पाते। हर व्यक्ति के जीवन में गुरु का एक विशेष स्थान होता है जो अन्य रिश्ते उसके जीवन से कभी भी नहीं छीन सकते हैं। मनुस्मृति में लिखा गया है कि जो आपको वेद पुराण की बातें बताये वही सिर्फ गुरु नहीं होता बल्कि वो भी गुरु की संज्ञा में आता है जिसने आपको जीवन जीने का मूल मंत्र कुछ छणों के साथ में बता दिया।
      किंतु परन्तु आज के समय में गुरु का वर्चश्व और अस्तित्व भी जैसे कालग्रास में समा गया है। गुरु और शिक्षक को एक ही तराजू में तौलने की परंपरा ने गुरु की गुरुता को और हल्का कर दिया है। गुरु का स्थान अगर स्कूल कालेज में पढाने वाले शिक्षक ले लेंगें तो गुरु का सर्वव्यापी व्यक्तित्व ग्रहण के प्रभाव में आ जायेगा। आज के समय में गुरु के भेष में संपर्क में आने वाले व्यक्ति ढॊंगी और महत्वाकांक्षी होते हैं। औसतन यह देखा गया है कि गुरु का त्रिकाल दर्शी व्यक्तित्व अपने क्षितिज की ओर जा रहा है।-गुरु लोभी शिष लालची, दोनों खेले दांव।दो बूड़े वापूरे,चढ़ि पाथर की नाव।आज के समय पर गुरु लोभी और शिष्य लालची हो गये हैं। दोनों खुद को इतना ज्यादा विद्वान समझते हैं कि दोनों एक दूसरे पर दांव खेलने की कोशिश करते हैं और दोनों इस दांव के चक्कर में पडकर पत्थर से बनी नाव पर बैठ कर जल श्रोत को पारकरने की जिद करते हैं। इतना ही नहीं है बल्कि गुरु और शिष्य की जोडी भी हास्यास्पद हो चुकी है। जरा इस दोहे को देखिये-जाका गुरु आंधरा, चेला खरा निरंध।अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फंद। जहां गुरु ज्ञान से अंधा होगा वहां चेला तो उससे भी बड़ा साबित होगा। दोनों अंधे मिलकर काल के फंदे में फंस जाते है।वर्तमान में गुरु अगर मां है तो मां का आदर समाज में कम हुआ है। गुरु अगर आपका अग्रज है तो वह अपने अग्रज होने को भूल रहा है। समाज में गुरु की स्थिति महज पुस्तकीय ज्ञानार्जन प्रदान करना ही रह गया है। विद्यालयों को बाजार में उतार दिया गया है जिसमें ज्ञानार्थ कोई आना नहीं चाहता और सेवार्थ कोई जाना नहीं चाहता। गुरु पूर्णिमा के इस अवसर पर अगर हम धार्मिक गुरुओं की बात करें तो कभी बालकांड में इन पंक्तियों में सार्वकालिक गुरु की वंदना की गई थी जिसकी सार्थकता को यह जग बखूबी जानता है। बंदउं गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर। मैं उन गुरु महाराज के चरणकमल की वंदना करता हूं, जो कृपा के समुद्र और नर रूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूपी घने अंधकार का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं।
      आज कल इस देश के अधिकतर गुरु अपने शिष्यों को कथायें सुनाते हैं पर उनकी वाणी तत्वाज्ञान से कोसों दूर रहती है। सच तो यह है कि वह कथाप्रवचक है कि ज्ञानी महापुरुष। यह लोग गुरु की सेवा का संदेश इस तरह जैसे कि हैंण्ड पंप चलाकर अपने लिये पानी निकाल रहे हैं। कई बार कथा में यह गुरु की सेवा की बात कहते हैं।सच बात तो यह है गुरुओं को प्रेम करने वाले अनेक निष्कपट भक्त हैं पर उनके निकट केवल ढोंगी चेलों का झुंड रहता है। आप किसी भी आश्रम में जाकर देखें वहा गुरुओं के खास चेले कभी कथा कीर्तन सुनते नहीं मिलेंगे। कहीं वह उस दौरान वह व्यवस्था बनाते हुए लोगों पर अपना प्रभाव जमाते नजर आयेंगे या इधर उधर फोन करते हुए ऐसे दिखायेंगे जैसे कि वह गुरु की सेवा कर रहे हों। गुरु के स्थान को जहां पर वेद पुराण और धर्म ग्रंथों को समाज तक पहुंचाने के माध्यम के रूप में जाना जाता था वहीं आज कुछ आख्यानों और कपोल कल्पित लोक कथाओं के आधार पर पूरी की पूरी सप्ताह खत्म कर देते हैं। जिन गुरुजनों ने वास्तविक रूप से धर्मग्रंथों की रिचाओं को समाज तक सही रूप से पहुंचाया है वह देश विदेश में गुरुता को विश्व विख्यात कर रहे हैं परन्तु यह संख्या विरली ही है। हमारे यहां गुरु पूर्णिमा में लगे हाथ उन गुरुओं की भी पूजा हो जाती है जिन्होने गुरु का चोला ओढा और मठाधीश बनकर मोटी मलाई की चिकनाई का आनंद उठा रहे हैं। और खुद को इस चिकनाई से फिसलने से बचा भी नहीं पाते। बहरहाल इस बात का संतोष है कि विरले ही सही परन्तु समाज में ऐसे व्यक्तिव मौजूद तो हैं। धीरे धीरे इस बाजारवाद ने अगर इन गुरुओं को अपना ग्रास ना बनाया तो निश्चित ही गुरु वंदना और पूर्णिमा की सार्थकता और सर्वव्यापकता भविष्य में भी बनी रहेगी।
अनिल अयान,सतना


रविवार, 2 जुलाई 2017

दुश्मनी के बीच दोस्ती

दुश्मनी के बीच दोस्ती

विगत दिनों रूस में आयोजित एक कार्यक्रम में जब भारत के पीएम मोदी जी ने यह कहा कि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद होने के बावजूद पिछले ४०-५० साल से बार्डर पर एक भी गोली नहीं चली है। इस बयान के आने पर चीन और वैश्विक जगत में खूब प्रशंसा हुई भारत की उदारता की। दुनिया भर को यह लगने लगा कि भारत चीन अपने विवादों को बातचीत से निपटाने में सक्षम हो चुका है। इस बात को लेकर हमारे पीएम मोदी जी की खूब पीठ थपथपाई गई। परन्तु भारत और चीन सिक्किम सीमा पर सोलह जून से आमने सामने है। सिक्किम भूटान और तिब्बत के जंक्शन में सिलीगुडी के चिकन नेक एरिया को चीन की सेनाओं ने अपने कब्जे में लेने की कोशिश की। इस इलाके को चंबी घाटी कहा जाता है जो भारत को तिब्बत और भूटान से जोडने का काम भी करता है। इस पहाडी इलाके को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत चलती रही है और २४ दौर की बातचीत के बाद भी यह मुद्दा अभी अनसुलझा रहा। सोलह जून के बाद इस इलाके में रोड का काम शुरू कर दिया था भूटान और भारत के सैनिक इसका विरोध किये भी किंतु चीन की ताकत अधिक होने की वजह से यह विरोध असफल रहा है। वास्तविकत यह है कि भारत के सिलीगुडी कारीडोर में भारत के पूर्वोत्तर राज्य अन्य देशों के साथ जुड जाते हैं
उधर दूसरी तरफ चीन इस क्षेत्र को  सडक मार्ग से जोडकर  भारत के पूर्वोत्तर को घेरना चाहता है। इसी बात का विवाद जारी है। जो भारत के चीन विवाद को और बढाता है। इसके पूर्व में सिक्किम में नाथुला के रास्ते से जाने वाली मान सरोवर यात्रा को इसलिये रोक दिया क्योंकि सीमा विवाद दोबारा अपने चरम पर रहा था।
यह तो कुछ उदाहरण हैं किंतु सबसे बडे विवाद तिब्बत क्षेत्र जो एक बफर जोन का काम करता है। अक्साई चिन रोड जो लद्दाख इलाके में बन रही है इसमें वो जम्मू काश्मीर के उस इलाके को अपने कब्जे में रखना चाहताहै जो वो अपना मानने की कोशीश कर रहा है। अगला विवाद तो सीमा है जिसमें तीन हजार किलोमीटर की सीमा पर स्पष्ट मत नहीं है। अरुणाचल प्रदेश पर भी वो दावा जताता चला आया है और भारत के साथ उसकी इस मामले में एक भी नहीं बैठती।  ब्रह्म्पुत्र पर बना चीन का बांध और हिंद महासागर में पाकिस्तान म्यामार और श्रीलंका के साथ साझेदारी में प्रारंभ हुई परियोजनायें भारत के लिये सिर दर्द बन चुकी हैं। पाक अधिकृत काश्मीर और गिलगित बालटिस्तान में चीन की गतिविधियां तेज हुई है। चीन में साउथ चाइला सी इलाके में भी अपना वर्चश्व जारी रखा है यहां उसे म्यामार जापान और फिलीपींस से चुनौती मिली भी परन्तु सब व्यर्थ का मामला ही शाबित हुआ। इस तनाव पर असम के राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित ने अपने बयान में यह भी जता दिया कि भारत से चीन कई मामलों में ज्यादा ताकतवर है। इस बात की सत्यता भी है कि भारत से चीन की सैन्य शक्ति ज्यादा मजबूत है। हमारे पीएम चाहे जितना भी कोशिश कर लें खुद को सौहार्द के प्रतिमान बनने की परन्तु जमीनी हकीकत कुछ अलग ही है।
समय रहते अगर हमारा देश अपने निर्णय नहीं लेता तो यह स्थान चीन के कब्जे में चला जायेगा। हमारे पीएम सिर्फ विदेशों में इसी बात का दंभ भरते रह जायेगें कि। हमारा पाक और चीन के साथ सौहार्द पूर्ण संबंध हैं। इस तरह की उदारबादिता का अस्तित्व क्या है वह समझ के परे है। हम सबको पता है कि हमारे संबंध पाकिस्तान और चीन के साथ कैसे हैं। हमारा इन देशों के साथ ऐतिहासिक रूप से किस तरह के विवाद रहे हैं जो आज भी नहीं सुलझ सके हैं। इसके बावजूद हम तिब्बत और भूटान के साथ खडे होने के साथ साथ चीन की तारीफ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर करते हैं और यह सोचते हैं कि इसी बहाने चीन हमारी पीठ थपथपायेगा जो सरासर दोमुही राजनीति है। इससे हम भले ही उदारवाद के मसीहा बन जायें किंतु हमारी सेना और उनका संघर्ष शून्येत्तर हो जायेगा।इस लिये आज आवश्यकता है कि चीन की विरोधी ताकतों का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी जवाब देना और दोटूक तरीके से सीमा के विवादों में अपने को स्थापित करना बिन पेंदी के लोटे की तरह अगर चीन की तरफ और अन्य देशों की तरफ एक ही तरह की हिमाकत होती रहेगी तो अपना अस्तित्व खतरे में होगा। चाइना को आइना दिखा अति आवश्यक है।
अनिल अयान,सतना

रविवार, 25 जून 2017

एक देश-एक टैक्स के साथ जीएसटी का आगमन

एक देश-एक टैक्स के साथ जीएसटी का आगमन
सुना है जीएसटी को १५ अगस्त १९४७ से जोड कर देखा जा रहा है। जिस तरह उस समय जश्न मनाया गया था उसी तरह जीएसटी के आगमन का स्वागत किया जायेगा। एक समान टैक्स व्यवस्था को लागू करना ही देश का प्रमुख लक्षय होगा। तीस जून को जीएसटी काउसिंल की की बैठक होना तय हुआ है।अभिताब बच्चन को इस कार्यक्रम का ब्रांड एम्बेसडर बनाया गया है। चालीस सेकेंड का वीडियो इस संदर्भ में पहले से ही जन मानस में जारी किया जा चुका है। यह तो तय है कि जीएसटी एक ऐतिहासिक टैक्स रिफार्म के रूप में व्यवसाइयों के सामने आयेगा। जीएसटी के चलते सभी व्यवसाइयों का पंजीकरण अनिवार्य हो जायेगा। सेवा क्षेत्र में काम करने वालों का भी इसमें पंजीकरण सुनिश्चित किया गया है। परन्तु इसमें भी जीएसटी परिषद ने इस गुड्स और सर्विसेस टैक्स को तीन भागों में बांट दिया है पहला टैक्स सीजीएसटी है जहां केंद्र सरकार द्वारा राजस्व एकत्र किया जायेगा। एसजीएसटी जहां पर बिक्री हेतु राज्य सरकारें राजस्व एकत्र करेंगी। आईजीएसटी इसके अतर्गत अंतर्राज्यीय बिक्री के लिये केंद्र सरकार द्वारा राजस्व एकत्र किया जायेगा। इस व्यवस्था में यहां तक प्रावधान है कि इसमें ना पंजीयन कराने वाले व्यवसाइयों को टैक्स तो है ही साथ ही साथ टैक्स का भुगतान ना करने वाला या कम भुगतान करने वाला भी अपराधी माना जायेगा जिसके चलते उसे दस प्रतिशत से १०० प्रतिशत तक सशर्त जुर्बाना देना होगा और सजा का प्रावधान भी होगा। इस व्यवस्था से पूरा का पूरा व्यापारी जगत सदमें में हैं।
सेल टैक्स विभाग ने हर जगह पर अपने जागरुकता शिविर लगाकर जीएसटी के बारे में जागरुकता फैलाने का काम कर रहा है। किंतु व्यापारियों के मन में अब भी बहुत से संसय बरकरार है। उन्हें इस बात का संतोष है कि अब उन्हें कर पर कर की प्रथा से मुक्ति मिलेगी।उन्हें सत्रह प्रकार के टैक्स से निजात मिल जायेगी। लेकिन अगर इसका उल्टा प्रभाव बाजार में पडा तो व्यापारियों का संचित धन भी सरकार जब्त कर लेगी। व्यापारियों का मानना है कि जीएसटी में बदलाव करना चाहिये। इसमें सजा की बजाय पेनाल्टी बढाने पर विचार करना चाहिये। क्योंकि उनका मानना है कि बाजार में जिस तरह की गला काट कांपटीशन चल रहा है वह व्यापारियों को गल्ती करने के लिये मजबूर कर देता है। परन्तु इस गल्ती के लिये अगर सरकार और न्यायालय और प्रशासन से लडकर सजा को बचाने के लिये वो संघर्ष करेंगें तो अपना व्यापार कब करेंगें। व्यापारी वैसे भी देश की जीडीपी बढाने में अपना अहम योगदान देता है और इस योगदान के बदले सजा की शिफारिस सरासर गलत है। देश के अर्थ विशेषज्ञ यह मान रहे हैं कि देश में जीएसटी लागू करना अपने में एक जटिलतम काम होगा इस सरकार के लिये। क्योंकि नोट बंदी की तरह इसके परिणाम अगर निकल आये तो देश की व्यवस्था और कर प्रणाली को सम्हालना बहुत ही मुश्किल हो जायेगा।
जीएसटी के लिये अब भी एक दर्जन से ज्यादा नियमावलिया अधिसूचित करना है। इससे संबंधित साफ्टवेयरों की तैयारी जिससे यह व्यवस्था सुचारु रूप से संचालित की जायेगी। मानव संसाधनों को नियुक्त करना उन्हें सही तरीके से प्रसिक्षित करना। करों के रिटर्न भरने के लिये विषय विशेषज्ञों की टीम तैयार करना। जैसी अनेकानेक प्रायोगिक चुनौतियां हैं जिसको अभी पूरा होना बांकी है। प्रशासन का माने तो यह सुनने में आता है कि जीएसटी का बैक इंड साफ्टवेयर अब तक पूरी तरह से तैयार नहीं हो सका है। विभागीय अधिकारी इसी के द्वारा इस व्यवस्था को नियंत्रित करेंगें। इसके अभाव में पूरा सिस्टम कैसे काम करेगा। नियमावलियों  की सूचियां अब तक देश भर के प्रोफेशनल लोगों संबंधित संगढनों को नहीं पंहुचाया गया है। टैक्स प्रोफेशनल्स की उलझन और व्यापारियों की उलझन के बीच में सरकार जिस तरह से इस व्यवस्था को लागू करने की जल्दबाजी कर रही है वह मात्र अपने कार्यकाल में इस व्यवस्था को अपने खाते में जमा करने की कोशिश मात्र है। वित्त मंत्री भले ही दो टूक  कह दें कि एक जुलाई से जीएसटी लागू पूरे देश में लागू होगा। और सभी को अपना पूर्णतः सहयोग करना होगा। किंतु इस सब के बीच सरकार की आंतरिक तैयारियां भी अपूर्ण हैं। एसोचैम और अखिलभारतीय व्यवसायी संघ की माने तो तो वो और सरकार पूरी तरह से इस व्यवस्था के लिये तैयार नहीं हैं। राजनैतिक श्रेय लेने की होड में सरकार  व्यवहारिक जटिलताओं  को पूरी तरह से नजरंदाज कर चुकी है। इंटरनेट कनेक्टिविटी भी अधिक्तर व्यापारियों और टैक्स प्रोफेशनल्स के लिये सिरदर्द है। इसी से जीएसटी में टैक्स रिटर्न फार्म भरे जाने की राह सुनिश्चित होगी। इन सब के बीच सरकार का मानना है कि जीएसटी सुव्यवस्थित अर्थव्यवस्था को प्रदान करेगी। परन्तु यह सुनिश्चित तब होगा जब इससे जुडे अंग सुचारू रूप से काम करेंगें।अब तो आने वाला समय बतायेगा कि जुलाई की बरसात सरकार के लिये फायदे की सौगात लेकर आयेगी या व्यवसाइयों और देश की आम जनता को भी इसकी फुहारों में भीगकर खुशियां मनाने का मौका मिलेगा।
अनिल अयान,सतना


रविवार, 4 जून 2017

वाह रे! भारत की कृषि प्रधानता

वाह रे! भारत की कृषि प्रधानता

पिछले कुछ महीनों से देश की कृषि प्रधानता और इसका सम्मान दांव में लगा हुआ है। वजह हम सबसे अलग नहीं हैं। कभी जय जवान जय किसान के नारों से देश का किसान खुश होकर खेती किसानी करता था। आज वही किसान अपने अस्तित्व के लिये लिये जीवन संघर्ष कर रहा है। कृषि के नाम पर बतोलेबाजियों का मंच सजाया जा रहा है। कृषकों को आश्वासनों के भरोसे दिलाए जा रहे हैं। पार्टियां किसानों को वोट बैंक के रूप में बना कर अपने बैंकों में गिरवी रख चुकी हैं। तब भी हम देश के अंदर विदेशी निवेश करने की बात करके दंभ भरते हैं। जिन किसानों के दम पर राज्यों को पुरुस्कार आवंटित किये जाते हैं। वही राज्य किसानों की माली हालत के लिये जिम्मेवार होते हुए भी मौन रह जाते हैं।इस सब तथ्यों का गवाह विगत गुजरे महीनों में किसान आंदोलनों की लंबी फेहरिस्त है। हमारा अन्नदाता उपज बनाकर भी बदहाल है।सरकार की अन देखी के चलते महाराष्ट्र में इस वर्ष आंदोलन ने आग की तरह राज्य को अपने कब्जे में ले लिया। दूध से लेकर फल सब्जियां तक सडक में फेंक दिया गया। इस आंदोलन के पूर्व छत्तीसगढ में टमाटर के लिये यही संघर्ष किसानों के द्वारा किया गया था। जब टमाटर को सरकार ने पचास पैसे प्रति किलो में खरीदना शुरू कर दिया। तमिलनाडू में तो किसानों जिस आंदोलन प्रारंभ किया उसका नमूना हमने  दिल्ली तक में देखा। बैंक से ऋण माफी की मांग कर रहे ये किसान तमिलनाडू से दिल्ली तक का सफर करने के लिये मजबूर हुये। किसान आंदोलनों में तेलंगाना के किसानों ने मिर्च की फसल को आग के हवाले कर दिया ताकि उन्हें फसल के सही मूल्य मिल सके महाराष्ट्र में किसानों ने अपनी स्थितियों से निजात पाने के लिये  उग्र आंदोलन किये। साथ ही साथ अपनी उपज को सडक में फेकने का काम किया। अभी अभी मध्य प्रदेश में विशेष कर पश्चिमी मध्य प्रदेश में  फसल और उत्पाद के वाजिब दाम ना मिलने  की वजह से आर्थिक संघर्ष किया वह हमारी कृषि प्रधानता के लिये यक्ष प्रश्न खडा करता है। इंदौर उज्जैन शाजापुर मालवा धार सहित कई ऐसे जिले थे जिनके किसानों की फसलों, फलों, सब्जियों, दूध सामग्रियों को सही बिक्री करने का मौका नहीं दिया गया। सरकार की तरफ से भलेही वित्त मंत्री ने किसानों के संगठनों से अपील की संवाद करके चर्चा करके हल निकाला जाये। परन्तु सरकारों के हल किसी स्थाई निदान की ओर किसानों को  क्यों नहीं ले जाते हैं यह चिंतन का विषय है।
     किसानों को बोवाई के समय यह पता ही नहीं होता कि इस मौसम में फसल का उत्पादन कैसा होगा।कम हो या ज्यादा दोनों तरफ से किसानों की मरन हैं। ज्यादा उत्पादन होने पर किसानों के पास उचित भंडारण की व्यवस्था नहीं होती और कम उत्पादन होने पर कर्ज देने वालों और बैंको के नुमाइंदे उन्हें जीने नहीं देते है। अनुदान के नाम पर सरकारी आलाअफसर उनसे नोंचते खसोटते हैं। समाधान के लिये सरकार के पास आवश्यकतानुरूप साधारण और वातानुकूलित वेयरहाउसेस नहीं हैं। परिवहन की व्यवस्था नहीं हैं। फूड प्रोसेसिंग के नाम पर मात्र कूछ इकाइयों से उत्पादन लिया जा रहा है। फूड प्रोसेसिंग से किसानों को दूर रखा जा रहा है शायद डर है कि किसान ज्यादा आत्म निर्भर ना हो जाये। किसान और उसके परिवार के सदस्यों को जीविकोपार्जन के लिये समुचित व्यवस्था और योजना का प्रचार प्रसार सही ढंग से नहीं किया जा रहा है। हमारी सरकार के पास फूड सिक्योरिटी और प्रोसेसिंग बिल के लिये समय है परन्तु फूड प्रोसेसिंग की इकाइयों को ग्रामीण अंचलों में आवश्यकतानुसार स्थापित करने और उससे उत्पादन लेने ले लिये समय नहीं है। स्वामीनाथन जी से सिफारिशों को मांग कर फाइलों में सुरक्षित रख लिया गया है। किसानों की उपज का दोगुना दाम दिलवाने का वायदा वायदा ही क्यों रह गया। किसानों की आत्महत्याएं और आंदोलनों का प्रतिशत इतनी तेजी से क्यों बढ गया। किसान अपनी मेहनत से उगाई फसलों फलों और सब्जियों को बिना किसी उम्मीद के सडक में फेंकने के लिये क्यों मजबूर है। कृषि कर्मण अवार्ड को हासिल करने वाली सरकार आज अपने किसानों के लिये त्वरित कार्यवाही के रूप में क्या निर्णय ले रही है। हर राज्य में एक समान स्थिति पर केंद्र और राज्य सरकारें आपस में तादात्म बिठाकर एकल निर्णय लेने में अक्षम क्यों हैं। ऐसे ना जाने कितने प्रश्न हैं जो आज भी निरुत्तर ही हैं। इनके जवाब जब आकाओ के पास नहीं हैं तो किसानों के पास कैसे होगा।
     हर साल बारह से पंद्रह हजार किसान कृषि प्रधान देश की छत्र छाया में आत्महत्या कर रहे हैं।यह सरकारी आंकडे हैं व्यवहारिकता तो इससे कहीं ज्यादा है। इसके बावजूद सरकार और प्रशासन को मूल तीन कारकों पर काम करने की आवश्यकता है। जिससे खेती से पहले पहल लागत निकले और फिर लाभांश के लिये कदम बढाये जा सकें। इन कारकों उत्पादन को सही ढंग से परिवहन करके भंडारण करने ली व्यवस्था सरकार मुहैया कराये,नहीं तो ग्रामीण और कस्बाई अंचलों में पंचायत स्तर पर इन भंडार ग्रहों का  निर्माण हो। किसानों को सही मूल्य बिक्री का मिले। दूसरा मूलभूत फसलों के साथ उसको विभिन्न उत्पादों में परिवर्तित किया जा सके। फूड प्रोसेसिंग इकाइयों की स्थापना करना, श्रम के लिये किसानों के परिवारों का सहयोग लेकर उन्हें प्रशिक्षित करना, उनकी आमदनी बढाने के लिये सहयोग करना। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारक है देशी और विदेशी बाजार की उपलब्धता। इसके लिये सरकार को अपने पडोसी देशोंके साथ साथ अन्य महाद्वीपों के देशों से अच्छे संबंध बनाकर निर्यात नीति को परिवर्धित करने की आवश्यकता है। यदि यह सब सही ढंग से चलता रहेगा तो किसान की आमदनी दो गुनी से ज्यादा कई बढाई जा सकती है। वेयर हाउसेस, कोल्ड स्टोरेज, फूड प्रोसेसिंग, और अंतर्राष्ट्रीय बाजार का विपणन की तरफ सरकार को ध्यान देना होगा। वर्तमान में जैविक खेती, जैविक फसलॊं, और बायोटेक्नालाजी के अनुरूप फसल उत्पादन के लिये किसानों को अगले क्रम में उच्च गुणवत्ता वाले बीजों के वितरण पर भी मंत्रालय को विचार रहा होगा।जेनेटिकली माडीफाइड फसलों को अपनाने के साथ अपने पुस्तैनी बीजों के प्रयोगों को भी प्रोत्साहित करने से कृषि प्रधानता का ग्राफ बढेगा। कांटेक्ट फार्मिंग के तहत किसान के परिवारजनों को भरपूर रोजगार और जीविकोपार्जन का अवसर प्रदान करने में सरकार को आंगे आना होगा। नाम मात्र का कर्ज माफी, अनुदान देना, जीरो ब्याज पर कर्ज की सुविधा प्रदान करना आदि कारनामें कुछ समय के लिये किसानों को आकर्षित कर सकते हैं किंतु स्थाई निराकरण नहीं प्रदान कर सकते हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था का अधिक्तर भाग, उद्योगों का अधिकतर प्रतिशत कृषि आधारित है। कृषि कृषक और कृषि प्रधानता का राजमुकुट तभी बचेगा जब किसान अपने जमीनी स्तर पर तरक्की करेंगें। उन्हीं से जल जंगल जमीन गांव खलिहान और ग्रामीण संस्कृति सुरक्षित है। किसानों को वोट मानना बंद करके सोने का अंडा देने वाली धरोहर मानेंगें तो पूरा देश तरक्की करेगा।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

     

मंगलवार, 23 मई 2017

नक्सलवाद : आंतरिक सुरक्षा के लिये मीठा जहर

नक्सलवाद : आंतरिक सुरक्षा के लिये मीठा जहर
सुकमा में हुई दर्दनाक घटना भारत के राज्यों के लिये कोई नई नहीं थी। इसके पूर्व भी नक्सलवाद ने हमारी आंतरिक सुरक्षा को तार तार करने की कोशिश की है। देश में हर दिशा में जवान शहीद हो रहे हैं। परन्तु हम इसके लिये सिर्फ आतंकवाद की तरह ठोस कदम उठाने की बात करके कुछ समय के बाद मौन होने के आदी हो चुके हैं। आज हमारे देश में सरकारी व्यवस्थाओं के साथ भारी भरकम बजट है। पर वह इस मामले में नगण्य है। पुलिस और सेना के जवानों की मौत का बढना, रेल संचालन में  नक्सलवाद से उत्पन्न छति, स्थानीय इलाकों में नक्सली कर्फ्यू और इसकी वजह से समाज में होने वाली छतियां लगातार जारी है।राजनीतिज्ञों की मंहगी बैठकें भी इसका हल क्यों नहीं निकाल पाती हैं। यह प्रश्न तब से लेकर आज तक उसी तरह बरकरार है। कभी कभी तो लगता है कि  कम्यूनिस्ट अगर ना होते तो नक्सलवाद का उद्भव ही ना होता। साठ के दसक में चारू और कानू सान्याल जैसे कम्युनिस्टों के अनौपचारिक आंदोलन की वजह से नक्सलबाडी स्थान से इसका उदय हुआ। दोनों चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग से काफी प्रेरित होने के कारण मजदूरों और किसानों के लिये सशस्त्र क्राति का  प्रारंभ किया। इतना ही नहीं सरसठ सन के समय पर तो नक्सलवादियों ने कम्यूनिस्ट क्रांतिकारियों की अखिल भारतीय समन्वय समिति भी बनाई थी। बाद में खुद को इन्होने कम्यूनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया। समय दर समय के बाद ये संगठन अब  वैधानिक राजनैतिक पार्टी के रूप में काम भी करने लगे। इसकी मार आंध्राप्रदेश, छत्तीसगढ, उडीसा , झाडखंड और बिहार में सबसे अधिक पडी और आज भी जारी है।
आज के समय पर राज तंत्र का हाल यह है कि आरक्षण हाबी है, सरकारी नौकरियों में दलाली फल फूल रही है, कृषि नीतियां किसानों की आत्महत्याओं का नाच देख रही हैं। छोटे उद्योगें को बडे उद्योगें ने निगल लिया है। उदारीकरण मजबूरी बन गया है। तब भी हम नक्सलवाद की आंतरिक विषमता को मारने का प्रण लेने साहस कर ही बैठते हैं। हमारा तंत्र गरीबों के लिये कहीं ना कहीं मीठे जहर के रूप में जिस तरह काम कर रहा है वह नक्सलवाद के लिये भोजन बन कर पहुंचता है। आज के समय में नक्सलवाद माओवाद और आतंकवाद से ज्यादा खतरनाक रूप ले लिया है। बस्तर में उनकी समानांतर सरकार, माफियाओं की चीन द्वारा प्रायोजित  माओ सरकार से ज्यादा खतरनाक है यह सरकार। हमारे देश को छोडे तो श्रीलंका में , म्यामार में, नेपाल में, जो कुछ देखने को मिल रहा है वह गृह युद्ध, दमन चक्र, माओवादी हिंसा, सब सत्ता पाने के लिये कटे मरे जा रहे हैं, और और तो और भोले भाले पिछडे युवकों को अपनी सेना में शामिल कर रहे हैं। सत्ताधारियों की दोमुही हिंसा ही नक्सलवादियों को  रक्तहिंसा करने के लिये प्रेरित करती है। इसके पीछे जितने कारण हैं वह सब शासन की नीतियों पर आधारित हैं अनापेक्षित महत्वाकांक्षाओं का बढना,शोषण की हद को पार करना, विषमता, योजनाओं का गोल मोल होना,लचीली कानून व्यवस्था, मंहगी शिक्षा और किताबी ज्ञान को बढाना, जनता में प्रतिकार का आभाव सहित ना जाने कितने अप्रत्यक्ष कारण हैं जो नक्सलवाद को गरीबों के मन , पिछडों की ताकत में घोलने का काम करते हैं। हम आदिवासियों और पिछडों को अभावग्रस्त स्थिति में छोड कर  वेदांता, टाटा और एनएमडीसी जैसी कंपनियों को उत्खनन की इजाजत दे रहे हैं। स्थानीय आदिवासी खुद और सरकार के बीच अपने सम्मान और आजीविका के लिये संघर्ष का आंदोलन नक्सलियों की मदद से छेड देते है। नक्सलियों के कंगारू कोर्ट और उनके निर्णय जिसमें  दोषी को ताबडतोड सजा दी जाती है, भले वो देश की सेना और राजनीतिज्ञ ही क्यों ना हो, ज्यादा प्रिय लगता है। प्रेसर बंब, आरडीएक्स विस्फोटक, बारूदी सुरंगों के इस्तेमाल में नक्सलवादियों की मदद ये आदिवासी युवा ही करते हैं। यह तो एक उदाहरण है।
यदि हम चाहते हैं कि नक्सलवाद कम हों तो जरूरी है कि राजनैतिक ताकतों को हर वर्ग के प्रति ईमानदार होना होगा। हर वर्ग के अधिकारों और सुखद भविष्य की चिंता करनी होगी। कानून व्यवस्था और न्याय को त्वरित करना होगा। आदिवासियों और पिछडों की साक्षरता को जीविकोपार्जन से जोडना होगा। ग्रामीण धारा से जुडे छोटे उद्योगों को विकसित करना होगा। प्राकृतिक संपदा को  बिचौलियों से बचाना होगा। छद्म राजनैतिक घरानों पर रोक लगानी होगी जिसके चलते व्यक्तिगत राजनैतिक स्वार्थ वश किसानों पिछडों मजदूरों आदिवासियों का शोषण किया जा रहा है। उन देशों से पूरी तरह से संबंध तोडना होगा जो देश की आंतरिक सुरक्षा को नक्सलवाद माओवाद, आतंकवाद जैसे औजारों से छिन्न भिन्न करने की फिराक में रहते हैं। जो सामने से गले लगते हैं और पीछे से छूरा घॊंपते हैं। हमारे समाज से अगर शोषितों का वर्ग कम होगा तो नक्सलवाद खुद बखुद गुठने टेक देगा। यदि हमारी सरकारें  सबको जीने और समान विकास करने का अवसर ईमानदारी से प्रदान करे तो ऐसी आंतरिक सुरक्षा विरोधी विचारधारायें और रक्तिम हिंसात्मक आंदोलन दम तोड देंगें।
अनिल अयान सतना

९४७९४११४०७

फांसी से ना निकलेगा ये फांस

फांसी से ना निकलेगा ये फांस
दिसंबर सन बारह के उस निर्भया कांड का फैसला सुप्रीम कोर्ट के द्वारा विगत दिनों आ गया। इस फैसले के लिये उस समय से लेकर आज तक पूरे देश में रैलियां, प्रदर्शन, विरोध, आंदोलन किये गये। कोर्ट के रास्ते में इतने साल लग गये कि देखते ही देखते समय ने अपने पर लगा लिये। परन्तु इस घटना से हर जेहन में कई सवाल उठते होंगें जिसके केंद्र में बहन बेटी और महिला का हर वो रिश्ता होगा जो आज खतरे में सहमा है। ऐसा नहीं है कि निर्भया कांड के बाद जो कानून बने वो इस तरह की बलात्कार की घटनाओं को रोक लिये. दिल्ली बस में बलात्कार का प्रतिशत इस कानून के बनने के बाद बढा है। परन्तु पूरी दिल्ली इस मामले में मौन है। उनके पास कोई जवाब नहीं है। हम बलात्कार ना हो इस लिये कोई रास्ता निकालते नहीं है बल्कि बलात्कार होने के बाद पीडिता को न्याय दिलाने के लिये और आरोपियों को सजा दिलाने की बात पर बहस बाजी करते हैं। यदि हम समाज में बलात्कार को रोकने के कदम उठायें तो दूसरा काम न्याय और आरोपियों तक मामला ही ना पहुंचेगा। सवाल यह उठता है कि कोर्ट के द्वारा दी गई फांसी की सजा बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को रोक सकेगी।
आज देश में तेरह साल बाद बलात्कार के आरोपी को फांसी की सजा दी गयी। इस के पूर्व अंतिम फांसी सन २००४ में बंगाल के धनंजय चटर्जी को कोलकाता में एक पंद्रह वर्षीय स्कूली छात्रा के साथ किये गये बलात्कार के लिये दी गयी। वो भी १४ वर्ष तक दलीलों और याचिकाओं के बाद यह निर्णय आया था। आज दो हजार सत्रह में किसी मामले में पांच साल बाद फांसी का निर्णय आया है। अब यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारा कानून और न्यायालय बलात्कार के लिये फांसी की सजा के लिये खुद को कितना अव्यवस्थित समझता है। सबसे अहम बात यह है कि सन बारह में पीडिता की मृत्यु के बाद यह मामला कुछ महीनों के बाद ही फाइलों में बंद हो गया था.किंतु मार्च सन पंद्रह में डाक्यूमेंट्री फिल्म इंडियाज डाटर जिसे लेस्ली उड्र्विन ने निर्देशित किया था। भारत की न्याय व्यवस्था में खलबली मचा दी। इस में दोषी मुकेश के बयान को फिल्म में स्थान दिया गया।यूट्यूब से लेकर बीबीसी में इसे प्रसारित किया गया।मुकेश के घिनौने बयान ने दोबारा जनाक्रोश को उच्चतम शिखर तक पहुंचा दिया। उस समय भारत सरकार ने इसके प्रसारण पर रोक लगाने की अपील की परन्तु उसके पहले ही इसे लाखो यूजर्स देख चुके थे। यह फिल्म भी निर्भया कांड पर पूरी तरह से आधारित थी। इसने न्याय की मांग को और तीव्र कर दिया।एनसीआरबी के सन १५ के अनुसार ३४६०० मामले एक वर्ष में दर्ज हुये जिसमें ३५-४० प्रतिशत मामले आज भी कोर्ट में लंबित है। दो हजार बारह के बाद सरकार ने विशेषकर दिल्ली में ६ फास्टट्रैक कोर्ट का गढन किया गया। जिसको तीन हजार केस दिये गये निपटारा करने के लिये परन्तु उसमें से १६०० मामले इन कोर्ट्स के द्वारा निपटारा ही नहीं कराया जा सका। फास्ट ट्रैक कोर्ट में अधिक्तर बलात्कार पीडितायें बदनामी, दोषियों की ताकत, अपने परिवार और समाज की इज्जत और राजनैतिक व समाजिक दबाव के चलते चुप्पी साध लेती हैं। इसके पीछे भी पितृसत्तात्मक सत्ता प्रमुख कारण रही है। इतना ही नहीं निर्भया जैसी ना जाने कितनी बेटियां हैं जिनका हाल बलात्कार के बाद कष्टमय हो चुका है किंतु उन्हे न्याय नहीं मिल सका क्योंकि उनके साथ कोई मीडिया या कोई महानगर का नाम नहीं जुडा था।आज भारत में औसतन हर आधे घंटे में एक रेप की घटनायें घट रही है। और इनके न्याय के लिये एक दशक का समय भी कम पड जाता है।
सवाल यह खडा है कि क्या समाज अब नपुंसक हो गया है जो कानून और सजा के शस्त्रों के माध्यम से इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिये मजबूर है। हम यह तो चाहते हैं कि हमारे घर की बहन बेटियों को कोई बुरी नजर से देखे नहीं। किंतु हम में से ही कई राह चलते किसी भी राह चलती लडकी को बुरी नजर से देखने के साथ साथ अश्लील कमेंट्स मारने में पीछे नहीं होते। अपने दोस्तों की टोली में हम इतने मग्न हो जाते हैं कि हम भूल जाते हैं कि हमारे जैसे अन्य कई लडके इसी काम को हमारी बहन बेटियों के साथ अंजाम दे रहे होंगें। कायदा तो यह है कि घर से अगर बच्चों को यह सीख दी जायेगी कि सम्मान हर बहन बेटी का बराबर होना चाहिये। समाज में इस सोच को धरासाई करने के लिये कदम उठाने होंगे। पीढियों के बीच की खाई को खत्म करके बच्चॊं की परिवारिक काउंसिलिंग करने की नितांत आवश्यकता है। होता अमूमन यह है कि परिवार में लडके और उसकी जुडी हरकतों को नजरंदाज किया जाता है।उनके भाई होने पर तो गुमान होता है परन्तु उसकी लफंगई पर परदा डाल दिया जाता है।लडकियों को ऐसे बंधन और नियम कानून सिखाए जाते हैं मानो वो वैदिक कालीन परंपरा का निर्वहन कर रही हों। जब तक हमारी सोच  समान नहीं होगी। बेटे बेटी के लिये बराबरी का विचार समाज में नहीं जायेगा। तब तक यह पुरुषप्रधान मानसिकता स्त्री को अपनी जैविक सम्पत्ति समझने की गलती करती रहेगी। फांसी से यह गहराई तक चुभा फांस नहीं निकलने वाला है। आवाज हमारे घर से उठनी चाहिये। स्वतंत्रता और रिश्तों के प्रति दायित्व जितना लडकियों को सिखाये जाते हैं उससे कहीं ज्याद लडकों को भी सिखाये जाने चाहिये। ताकि बलात्कार जैसी घटनाओं में विराम लग सके।

अनिल अयान,सतना

कानूनन जीवित प्राणी बनती नदियां

कानूनन जीवित प्राणी बनती नदियां
मध्य प्रदेश में हाल ही में नर्मदा नदी को जीवित इकाई मानने का संकल्प लिया है। कल ही नर्मदा सेवा यात्रा का प्रधानमंत्री जी ने समापन किया है। इस एक सौ पचास दिन की यात्रा के दरमियान नर्मदा मात्र नदी के रूप में अपने अस्तित्व के साथ साथ एक आत्मीय अस्तित्व में खुद को बदल चुकी है। साहित्य में सुभद्रा कुमारी चौहान की रचना -  कदंब का पेंड और इसके अस्तित्व को सार्थक करती यह यात्रा हम सबके बीच रही। इस समूचे उपक्रम में नर्मदा के मूल चूल को परिवर्तन करने का जो जज्बा हमारे मुख्यमंत्री जी ने देखा है वह कितना साकार होता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। परन्तु यह तो इस पंच वर्षीय में हुआ ही कि नर्मदा को जीवित प्राणी का अस्तित्व मिल ही गया। जो इस सरकार के लिये उपलब्धि के रूप में अंकित हो जायेगा। शिवराज सिंह चौहान अपने मुख्यमंत्रित्व काल में अपने बचपन के उन पलों को दर्शनशास्त्र से जॊडकर देखने और उसे साकार करने का काम किया है जिसका केंद्र नर्मदा नदी रही। इन डेढ सौ दिनों में नर्मदा का अस्तित्व उसकी अवधारणायें और उसकी आकांक्षाओं पर खूब चर्चायें विमर्श किये गये। बहुत से निर्णय लिये गये। बहुत से कदम उठे। जो एक विकास की बात करते नजर आये।
इसके पूर्व न्यूजीलैंड की संसद ने वहां की वांगानुई नदी को एक कानूनी व्यक्तित्व के रूप में मान्यता प्रदान की। उसके बाद उत्तराखंड ने उच्च न्यायालय ने गंगा यमुना को जीवित प्राणी मानने का कार्य किया। और कुछ हो चाहे ना हो परन्तु ये खबरें प्रकृति प्रेमियों और इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिये हर्ष का पल होगा। यह विषय पर्यावरणप्रेमियों को सुकून देने का काम करेगा। इधर मध्य प्रदेश में नर्मदा के लिये यह प्रयास पर्यावरण की दृष्टि से सराहनीय कदम होगा। जिसके अंतर्गत इस सरकार ने लगभग पांच सौ चालीस करोड रुपयों का बजट इस नदी के उद्गम अमरकंटक से आलीराजपुर तक उत्थान के लिये रखा है। जिसमें स्पर्श करने वाले सोलह जिलों की सीमाओं को फलौद्द्यान घने जंगलों का विकास आदि लक्ष्य रखा गया है। विरोध के उफान के बाद भी यह यत्रा अपने चरम पर पहुंच चुकी है। परन्तु इसके बाद भी यह प्रश्न बाकी है कि जीवित प्राणी का दर्जा पाने वाली नदियां किस तरह एक नागरिक की तरह अपना अस्तित्व कायम करेंगीं। किस तरह और कौन उनके अस्तित्व को बचाने वाले पालनहार का दायित्व निर्वहन करेगा।
सवाल तो कई मन में उठते हैं जिनका समाधान सरकार और कानून को खोजना होगा जिसमें सबसे बडा सवाल यह है कि नदी के अधिकार और नदी के लिये हमारे कर्तव्य कया होंगें। नदी की अविरलता को बाधा पहुंचाने वालों की क्या सजा होगी। क्या बांधों का अस्तित्व इसकी वजह से प्रभावित होगा। क्यों की बांधों की वजह से नदियों की तीव्रता और आविरलता बाधित होती है।नदी के कचडे को अलग करने के लिये क्या गंगा विकास प्राधीकरण जैसे विभागों का गढन होगा। क्या नदियों के संवैधानिक कर्तव्य और उत्तर दायित्व भी होंगें। संवैधानिक रूप से देखें तो समझ में आयेगा कि गैर मनुष्य को जीवित इकाई के रूप में मान्यता मिलती है तो उसके लिये अभिभावक निशिच्त किये जाते हैं। क्योंकि उनके लिये यह स्थिति अवयस्क की होती है। ऐसे में सरकार क्या करेगी। वर्तमान में जल प्रदूषण अधिनियम जिसमें निवारण और नियंत्रण आता है १९७४ से हमारे देश में लागू है। पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम १९८६ से लागू है। धारा ४३०-४३५ तक में जल श्रोतों को खत्म करने , उन्हें हानि पहुंचाने वाले को कडे से कडे दंड का विधान है। किंतु रेत उत्खनन से लेकर, नदी के बहाव में बाधाएं उतपन्न करने वालों की एक लंबी फेहरिस्त है। नर्मदा की ही बात करें तो राजनीतिज्ञों के भाई पट्टीदारों का पूरा समूह सक्रिय है जो रेत उत्खनन का लंबा कारोबार रात के अंधेरों में चला रहे हैं। नर्मदा का ही कई जिलों में अतिक्रमण करके प्रवाह बाधित कर दिया गया। उस समय क्या निर्णय न्यायालय द्वारा लिया जायेगा।
इतना बजट होना, उसका सही ढंग से उपयोग होना ताकि नर्मदा संरक्षित की जा सके, अमरकंटक और सतपुडा का यह अनुपम प्राकृतिक उपहार आगामी पीढी के सुरक्षित की जा सके। यह उद्देश्य अभी भी इस यात्रा के बाद अपना मुंह बाये खडे हुये हैं। क्योंकि जितना सकारात्मक सोचने वाले लोग हैं उससे कहीं ज्यादा दोहन करने वाले लोग इस जगह पर मौजूद है। तटों से संरक्षण से लेकर नदी के भयावह रूप को रोकने के लिये उपाय खोजना भी इसी सरकार का दायित्व होगा। ये एक सौ पचास दिन अगर नर्मदा के नाम को प्रचारित करने, इसके सहारे अपनी उपलब्धियों में इजाफा करके के लिये उपयोग किया गया। नर्मदा को जीवित प्राणी का दर्जा दिलाने की अप्रतिम मुहिम शुरू की गई है। तो अब आने वाले समय में सरकार को अपने नैतिक और प्रकृति के प्रति दायित्व के अंतर्गत यह करना होगा कि उपर्युक्त कानूनी और संवैधानिक सवालों के उत्तर खोजे। अपने बजट को नदियों के लाभ के लिये खर्च करे। नर्मदा के साथ साथ अन्य नदियां भी अपनी अंतिम सांस ले रही हैं। उनका संरक्षण भी अगले क्रम में होना चाहिये। क्योंकि मालवा के साथ साथ विंध्य और बुंदेलखंड भी इसी उम्मीद में चातक की तरह इंतजार में खडे हुये हैं। नर्मदा अगर अपने संघर्षरूपी अस्तित्व को इस यात्रा के परिणामों के द्वारा जीवित प्राणी बनने में अगर असफल होती है तो सबके मुंह के बोल यही होगें "शिवराज तेरी नर्मदा मैली ही रही"। परन्तु एक आश बांकी है कि नर्मदा के साथ अन्य नदियों का समय बदलने वाला है सबको जीवित प्राणी की तरह स्वतंत्रता मिलने वाली है। सुनने में जितना सुखद लगता है वास्तव में यह फैंटेसी में जीने की तरह ही महसूस होता है। अगर नदियों की अविरलता और प्रवाह बचेगा तभी वो जीवित रह पायेगीं।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७



शनिवार, 22 अप्रैल 2017

मौत को गले लगाता, हमारा मजबूर अन्नदाता

मौत को गले लगाता, हमारा मजबूर अन्नदाता
हमारा देश भी अजीबो गरीब चलचित्र बन कर रह गया है। एक तरफ देश में चमकते कांक्रीट के महानगर खडे हो रहे हैं और दूसरी ओर जय जवान जय किसान की दुंदुभी बजायी जाती है। एक तरफ देश के विकास करने और विकास दर पर गर्व किया जाता है और दूसरी ओर देश के युवा और किसान दोनो अपनी स्थिति पर रो भी नहीं पाते। हमारा प्रशासन और सरकारें यह समझने को कतई तैयार नहीं हैं कि अगर जवान और किसान तबाह हुआ तो देश के चमकते महानगर भी बर्बाद हो जायेगी। और इस तबाही को कोई रोक नहीं सकेगा। राजधानी में पीएमओ तो किसानों के एक समूह को इस तरह नजरंदाज कर दिया है मानों वो देश से उसकी आत्मा निकालकर देने की मांग कर रहे हों। ऐसा नहीं है कि यह मामला मात्र तमिलनाडू का ही बस हैं। मध्य प्रदेश का ६० प्रतिशत जिसमे बुंदेलखंड, बघेलखंड,मालवा, का क्षेत्र पंजाब, तमिलनाडू, महाराष्ट्र जैसे ना जाने कितने राज्य और उनके किसानों की दुर्दशा इस  मुद्दे का गवाह रही है। हरित क्रांति के नाम पर कुछ दशक जितने सुकून दायक थे जिसमें कि गेहूं और चावल की खेती ने अच्छा उत्पादन दिया किंतु दो हजार दस के बाद तो किसानों पर मौसम सरकार और बैंक तीनों के एक साथ कहर ढाया हैं। इसके लिये कौन जिम्मेदार है यह जितना महत्वपूर्ण है उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इस स्थिति से अपने देश के अन्नदाताओं को कैसे बाहर निकाला जाये
किसानों की खुद की सक्रियता में कमी होने के साथ सरकारों के द्वारा खराब मानसून के चलते बदहाली रोकने के लिये आवश्यक कदम ना उठाना भी इस जीवन संघर्ष का मुख्य कारण रहा। दिल्ली के जंतर मंतर में तमिल नाडु के किसान लगभग चालीस दिनों से विरोध प्रदर्शन की पराकाष्ठा को लांघ रहे हैं। प्रधानमंत्री जी तो इस मामले में ऐसे उदासीन हो गये हैं जैसे मानवता की पीडा का उनके सामने कोई महत्व नहीं रहा। किसानों के द्वारा केंद्र से लोन की माफी और मुआवजे की मांग किसी भी कोण से नाजायज नहीं है।इसी का परिणाम रहा है कि देश के अन्य राज्यों में किसान मौन आत्महत्या का रास्ता अपनाया है। और तो और सूखे की मार से तो देश की ६०-७० फीसदी खेती नष्ट हो चुकी है। खाने को अन्न और पीने को पानी की कमी ने जीवन को त्रासद मोड पर लाकर खडा कर दिया है। राज्य सरकारें तो मौन धारण की ही हुई हैं किंतु केंद्र की तरफ से इस तरह की उदासीनता मानवीय तौर पर समझ के परे हैं। हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद तमिलनाडू सरकार के देरी से उठाये जाने वाले कदम की वजह से आत्महत्यायें बढ रही हैं। मध्य प्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। अब देखना यह है कि क्या तमिलनाडू की तरह अन्य राज्य के किसानों को इसी तरह से कुछ करके सरकार और प्रशासन की आंख खुलवाना पडेगा या राहत के रास्ते पर सरकार चलकर अन्नदाताओं को कुछ लाभ प्रदान करेंगीं।
रिजर्व बैंक और उनके सहकारी ग्रामीण विकास बैंकों की  भूमिका इस दौरान ज्यादा बढ जाती हैं। मध्यम श्रेणी और निम्नश्रेणी किसानों के लिये योगी सरकार के द्वारा कर्ज माफी का निर्णय अन्य राज्यों के लिये एक सीख के रूप में है। मौसम की मार तो वैसे भी किसानों का जीना हराम किये हुये हैं किंतु प्रशासन और सरकार भी अपने अन्नदाताओं का ख्याल ना रखेगी तो इनका माई बाप कौन होगा। भारतीय अर्थव्यवस्था का आधे से अधिक दारोमदार खेतीकिसानी और उसके निर्यात के रूप में टिकी हुई है। अगर अन्नदाताओं की खैर ख्वाहिश ना ली जायेगी तो हम सब भूखों मरने के लिये भी विवश हो जायेंगें। आज के समय में किसानों फसल का जिस तरह मंडियों में न्यूनतम विक्रय मूल्य तय किया जा रहा वह बहुत ही चिंताजनक हैं। यह तो तय है कि रिजर्व बैंकर्स और इनकी विभिन्न साखाये भी सरकार की सहमति से किसानों के पक्ष में निर्णय लें तथा कर्ज माफी के लिये कदम उठायें तो भला हो सकता है। अति सक्रिय प्रधानमंत्री जी और उनके मुख्य सचिव के द्वारा पीएमओ के बाहर इस हृदय विदारक किसानों के विरोध का कोई प्रतिक्रिया ना देना और नजरंदाज करना वाकयै मानवीय दृष्टिकोण की धज्जियां उडाना है। किसानों की आत्म हत्या को रोकने की बजाय इस तरह का मौन उनकी मजबूरी को सरेबाजार नीलाम करने से भी बद्तर है। सुप्रीमकोर्ट के साथ अगर केंद्र सरकार साथ दे दे तो निश्चित ही राज्य सरकार तीव्रता से फैसला लेकर किसानों का भला करेगी। ऐसी उम्मीद तो जताई ही जा सकती है। अब तो किसानों के माईबापों को अपने मुखर होने का सबूत अन्नदाताओं को देना होगा।